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Seerat e Ammer-ul-Monineen Say Chand Amali Nukat | H.I Syed Zaigham Ali Rizvi
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anders
Record date: 21 Jan 2024 - سیرت امیرالمومنین سے چند آمالی نکات
AL-Mehdi Educational Society proudly presents new Executive Refresher Course for the year 2024 under the supervision of specialist Ulema and Scholars who will deliver though provoking lectures Every Weekend.
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Transcript
[0:16]अज बिल्ला मिन शैतान रम बिस्मिल्लाह रहमान रहीम अल्हम्दु ही व सलातो
[0:31]वसलाम अला अल हमदुलिल्ला लजी जाना मिनल मुत बिल कुरान करीम ला
[0:43]अमीर मोमिनीन ल मासूमीन अल सलाम दरूद प मोहम्मद वाले मोहम्मद पर
[0:53]अ बाद अल्लाह सुभान ताला फ महकम किताब मजीद व फरका हमीद
[1:06]बिस्मिल्लाह रहमान रहीम लक अर सना मूसा बयाना अन मका मन लामा
[1:23]इनर वकर बयाला द मोहम्मद तमाम तर तारीफें खुदाय वहदहू ला शरीक
[1:44]के लिए दरूद और सलाम मोहम्मद और अहले बैत मोहम्मद अलैहि सलातो
[1:49]वसलाम की जबात मुकद्दसा पर हमद है उस खुदा की कि जिसने
[1:58]हमें और आपको कुराने करीम विलायत अमीरुल मोमिनीन और दीगर आमा अलैहिम
[2:03]सलाम की विलायत से मतमस किया परवरदिगार आलम का लुत्फ है परवरदिगार
[2:12]आलम का एहसान है परवरदिगार आलम की तौफीक है कि उसने हमें
[2:21]यह एक और मौका इनायत फरमाया है कि हम और आप 1445
[2:29]हिजरी के माहे रजब उल मुरजा में सांस खींच रहे हैं और
[2:34]वह महीना कि जो कि खास तैयारी के लिए महीना है यानी
[2:40]हम और आप आहिस्ता आहिस्ता गोया तैयार हो रहे हैं उस खास
[2:48]महीने के लिए कि जो कि हम तक आ रहा है उस
[2:53]महीने में भी खास उस शब के लिए तैयार हो रहे हैं
[2:59]जिसे परवर गार आलम लैलतुल कद्र के नाम से पहचन वा रहा
[3:06]है तो गोया उस तक पहुंचने के लिए तैयारी इस अंदाज से
[3:14]जरूरी है कि रसूल अल्लाह अपनी दुआओं में एक दुआ यह मांगा
[3:17]करते थे खास माहे रजब और शाबान में कि अल्लाहुम्मा बारिक लना
[3:26]फी रजब व शाबान व बना रमन परवरदिगार हमारे लिए रजब को
[3:39]और शाबान को बासे बरकत करार दे व बल्लेना रमदान और हमें
[3:43]रमजान तक पहुंचा दे इस एक जुमले के अंदर अगर हम और
[3:51]आप गौर करें कि हमें रमजान तक पहुंचा दे से क्या मुराद
[3:58]है रमजान अगर महीने के उनवान से लिया जाए तो महीना चांद
[4:01]की हरकत से शुरू और उसकी हरकत पे खत्म होता है जब
[4:08]पहली का चांद नमूद होता है तो महीने का आगाज हो जाता
[4:15]है फिर जब वह अपना चक्कर पूरा करते-करते गायब हो जाता है
[4:21]उफक से और फिर एक दो दिन के बाद जब हमें उफक
[4:25]पे कहीं नजर आता तो फिर हम कहते कि हां अब यह
[4:31]दूसरा महीना शुरू हो गया यह जो चांद का आना और जाना
[4:37]है यह आपसे पूछकर नहीं है वह अपने मदार में अपने अंदाज
[4:39]से तुलू हो रहा गुरूब हो रहा लेकिन अजीजो यह जो कैलेंडर
[4:47]पर रमजान का आना है शाबान का आना है यह वही परवरदिगार
[4:50]आलम का निजाम है जिसके तहत यह खुद का निजाम है इस
[4:56]अंदाज से कि इनके लिए किसी नबी की जरूरत तो नहीं है
[5:00]चांद अपने मदार में गर्दिश कर रहा है और इसी अंदाज से
[5:02]महीना आ रहा है और जा रहा है लेकिन सवाल यह पैदा
[5:07]होता है कि क्या हम इस काबिल हो गए हैं कि हम
[5:13]रमजान से वो नेमत ले सकें जो खुदा हमें देना चाह रहा
[5:19]तो यहां परवरदिगार आलम ने के भेजे हुए नुमाइंदे ने यहां पर
[5:22]हमें तवज्जो दिलाई है कि खुद में इतनी वसत पैदा करो कि
[5:30]जब उस माह में दाखिल हो तो आमागी के साथ दाखिल होना
[5:39]कि जो परवरदिगार आलम उस खास महीने में जो देना चाह रहा
[5:45]है हम आमादा हो उस शय को लेने के लिए तो इस
[5:46]ऐतबार से उस शय को लेने के लिए हमें जर्फ की आमागी
[5:53]बहुत जरूरी होगी कि वह शय जिस शय में ली जाएगी जिस
[6:00]जर्फ में ली जाएगी अगर मेरे पास वह कंटेनर होगा तो ही
[6:05]मैं वह चीज परवरदिगार से ले सकूंगा आज की यह नशिब माहे
[6:11]रजब में रखी गई है और रजब में बहुत सी मुनास बतें
[6:17]हैं निस्बत हैं और खास जैसा कि अभी ऐलान भी हो रहा
[6:23]था दुआ की दरखास्त भी हो रही थी कि जहां आमा अहले
[6:25]बैत अलैहिम सलाम के घराने में जो विलादत हुई हैं उन शख्सियत
[6:35]में से अक्सर हमें इस महीने में यूं नजर आ रहे हैं
[6:42]के पहली ही तारीख पांचवे इमाम की विलादत से शुरू होती है
[6:48]और फिर जहां मुख्तलिफ मुनासिब और निस्बत मौजूद हैं वहीं 13 रजब
[6:58]को मौला मुत अली इने अबी तालिब अ ला सलाम का यौमे
[7:06]विलादत है पस अजीजो इस उनवान से मैंने जो आयत आपके सामने
[7:14]पढ़ी है थोड़ा सा तजक और तफकॉर्न आलम कह रहा कि हमने
[7:33]भेजा है मूसा को हमने मूसा को भेजा है आयात देकर वलक
[7:48]अरसल ना मूसा और हमने भेजा है मूसा को बैना आयात देकर
[7:54]क्यों ताके अ लमा थे लन नूर बहुत तवज्जो ताकि निकाल ले
[8:09]अपनी कौम को जलमा से और कहां ले जाए नूर की तरफ
[8:16]ले जाए यानी यह एक नकाती एजेंडा हजरत मूसा का करार पाया
[8:22]कि हम आए ही इसीलिए हैं कि आपको जुल्मत से निकालेंगे और
[8:25]नूर की तरफ ले जाएंगे अल्लाह ने अपनी विलायत का ऐलान किया
[8:35]और कहा कि हम उन्हीं के वली हैं कि जो कि ईमान
[8:41]लेकर आए हैं अल्लाह वली लजीना आमन अल्लाह उन लोगों का वली
[8:47]है य मिनल माते नूर जिन्ह उसने निकाल लिया है कहां से
[8:54]जलमा से निकाला है और कहां ले गया नूर में ले गया
[9:00]तो गोया परवरदिगार आलम ने यहां पर इस अमल की निस्बत खुद
[9:06]से दी के निकाल लेता है वह जलमा से और ले जाता
[9:11]है नूर की तरफ इस आयत में जो मैंने सरनामा कलाम बयान
[9:18]कीए और उसमें परवरदिगार ने हजरत मूसा के उनवान से बयान किया
[9:20]कि मूसा को इसलिए भेज दिया को व यह काम करें तो
[9:24]गोया समझ में आ गया कि खुदा मुसब्बर हम निकालेंगे तो कोई
[9:33]शक नहीं खुदा ही निकालेगा लेकिन कोई सबब तो करार पाएगा तो
[9:37]वहां हजरत मूसा को उन असबाब में से एक सबब के तौर
[9:43]पर सामने रखा कि यह हजरत मूसा यह काम अंजाम देंगे यह
[9:49]काम फकत हजरत मूसा ही नहीं बल्कि सूर हदीद की 25वीं आयत
[9:55]में कहा लना रसना बिल बना लना किता मन ना के वो
[10:07]वो है कि जिसने बहुत से रसूलों को भेजा आयात देकर रोशन
[10:14]निशानिया देकर उन्हें किताब भी दी यह सूर हदीद की 25 नंबर
[10:18]की आयत है उन्हें किताब दी उन्हें मीजान दिया उन्हें रोशन निशानिया
[10:27]दी इसलिए कि वो क्या करें यना ताकि लोग अदल के साथ
[10:35]कयाम करें यानी मुशे में अदल का निफास करें यानी जो मुशरा
[10:42]तश्न पाए उसकी बुनियाद में अदल होना चाहिए कुछ और नहीं होना
[10:46]चाहिए वो मुशरा जिसकी बुनियाद में अदल होता है वो मुस्तहकम होता
[10:50]है उसमें कायम अम देर पा होता है उसकी जो जड़े हैं
[10:59]व मजबूत होती हैं इसीलिए मेरे मौला से जनाबे अमीर से सवाल
[11:04]किया गया दिल ने जो जवाब दिया वह यह जवाब दिया के
[11:10]अदल अश्या को अपनी हुदूगिरो [संगीत] को बुरा नहीं कह रहे हैं
[11:32]ऐसा नहीं है सखावत सखी होना एक अच्छी बात है लेकिन बात
[11:34]पूछी जा रही है मौला मुत से इमाम आदिल से उससे पूछी
[11:40]जा रही है कि जिसने जमीन में अदल इंसाफ कायम करना है
[11:47]तो मौला फरमा रहे कि याद रखो जो मुस्तहकम मुशरा अगर करार
[11:51]पाएगा तो उसकी बुनियाद अदल पर तो हो सकती है सखावत पर
[11:58]नहीं हो सकती है इसलिए कि सखावत अश्या को उनकी हुदूगिरो [संगीत]
[12:28]हां उससे ज्यादा दे देना अपना हक भी किसी के लिए छोड़
[12:35]देना यह सखावत होगी तो ये मलका आपकी अगर शख्सियत में है
[12:42]अच्छी बात है लेकिन इस मलके के ऊपर निजाम नहीं चल सकता
[12:45]है कि निजाम के लिए जरूरी है कि जिसका जो बनता है
[12:51]उसे उतना दे दिया जाए वो खुद अपनी रजा और रगत से
[12:57]अपना हिस्सा छोड़कर किसी को दे दे यह उसका मसला है लेकिन
[13:00]निजाम सिस्टम जो इंप्लीमेंट किया जाएगा वह अदल के ऊपर किया जाएगा
[13:08]इसीलिए रिवायत के जुमले के बिद समावा ल अ कि यह अदल
[13:15]ही है कि जिस पर जमीन और आसमान कायम है कि अगर
[13:21]इस अदल को दरमियान से निकाल दे तो ना जमीन जमीन रहे
[13:24]ना आसमान आसमान रहे खुद मेरा वजूद भी अग कायम है तो
[13:31]अगर गौर किया जाए कि अगर खारिज में देखें तो भी अदल
[13:37]है बातिन में देखें तो भी अदल है यानी अब यह लफ्ज
[13:43]मुश्किल है आसान कर दें कि हमारी जो यह जिस्म है जो
[13:45]बॉडी है हम जब इसके अंदर भी देखते हैं तो हमें अदल
[13:50]नजर आता है कैसे मसलन जब हम कोई ब्लड रिपोर्ट डॉक्टर के
[13:56]सामने रखते हैं क्या कहा डॉक्टर साहब बुखार आ गया है अब
[13:59]बुखार आने की तो कई वजू आत है बुखार आना जो है
[14:04]वह खुद बुखार मर्ज नहीं है मर्ज की वजह से बुखार है
[14:09]बुखार तो अलामत है किसी मसले की तरफ इशारा करती हुई अल्लाह
[14:15]ने जो खुद का सिस्टम रखा है निजाम रखा है इस बुखार
[14:17]ने बतला दिया कि कुछ मसला हो गया है जाकर टेस्ट करवाया
[14:22]पता चला कि जनाब हमारे ब्लड के अंदर कोई न्यूट्रोफिल है जो
[14:29]बढ़कर आ गया अब जब देखा कि भाई यह तो बढ़कर आ
[14:30]गया है इसका मतलब क्या है कहा इसका मतलब यह है कि
[14:35]कोई इंफेक्शन है यह बढ़ा हुआ है पढ़ा हुआ से क्या मतलब
[14:39]है क्या नहीं होना चाहिए था कहा नहीं होना तो चाहिए था
[14:43]लेकिन उसकी हुदूगिरो आप सेहत और सलामती के साथ रहेंगे लेकिन जब
[14:50]यह हुदूगिरो में यह जाहिर होगा तो फिर हम आपको दवा दे
[15:00]रहे हैं क्या करेगा यह दवा कहा दवा यह करेगी कि वो
[15:05]एंजाइम जो ज्यादा हो गया है यानी हुदूगिरो दवा देंगे कि सारे
[15:32]एंजाइम बराबर हो जाएंगे वो जिसे ब्लड में न एमजी होना चाहिए
[15:37]हम 10 एमजी कर देंगे सबको बराबर कर देंगे तो अगले ही
[15:40]लमहे जिंदगी ही बराबर हो जाएगी इसका मतलब यह है कि हर
[15:47]जगह बराबरी बराबरी नहीं चलती जहां पर जो जिसका हक है उसको
[15:49]उतना दिया जाए तो स्टेबिलिटी आती है यहां पर कहा परवरदिगार आलम
[15:56]ने कि वो बद समा तुम्हारे जिस्म के अंदर का निजाम भी
[16:05]अदल पर चल रहा है तुम्हारे जिस्म से बाहर का भी जब
[16:08]निजाम देखा जाए और गैलेक्सी में सैया औरों को देखा जाए तो
[16:14]वह सैयारे ऐसे नहीं है कि चलो आज मूड नहीं हो रहा
[16:18]है इस ट्रैक से निकलने का वहां से निकलते हैं नहीं न
[16:24]दवार फ मदर तब कि हमने ार करार दिए है हर हर
[16:32]सैयारे को एक दौर एक मदार एक ऑर्बिट हमने क्रिएट किया है
[16:39]और यह अपने अपने ऑर्बिट में चक्कर लगाएंगे ऑर्बिट से हटकर चक्कर
[16:45]नहीं लगाए यानी के जो मिक दार मकादमी मकादमी के तमाम सैयारे
[17:03]उसके अंदर गर्दिश करते रहेंगे तो अपने मदार से हटेंगे नहीं इसको
[17:10]अदल कहते हैं फिर जिसको जितना मदार दिया गया है वह अपने
[17:12]ही मदार में रहता है ना आगे जाता है ना पीछे जाता
[17:16]है इसको अदल कहते हैं तो गोया जमीन हो आसमान हो खुद
[17:23]मेरा वजूद हो इसके अंदर जो सिस्टम काम कर रहा जो निजाम
[17:26]काम कर रहा वह अदल की बुनियाद पर काम कर रहा है
[17:30]तो अर्ज यह कर रहा था के मूसा को भेजा कि जुल
[17:34]मात से निकालो और नूर की तरफ ले आओ ला और इन्हें
[17:41]अल्लाह के दिन याद दिलाओ अल्लाह के दिन यानी क्या अल्लाह के
[17:47]दिन यानी मु फसरी ने यहां पर कहा कि अल्लाह के दिन
[17:49]से मुराद यह है कि जिस दिन बनी इसराइल को कोई नेमत
[17:58]मिली तो उन नेमतों को याद दिलाओ नेमत को याद करने का
[18:01]नतीजा यह होगा के शुक्र मुनम किया जाएगा यानी नेमत देने वाले
[18:11]का शुक्र किया जाएगा नेमत देने वाले का शुक्र किया जाएगा तो
[18:15]पस जब जब नेमत की तरफ तवज्जो होगी जुबान पर शुक्र परवरदिगार
[18:22]आएगा और जिस कदर नेमत की कदर की जाएगी एहसास किया जाएगा
[18:25]कितनी जरूरी थी तो परवरदिगार आलम से रिश्ता और मुस्तहकम होता चला
[18:34]जाएगा तो बस अल्लाह ने उस दिन को नाम ही यम अल्लाह
[18:36]का दे दिया यानी कि हर वह दिन कि जिस दिन मेरा
[18:41]बंदा मुझ तक आ जाता है वह दिन कोई और दिन नहीं
[18:46]अल्लाह का दिन है तो अब अगर नेमतों को याद करके इंसान
[18:52]अल्लाह से करीब हो रहा और वह दिन यम अल्लाह करार पा
[18:54]रहा तो बताइए आज जिस नशिता की बात की जा रही है
[19:02]वह शख्सियत वह शख्सियत है कि जिसका ताल्लुक फकत नेमत से नहीं
[19:06]है बल्कि इतमा में नेमत से है यह शख्सियत वह शख्सियत है
[19:13]कि जिसके ऊपर यूं नहीं कि नेमत उतारी है बल्कि इनकी सूरत
[19:17]में तुम्हारे ऊपर नेमत को तमाम कर दिया है अय अकमल लकम
[19:27]दनक ततो अलकम जहां नेमत तमाम हो रही हो जहां दीन कामिल
[19:33]हो रहा हो वह शख्सियत जनाबे अमीर अली मुर्तजा अल सलातो वसलाम
[19:41]की शख्सियत है तो अब अगर इस नेमत उजमा को याद करके
[19:49]शुक्र परवरदिगार किया जा रहा हो तो हक रखती है यह नेमत
[19:55]कि चकि नेमत नेमत उजमा है तो किस कदर करीब हो जाना
[20:00]चाहिए हमें और आपको परवरदिगार आलम से तो अब मुझे बताइए कि
[20:02]इस दिन को परवरदिगार यम उल्ला नहीं कहेगा तो क्या कहेगा अ
[20:08]याम अल्ला नहीं कहेगा तो क्या कहेगा वह अगर मनो सलवा उतरने
[20:10]के बाद दिन यम अल्ला बन जाता है तो वह जिसके वसीले
[20:16]से जिसकी निस्बत से अगर रसूल अल्लाह को देखकर कह रहा है
[20:22]कि लला कलला अगर तुझे खल्क करना मकसद ना होता मैं कुछ
[20:24]खल्क ही ना करता तो वो हस्तियां कि जिनके लिए परवरदिगार आलम
[20:29]ने इन अया को खल्क किया है खुद यम उनके वसीले से
[20:35]उनके तसदुक से उनके सदके में अगर खल्क हो रहे हो तो
[20:42]बताइए उनको याद करने का दिन कौन सा दिन कहलाएगा यकीनन यह
[20:45]दिन चाहे विलादत के हो चाहे शहादत के हो असलन इमामत के
[20:52]दिन है असर विलायत के दिन है यानी इन हस्तियों की विलायत
[20:58]को याद करना और फिर अपने आप को एनालिसिस करना तजिया करना
[21:02]कि मैं कहां खड़ा हुआ हूं वह तो वह है वह तो
[21:07]बा कमाल है वह तो वह है कि मैं क्या अल्लाह और
[21:11]फरिश्ते उन पर दरूद भेज रहे हैं वह तो उनका कमाल है
[21:17]लेकिन सवाल यह है कि वह तो वह है मैं कहां खड़ा
[21:17]हूं कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं स्टेडियम में पवेलियन में बैठा
[21:22]हुआ हूं और वहीं पर नारे मार रहा हूं वाओ चौका और
[21:28]ये क्लैपिंग और उसके बाद फिर मैं अपने घर चला गया और
[21:31]ग्राउंड में उतारा हुआ है आम्मा को और इनके ऊपर वाह वा
[21:36]वा वा करके मैं घर चला गया अब कब मिलेंगे कहा अगले
[21:41]मैच में मिलेंगे बस इतना ताल्लुक आमा से जड़ा हुआ क्या यह
[21:44]है व ताल्लक कि जो वह अपने शियों से जुड़ना चाहते हैं
[21:50]इस पहलू पर हमने आज तजक करना है जब हम मौला की
[21:55]शख्सियत को देखते हैं तो इसमें कोई शक नहीं कि हमें ऐसे
[21:57]कमाला नजर आते हैं कि अकल दंग रह जाती है मसलन इंसान
[22:05]में किसी सिफत का अपने कमाल पर होना यह बहुत मुश्किल है
[22:14]कि कोई सिफत हो वो अपने कमाल पर हो ार नाकस की
[22:18]बस में ऐसा नहीं है फिर यह और मुश्किल है के किसी
[22:25]शख्सियत में एक से ज्यादा सिफात का अपने कमाल पर होना अभी
[22:32]तो एक सिफत के अंदर ही मलका हासिल करना इतना मुश्किल है
[22:36]मलका मतलब परफेक्शन यानी कि जो ऑप्टिमम रिजल्ट है जो बिल्कुल ही
[22:42]रिक्वायर्ड है वहां तक पहुंच जाना मुश्किल है दो सिफात के अंदर
[22:49]पहुंच जाना यह थोड़ा सा और मुश्किल हो गया मुता सिफात में
[22:54]ऐसा हो जाना यह तो बहुत ही मुश्किल है नामुमकिन नहीं है
[22:58]मुश्किल है मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं है बहरहाल और अब जो
[23:02]बात करने लगा हूं यह तो बहुत ही मुश्किल है अगरचे मुश्किल
[23:06]है नामुमकिन नहीं है क्योंकि हुई है लेकिन व यह कि ना
[23:11]फकत यह कि मुता सिफात में मलका कमाल हासिल करना बल्कि जाहिर
[23:15]ऐसी सिफात में मलका हासिल करना जो जाहिर एक दूसरे की मुतजेंस
[23:22]सफत में भी कमाल मसलन अगर ताल करना हो तलवार चलानी हो
[23:35]तो उसके लिए सजा चाहिए इसके लिए बहादुरी कुवत व जितनी चीजें
[23:38]आप तसर कर रहे हैं व चाहिए कि नहीं चाहिए और जब
[23:41]किसी का सर उड़ा रहे हैं किसी का हाथ काट रहे हैं
[23:45]किसी को दो टुकड़े कर रहे हैं तो यह करने के लिए
[23:46]यकीनन क्या चाहिए एक सखत एक एक कुवत चाहिए या नहीं चाहिए
[23:51]तो हम यह देखते हैं कि जनाबे अमीर की शख्सियत वह है
[23:56]कि जब तलवार चलाते हैं तो फिर यह कुवत भी में नजर
[23:59]आती है कि मरहब भी दो टुकड़े होता हुआ नजर आ जाता
[24:01]है ऐसा ही है और अगर दूसरी सिफत को देखिए सखावत को
[24:08]देखिए तो यहां नर्म दिली चाहिए यहां नर्म मिजाजी चाहिए यहां बिल्कुल
[24:15]झुका हुआ बंदा चाहिए तो जब इस पैरामीटर में लाकर जब मौला
[24:21]अली को देखते हैं तो हमें यह यहां पर अपने कमाल पर
[24:25]नजर आते हैं कि फकीरों के साथ नशत बरखास्त करते हुए नजर
[24:27]आ रहे हैं फकीरों के साथ बैठे हुए नजर आ रहे हैं
[24:32]यानी कि इस अंदाज से अपने आप को मुशे में इस अंदाज
[24:35]से रखा हुआ है कि कोई फर्क नहीं कर पा रहा है
[24:39]कि इसमें अली कौन है वो कौन है इधर देखते हैं तो
[24:40]यहां पर भी सिफत अपने कमाल पर है उधर देखते हैं तो
[24:44]वहां भी सिफत अपने कमाल पर है अगर इस अंदाज से गजा
[24:49]की तरफ तवज्जो करते हैं तो देख रहे हैं कि रोटी भी
[24:53]अगर दो उंगलियों से तोड़ी जाए तो वह टूट नहीं रही है
[24:55]घुटने से तोड़ रहे हैं लेकिन अगर उसी अली को मैदान जंग
[24:59]में देख रहे हैं तो उंगलियां वही है और आज दरे खैबर
[25:04]को काक पक रहे हैं तो यह जो सिफात है ये ऐसी
[25:10]दो मुतजेंस से नजर आती हैं यकीनन इस तबार से अगर बात
[25:12]की जाए तो बहुत मुश्किल है जनाबे अमीर को उस अंदाज से
[25:18]समझना जैसा वह है इसमें कोई शक नहीं लेकिन व कहते हैं
[25:22]देर इ अ बिक लेकिन हेयर अब चकि वक्त इतना नहीं है
[25:24]तो बडी एग्जांपल दे दे के सामने समझा रहा हूं समझिए और
[25:29]वो यह बहुत तवज्जो मौला अली अल सलाम की सीरत के बहुत
[25:34]से पहलू है जो हम तक पहुंचे हैं लेकिन मसला यह है
[25:39]कि हमने मीलाद में और महफिलों में उनकी जो सीरत बयान की
[25:43]है जो औसाफ बयान किए हैं वह वोह औसाफ है के जो
[25:50]कि अमूमन काबिले तासी नहीं है औसाफ है लेकिन काबिले तासी नहीं
[25:54]है मसलन मिसाल फजल में बयान करना शुरू किया हमने कि आप
[26:01]जौ फिल काबा आपकी विलादत जौ फिल काबा में हुई यानी काबे
[26:06]के अंदर आपकी विलादत हुई ऐसा है फजीलत है आप और मैं
[26:12]चाहकर भी काबे में पैदा नहीं हो सकते हो सकते हैं नहीं
[26:19]हो सकते रसूल अल्लाह की सीरत बयान हुई मोजत बयान हो गए
[26:22]अब जैसे ही हमने तारीफें शुरू की हमने कहा वो वो है
[26:26]जिन्होंने चांद को दो टुकड़े कर दिया तो उन्होंने तो चांद को
[26:31]दो टुकड़े कर दिया आप कर सकते हैं नहीं कर सकते अच्छा
[26:33]ऐसे कुछ और भी मामलात बयान हुए क्योंकि मिलाद में तो यही
[26:38]वाली बातें होती है क्योंकि नारा बहुत लंबा लगता है इसके ऊपर
[26:40]तो यह वो चीजें हैं कि जनाब यूं हो गया और दो
[26:43]उंगलियों से दरवाजा हमसे तो इस वक्त हम अपने आप को नहीं
[26:48]उठा पाते सहारा लेकर उठ रहे हैं उन्होंने दरवाजा उखाड़ के फेंक
[26:51]दिया अब ये वाली बात तो हमारे बच्चे के जहन में अगरचे
[26:56]ये बच्चा मैंने हुस्ने जन से काम लि है वगरना सफेद दाढ़ी
[27:02]के बाद भी हमारे जहन में यही खाका आया कि वह कुछ
[27:06]ऐसी हस्तिया थी कि वैसा काम तो हम कर ही नहीं सकते
[27:08]और जब वैसा काम हम कर ही नहीं सकते तो गोया इन
[27:12]शख्सियत का हमसे कोई ताल्लुक ही नहीं है वोह वो है हम
[27:16]हम है और यह बात हमने उनके कमाल में कही अरे हम
[27:21]कहां कर सकते हैं वोह वो थे हम हम है तो गोया
[27:26]हमने उनको मुशे से काट कर अलग कर दिया अल्लाह ने तो
[27:27]भेजा हमारी हिदायत के लिए हमने कह दिया भाई गलत चीज भेज
[27:32]दी है हमें तो ऐसा भेजो जो हम जैसा हो तुमने ऐसा
[27:36]भेज दिया है जो पता नहीं कौन सी दुनिया की चीज है
[27:40]हमें तो वो दो जो हमारे लिए हो यह वो तराज है
[27:41]जो रसूल अल्लाह को देखकर कुफ ने किया था कि अगर अल्लाह
[27:46]को भेजना ही था तो कोई फरिश्ता भेजता यह किसे भेज दिया
[27:51]जो हमारी ही तरह चलता है फिरता है खाता है पीता है
[27:53]यानी ये एक्सपेक्ट कर रहे थे कि कोई मावरा इंसान बशर कोई
[27:58]आ जाएगी और उसकी हम इतबा करेंगे तो तात करेंगे परवरदिगार ने
[28:04]भी क्या जवाब कड़ाके का दिया कहा कि मिया सुनो अगर जमीन
[28:07]में फरिश्ते आराम से चल फिर रहे होते तो जो हम रसूल
[28:12]भेजते वो फरिश्ता ही भेजते लेकिन जमीन में जो चल रहे थे
[28:19]वो तो तुम लोग थे जो चल रहे थे फिर रहे थे
[28:23]तो चूंकि तुम चल रहे थे तुम रह रहे थे तो जो
[28:23]तुम्हारे लिए हादी भेजा जाएगा वो तुम जैसा ही भेजा जाएगा उसूल
[28:28]बयान कर दिया लेकिन वह जो कह रहे थे अब यह पहले
[28:33]तराज का जवाब दे दिया कि अगर भेजना होता तो किसी फरिश्ते
[28:36]को भेजता तो उसने जवाब दिया कि यकीनन हम फरिश्ते को भेज
[28:38]देते अगर जमीन में फरिश्ते चल रहे होते लेकिन तुम चल रहे
[28:43]थे तो तुम जैसा भेजा है लेकिन जो दूसरी बात उसने आयत
[28:49]में कही कि चूंकि यह हम जैसा है इसलिए यह हम पर
[28:51]कोई फजीलत नहीं रखता है इसका जवाब परवरदिगार ने दिया कि इनसे
[28:59]कह दो कि अना ब मैं तुम्हारे ही तरह का बशर हूं
[29:08]लेकिन मुझ पर यूहा इलैया मुझ पर वही होती है यानी कि
[29:11]जो तुम कह रहे हो कि यह हम जैसा है हां हम
[29:15]तुम जैसे हैं लेकिन यह तुमने कैसे समझ लिया कि चूंकि हम
[29:21]तुम जैसे हैं तो तुम पर कोई फजीलत नहीं रखते तुम पर
[29:26]वही नहीं आती वही हम पर आती है यह फजीलत है जो
[29:31]उनको परवरदिगार आलम ने अता की है तो यकीनन वो बा फजीलत
[29:33]है लेकिन उस बा फजीलत होने का मतलब यह नहीं है कि
[29:37]चूंकि वो वो है इसलिए हमसे कोई ताल्लुक नहीं है मिया ताल्लुक
[29:43]तो तुम से है जिस तरह तुम्हे परेशानियां वैसे ही है तो
[29:46]यह जो पहलू है मौला अली अल सलाम की जिंदगी के जो
[29:50]कि काबिले तासी है जिनका इतबा किया जाना चाहिए जिसके लिए वो
[29:57]आए हैं वो हमारे सामने से महब हो जाते हैं आपकी सीरत
[30:00]के कई पहलू ऐसे हैं जो हमारे लिए काबिले तासी है यहां
[30:05]पर भी मैं एक जुमला कहता जाऊं और वो ये कि याद
[30:11]रखिएगा ठीक है कि वो हस्तियां बा कमाल है बा फजीलत है
[30:18]इसमें कोई शक नहीं इमत कुबरा पर है अगर किसी मैगनेट पर
[30:24]किसी लोहे को रगड़ना शुरू करते हैं तो थोड़ी देर के बाद
[30:31]उस लोहे में भी वह कशिश आ जाती है जो मैगनेट की
[30:36]कशिश है बस एक मसला यह है बहुत तवज्जो लोहा मैगनेट नहीं
[30:41]बनता है मैगनेट मैगनेट है लोहा लोहा है लेकिन तस्सु से हुआ
[30:49]यह के जो औसाफ वहां है उसकी झलक इधर भी आना शुरू
[30:51]हो गई है इसके लिए जरूरी क्या शय है आमागी इस के
[30:58]लिए जरूरी क्या शय है यानी कि अपने अंदर वह सलाहियत होनी
[31:03]चाहिए कि जो उसके असर को कबूल करे वगरना अगर लोहे की
[31:08]जगह लकड़ी को मैग्नेट प मगड़ रहो लकड़ी लकड़ी रह जाएगी लोहा
[31:11]लो और वो मैग्नेट मैगनेट रह जाएगा इसीलिए घुटने से घुटना मिलाकर
[31:19]बैठ जाना कमाल नहीं होगा सुला कमाल यह होगा कि उनके औसाफ
[31:22]कहां-कहां नजर आना शुरू हो रहे हो अगरचे सलमान अहले बैत के
[31:30]अंदाज के वह इमत कुबरा पर नहीं है लेकिन क्योंकि वह इनकी
[31:34]मारफ रखते हैं सलमान मिना अहल बैत सलमान में वो खुशबू आ
[31:42]रही है जो हमारे अहले बैत की खुशबू है यानी इसे खुशबू
[31:47]ए विला कहते हैं यह ऐसा ही है कि जैसे किसी गुलाब
[31:49]की गठरी को जमीन पर मट्टी पर रख दो और आधे घंटे
[31:54]के बाद उठा लो तो जो खुशबू गुला आपकी है वहां की
[31:59]मट्टी में भी वही खुशबू आएगी आधे घंटे तमस क्या हो गया
[32:05]कि मट्टी में भी गुलाब की खुशबू आ गई देखना यह है
[32:10]40 साल फर्शे अजा पर बैठते हुए हो गया लेकिन क्या मेरे
[32:12]किरदार में खुशबू ए विला आई है अगर तो खुशबू विला आई
[32:18]है यह है वो असर जो अली से हमने ले लेना है
[32:22]बस अजीजो इतस के साथ बहुत से पहलू है जनाबे अमीर के
[32:27]बच्चे बैठे हुए हैं ना मेरे सामने ने जनाबे अमीर की जिंदगी
[32:31]पर नजर डाले यानी वो अली के जिन्होंने आंख खोलते साथ जो
[32:39]चेहरा देखा वह रसूल खुदा का चेहरा देखा जो कलाम किया वह
[32:48]कलामे इलाही था जो गिजा ली वो लबे दहन मुबारक रसूल अल्लाह
[32:55]है किस अंदाज से रसूल अल्लाह यहां से चले अपनी नी अमानत
[32:58]को लेने के लिए और उधर जो काबे का दरवाजा खुल नहीं
[33:03]रहा और अब बिनते असद बाहर आई हैं सवाल करूं उस जमाने
[33:13]में मोबाइल फोन थे तो कैसे पता कि वहां रसूल अल्लाह लेने
[33:17]आ चुके हैं और यहां से बाहर निकल समझ में आ रही
[33:22]है ये बातें किताब में तो नहीं लिखी हुई है कि कैसे
[33:24]पता चला लेकिन लोगों ने तो यही देखा इधर रसूल अल्लाह लेने
[33:30]के लिए चले हैं और उधर बिनते असद अली को लेकर बाहर
[33:36]आए आकर आपकी आगोश में दे दिया जैसे ही आगोश में लिया
[33:39]यहां आपने आंखों को खोल दिया जो अब तक नहीं खोला था
[33:44]तीन दिन गुजर गए हैं आंख नहीं खोली है क्यों चाहते ही
[33:50]यही है कि जब आंख खुले तो पहला चेहरा रसूल अल्लाह का
[33:57]हो इसीलिए शायर ने यहां कहा दोनों की निगाहों में फुरकत के
[34:03]गिले होंगे हैं दोनों की निगाहों में फुरकत के गिले होंगे कुछ
[34:08]फूल तबस्सुम के चेहरे पर खिले होंगे सुन अला कुछ फूल तबस्सुम
[34:15]के चेहरे पर खिले होंगे काबे से कोई पूछे उस वसल के
[34:18]मंजर को जब नूर के दो टुकड़े आपस में दरूद पढ़े मोहम्मद
[34:27]वाले महम्मद जब नूर के दो टुकड़े आपस में मिले होंगे बस
[34:33]अजीजो इस अंदाज से गोया परवरिश ही रसूल खुदा ने की तो
[34:38]वो बच्चा जो आगोश रसूल अल्लाह में परवान चढ़ रहा है यकीनन
[34:45]इस अंदाज से क्या फजीलत रखता होगा तो औसाफ तो वही नजर
[34:47]आएंगे ना कि जो के घुट्टी में दिए गए हैं जो लबे
[34:51]दहन को चूस करर बड़ा हो रहा जब 10 साल का हो
[34:56]गया तो वो पैगाम जो अल्लाह के रसूल ने पहुंचाया मैं तुम्हारे
[35:00]लिए दुनिया और आखिरत की भलाई लेकर आया हूं आप में से
[35:07]कौन है कि जो मेरे इस काम में मददगार हो ताकि मेरा
[35:13]जानशीन मेरा वसी मेरा वजीर करार पाए यह छोटा सा खुतबा है
[35:21]रसूल अल्लाह का जिसको खुतबा ए दार कहते हैं जो आपने दावत
[35:24]जुल अशरा में दिया था खुतबा दार ठीक जुल आशीर में खुतबा
[35:32]दिया कौन उठा मौला अली अल सलाम उम्र तकरीबन 10 साल है
[35:37]एक रिवायत में 13 साल भी लिखी है लेकिन 10 साल की
[35:39]रिवायत ज्यादा है 10 साल के उम्र है यहां पर मेरे सामने
[35:43]बच्चे बैठे हुए हैं जो 10 साल से ज्यादा के लग रहे
[35:46]हैं क्या उम्र है तुम्हारी 11 साल है देखें एक साल यानी
[35:52]कि आपसे भी मौला एक साल छोटे थे कि जब वो मजमे
[35:53]में उठे हैं और मजमे में माशाल्लाह सीनियर सिटीजन भी मौजूद थे
[35:58]सीनियर सिटीजन के होते हुए भी कोई जब सामने ना आ रहा
[36:03]हो और एक बच्चा जो आपसे भी एक साल छोटा हो वह
[36:07]उठे के या रसूल अल्लाह मैं आपका साथ दूंगा बिठा दिया बैठ
[36:13]जाओ फिर कहा कौन है फिर उठे बैठ जाओ फिर कहा कौन
[36:15]है जो साथ देगा फिर उठे फिर बुलाया कहा इन्ना हाज अखी
[36:21]वसी व खलीफ फम यह मेरा भाई है मेरा वसी है मेरा
[36:29]खलीफ है तो मैं यहां पर अबू जहल ने वो टोटिंग की
[36:37]तराज किया अबू तालिब को थोड़ा सा एक टंस किया के कल
[36:43]तक तो भतीजे की इता कर रहे थे अब बेटे की भी
[36:44]तात करोगे तो वो लोग कि जो खिलाफत या वसाय या वजार
[36:51]को इस अंदाज से ले रहे हैं जानशीन को इस अंदाज से
[36:56]कह रहे हैं कि दोस्ती वस्ती का ऐलान हो रहा था तो
[37:01]उनकी अकल लगता है अबू जहल से भी नीचे की है कि
[37:05]अबू जहल तो समझ रहा था कि इनकी किस शय का ऐलान
[37:09]हो रहा है इता की बात हो रही है इतना तो वो
[37:10]भी जानता था कि अगरचे 10 साल का है लेकिन चूंकि इसे
[37:16]जानशीन और खलीफा की हैसियत से पहचन वाना पहचान पहचन वाया है
[37:23]तो मकसद इता है फकत मोहब्बत और उल्फत की बात नहीं हो
[37:26]रही है मोहब्बतों की बात नहीं हो रही है मोहब्बत तो बाप
[37:30]बेटे से किया ही करता है कोई नई चीज नहीं है अब
[37:35]इता करोगे क्यों इसलिए कि इन्होंने कह दिया है बस अजीजो किस
[37:38]मामले में हम और आप उनकी इता कर सकते हैं आइए बहुत
[37:42]तेजी से आगे बढ़े 10 साल के हैं तबलीग दीन में रसूल
[37:49]अल्लाह के शाना बशा रसूल अल्लाह की उम्र कितनी है 40 साल
[37:52]आपकी उम्र कितनी है 10 साल और आप तबलीग दन में साथ
[37:59]साथ है यहां तक के आप इससे पहले भी यह तो अभी
[38:05]वही आ चुकी हैर हो चुका है आप जब हेरा जाते थे
[38:09]ार हेरा तो आप रसूल अल्ला के साथ साथ जाया करते थे
[38:15]और जो पहली वही आई है इसके अल्फाज को आपने सुना है
[38:21]उस वक्त भी आप इतने साथ साथ थेरा साला मैं रहा हूं
[38:30]हर दौर में रसूलल्लाह के साथ हेरा के अंदर देखता था मैं
[38:36]वही के नूर के नूर वही मैं वही के नूर को देखा
[38:42]करता था रिसालत की खुशबू को सघ करता था यह तरबियत है
[38:44]रसूल अल्लाह के आगोश में पला हुआ बच्चा है जो के रिसालत
[38:49]की खुशबू को सूंघ रहा है दुनिया के लिए 40 साल के
[38:53]बाद ऐलान हो रहा है यह कब से रिसालत की खुशबू को
[38:54]सूंघ रहा है बस अजों तो अभी साथ है कब तक साथ
[39:00]रहे मक्के में 13 साल आपने तबलीग की है तो अब कितने
[39:05]साल के हो गए रसूल अल्लाह 53 इयर्स और मौला कितने साल
[39:10]के हो गए 13 साल गुजार दीजिए 23 साल के हो गए
[39:13]23 इयर्स के हो गए 23 साल का अरसा यानी कि 23
[39:14]साल का जवान और उसकी पूरी जिंदगी गुजर रही है व सखियों
[39:20]के अंदर सखियां अपने उरूज पर पहुंच चुकी हैं और अब क्या
[39:25]हो गया है अब मदीना से कुछ ऐसी ब आई है कि
[39:29]जनाब मदीना वाले आमादा है बुला रहे हैं यूं है व है
[39:30]और यहां पर मुश्किलात बढ़ चुकी है तो अब क्या है रसूल
[39:35]अल्लाह हिजरत कर रहे हैं मदीना जा रहे हैं यह बहुत अहम
[39:41]नुक्ता है काबिले तासी क्या ईसार का जजबा कुर्बानी का जजबा अब
[39:46]देख रहे हैं कि हम मदीना जा रहे हैं और मदीना में
[39:51]हुकूमत कायम होने वाली है देखें सख्ती का जमाना गुजर गया जो
[39:53]सख्त तरीन दौर था जब कोई सामने उतरने वाला नहीं नहीं था
[39:58]मैदान में तो जनाबे अमीर सामने उतरते थे मतलब उस जमाने में
[40:00]अगर तबलीग दीन की बात हो रही है मैदान का मतलब जंग
[40:03]का मैदान नहीं वो भी मैदान है बैटल ग्राउंड है इस अंदाज
[40:07]से कि तबलीग हो रही है ओपनली तबलीग हो रही है तो
[40:09]बहुत कम लोग थे जो कि आपके साथ शाना बशा हुआ करते
[40:12]हैं अब जब मदीना आ रहे हैं तो जानते हैं कि मदीना
[40:18]में हुकूमत बनने वाली है तो अब तो उन तमाम जहम तों
[40:22]का समरा है जो आने वाला है इस वक्त अगर जरूरत पड़
[40:28]रही है कि कौन है जो पर सो जाए अपनी जान को
[40:29]रसूल अल्लाह की जान पर निछावर कर दे तो वह भी हमें
[40:34]कोई और हस्ती नहीं जनाबे अमीर की हस्ती नजर आती है कि
[40:38]जहां रसूल अल्लाह पर अपनी जान निछावर करने के लिए वह आमादा
[40:43]है यानी मेरी जान भी चली जाए लेकिन रसूल अल्लाह के ऊपर
[40:46]कोई आंच ना आने पाए उनके मकसद पर कोई आंच ना आने
[40:51]पाए हमें यह सार नजर आया और उसके बाद जब आप अमानतोंबझने
[40:56]जाते हैं तो हम देखते हैं कि दो हिजरी है अब दो
[41:00]साल गुजर गए यानी कि रसूलल्लाह 53 इयर्स के थे अब कितने
[41:04]के हो गए 55 यर्स और मौला जब वहां पर 23 थे
[41:08]तो अब दो साल और गुजर दीजिए तो 25 साल 25 साल
[41:12]का जवान है और अब पहली मर्तबा बदर की लड़ाई हो रही
[41:15]है और तलवार सामने है तो सामने बड़े-बड़े पहलवान मौजूद हैं लेकिन
[41:19]इस अंदाज से मदद करने के लिए वह जो जवानी की उम्र
[41:26]है हमारा जवान पता नहीं वो कौन सा जवान है हमारा 18
[41:32]साल में जवान हो जाता है हमारा बच्चा जो है माशाल्लाह वो
[41:34]भी कड़ियल जवान होता है पता नहीं किस अंदाज का होता है
[41:38]आजकल के जवान क्योंकि वो एक्टिविटीज तो करते ही नहीं मिसाल के
[41:40]तौर पर बस वो अपने इधर-उधर बैठे हुए हैं कहीं फिजिकल एक्टिविटी
[41:44]का तो जमाना ही नहीं रहा पहले जमाने में खेल खेला करते
[41:46]थे अब मोबाइल आ गया है सब चीजें बच्चे भी घर में
[41:51]बैठे-बैठे तमाम चीजों को तो वो जवानी और वो उस अंदाज से
[41:55]तो उस वक्त का जवान 25 साल कहां मौजूद है मैदान में
[42:00]मौजूद है फिर अपनी जान को सामने हाथ प लिए हुए हैं
[42:04]और फिर इस्लाम पर मिटने केलिए मर मिटने के लिए आमादा है
[42:07]शौक शहादत है एक रिवायत में मिलती है कि एक जंग में
[42:11]जाने से पहले रसूल अल्लाह ने बयान किया कि कौन-कौन शहीद हो
[42:13]जाए कितने लोग शहीद होंगे हैं और वो जब जंग खत्म हो
[42:17]गई तो आप शहीद नहीं हुए तो आप अफसुर्दा है उ उस
[42:21]जंग के बाद कि जंग खत्म हो गई मैं शहीद तो हुआ
[42:26]नहीं तो शौक शहादत इतना है क्या उम्र है आपकी 25 साल
[42:31]अभी जज दवाज हुआ है 25 साल की उम्र है हमारा जवान
[42:32]सेटलमेंट होने की बात करता है कि मैं सेटल हो जाऊंगा इधर
[42:37]चला जाऊंगा उधर चला जाऊंगा और मौला शहादत के लिए यह काबिले
[42:43]ताजी बात है या नहीं है यह पहलू हमारे जहन से क्यों
[42:44]महब हो जाते हैं इसके बाद हम देखते हैं के चाहे आपकी
[42:51]इबादत को लिया जाए यानी फकत यह नहीं कि हमें तलवार चलाते
[42:56]हुए नजर आ रहे हैं आपके और हमारे चौथे इमाम इमाम जैनुल
[43:02]आबदीन हैं आबदीन है जाइए जाके रिवायत देखिएगा जैनुल आबिदीन जो इबाद
[43:10]तों की जीनत है रिवायत है कि आपने एक दफ्तर उठाया एक
[43:17]रजिस्टर था जिसके ऊपर जनाबे अमीर की इबादत के हालात लिखे हुए
[43:24]थे तो आपने उसको पढ़ा और पढ़ते पढ़ते पढ़ते दोबारा रख दिया
[43:28]एक जुमला कहा कौन है जो हमारे जद की तरह इबादत अंजाम
[43:34]दे सके यह अली की इबादत थी तो वो जो मैदान में
[43:38]तलवार चलाते हुए नजर आ रहे हैं मेहराब इबादत में भी उस
[43:40]अंदाज से नजर आ रहे कि खुद चौथे इमाम कह रहे हैं
[43:43]कि कौन है जो ऐसी इबादत कर सके तो इस मैदान में
[43:47]भी तो यह सिफत उनकी काबिले तासी है या नहीं है मुझसे
[43:52]17 रकत नहीं पढ़ी जा रही वहां हजार तकबीर की आवाज आ
[43:54]रही है तो क्या यह सिफत भी काबिल ता नहीं है तो
[43:58]हम ये जो मौला अली की जिंदगी के पहलू हैं इसको हमें
[44:03]अपने सामने रखना चाहिए जो आपके और हमारे लिए आपने रखा है
[44:05]इसी तरीके से हमने देखा परवरदिगार आलम के दिए हुए रिजक के
[44:13]ऊपर कनात जो उन्होंने परवरदिगार ने दी वो उनके ऊपर कनात है
[44:18]और जो आ गया उसमें भी अगर किसी को जरूरतमंद पाया तो
[44:24]उसकी जरूरत को अपनी जरूरत पर फकत दे दी रिवायत बहुत सी
[44:31]है अनार का वाकया आपके सामने मौजूद है कि बीवी ने अनार
[44:33]खाने की ख्वाहिश की थी क्या हुआ किस तरीके से गए कितने
[44:38]मुश्किलों से कर्ज मिला फिर अनार लिए वापस आए वो भी दरमियान
[44:40]में मिल गया अब क्या करें दे दिया उसकी राह में दे
[44:46]दिया ठीक है जाओ कहा आधे से क्या होगा पूरा ले लो
[44:52]जाओ खाली हाथ वापस घर आ गए तो ये क्या है यह
[44:57]खुलूस है अली अली है यह चीज काबिले तासी है या नहीं
[44:59]है यानी कि जहां खुद को अपनी मैं को बहुत पीछे रख
[45:04]दिया परवरदिगार आलम की रिजा को सामने रख लिया यह चीज काबिल
[45:10]तासी है या नहीं है मैदान जंग में भी अगर देख रहे
[45:13]हैं कि दरवाजा दो उंगलियों से उखाड़ रहे हैं आप और मैं
[45:15]दो उंगलियों से नहीं उखाड़ पा रहे मैं भी नहीं कह रहा
[45:18]कि यह वाली चीज भी काबिले तासी है ठीक है नहीं है
[45:22]लेकिन उसी जंग के मैदान में हमने एक और चीज देख लिया
[45:23]यह खैबर की बात कर रहा हूं थोड़ा सा खंदक में आ
[45:26]जाए वहां देख ले कि यहां अमर इने अब्दत से लड़ रहे
[45:30]हैं और होते होते एक वक्त ऐसा आया कि करीब है कि
[45:35]उसको वासिल जहन्नम कर दें लेकिन उसने आपके चेहरा अकदर पे लब
[45:41]फेंक दिया अब क्या हुआ आप उठ गए उसके पास से व
[45:43]दूर हो गए और चंद कदम टहलने लगे टहलने के बाद फिर
[45:49]वापस आए फिर जंग की और फिर वो भी पहलवान था लड़
[45:54]रहा था ऐसा नहीं था कि मौला गए और बस उसको काट
[45:58]कर ऐसे आ गए जैसे केक काट कर आ गए ऐसा नहीं
[46:01]है लड़ रहे हैं जंग हो रही है उसके बाद फिर हमला
[46:05]किया और उसे वासले जहन्नम किया जब वापस आए तो पूछा साहब
[46:08]ने कि या अली उसी वक्त क्यों नहीं मार दिया था क्योंकि
[46:12]दूर से नजर तो नहीं आया कि हुआ क्या है तो बयान
[46:16]किया कि उसने मेरे चेहरे पर थूक दिया था तो मेरा नफ्स
[46:21]जो है उसको करात हुई तो यकीनन इंसान के चेहरे पे कोई
[46:27]बेअदब करे अंदर से करात आई है तो अब अगर मैं उसको
[46:29]मारता तो यह करात भी उसके अंदर शामिल हो जाती मैं उठ
[46:35]गया चलने लगा ताकि वह कैफियत बतर हो अब जब तलवार चले
[46:40]तो फकत उसके लिए चलेगी अब समझ में आया वह जो रसूल
[46:50]अल्लाह का जुमला के जर बत अलीन फमल खंदक अन अली की
[46:55]वो एक जर्बत जो खंदक में चल रही है सकलैन की इबादत
[47:02]से अफजल है सकल सिकल सकल गिरा कतर को कहते हैं दो
[47:04]चीजों को कहते हैं मतलब दुनिया और आखिरत दोनों को मिला लो
[47:09]यह जहां वो जहां तमाम की इबाद तों को मिला लो तो
[47:15]वो एक जर्बत अफजल थी क्या मौला की वो पहली जर्बत थी
[47:17]जो खंदक में चली थी यह जर्बत तो बदर में भी चल
[47:22]चुकी है बदर में चली है नहीं चली ओहद में चली है
[47:26]या नहीं चली तो यह तो तीसरे हिजरी की बात है दूसरी
[47:31]हिजरी में दूसरी हिजरी में बदर हुई तीसरी हिजरी में ओहद हुई
[47:34]पांचवीं हिजरी में खंदक हुई ये तो पांचवीं हिजरी में कह रहे
[47:38]हैं कि अली की जर्बत जो है वो खलन की इबादत से
[47:42]अफजल है तो अब तक की जर्बत कौन सी थी अब समझ
[47:44]में आया जरा तवज्जो रखें शायद ये बच्चों के लेवल से बात
[47:46]ऊपर चली जाए लेकिन बड़ों को कह रहा हूं बुजुर्गों को तो
[47:50]सबक सुना रहा हूं जवानों से कह रहा हूं वो जरब कौन
[47:54]सी जरब थी उस जरब को पहचान लो कि जो सकलैन की
[47:55]इबादत से अफजल हो जाती है अब पता चला कि वह जर्बत
[48:00]वहां बाहर नहीं चली असलन जरब तो कहीं और चली है कि
[48:05]इस वक्त गुस्से के आलम में अगर इसे मार दिया जाए तो
[48:09]उसके लिए नहीं अपनी रजा और रगत के लिए मारा है इसीलिए
[48:11]इस कैफियत को कंट्रोल कर लिया और बाद में फिर हमला किया
[48:18]यानी अपने नफ्स पर काबू पाने की जो जर्बत है ये वो
[48:22]जर्बत है जो तलवार चलाने की जर्बत से भी अफजल है दरूद
[48:25]पर मोहम्मद वा अलाहु [संगीत] स अपने नफ्स को कंट्रोल करने के
[48:35]लिए जो जर्बत चलेगी यह जर्बत उस जर्बत से कहीं अफजल होगी
[48:38]जो तलवार इस अंदाज से मैदान में चल रही होगी इसीलिए बाहर
[48:44]जो तलवार चल रही है वह जिहाद है लेकिन जिहाद असगर है
[48:50]जो अंदर तलवार चल रही है यह वो जिहाद है जो जिहाद
[48:52]अकबर है यह जिहाद वो है जो काबिले तासी है नहीं है
[48:56]मैं ठीक है मैं उस अंदाज से बाहर तलवार नहीं चला पा
[49:00]रहा लेकिन यह तलवार तो मेरे हाथ में है इसको तो इस
[49:02]अंदाज से रोक सकते हैं काबिले तासी है बस अजीजो बहुत से
[49:08]अदालत है मौला अली की अदालत अल्लाह अकबर इस अंदाज से कि
[49:15]आने वाला आया और पूछ रहा जब सवाल करना चाहता हूं तो
[49:18]पूछा के मुझसे कोई जाती सवाल है या उमरे सल्तनत से मुतालिक
[49:24]कोई सवाल है बैतुल माल में आपका काम कर रहे थे चिराग
[49:29]जल रहा था आपने पूछा कि मुझसे काम है मेरा कोई जाती
[49:31]मुझसे मसला है या कोई हुकूमत का मामला है कहा नहीं आपसे
[49:36]जाती काम है आपने एक चिराग को बुझाया दूसरे को जला दिया
[49:41]कहा ये क्या किया कहा वो बैतुल माल का चिराग था जो
[49:46]चल रहा था चूंकि अब तुम मुझसे मेरा जाती मसला पूछ रहे
[49:48]हो ये मेरा अपना जाती चिराग है जो मैंने जलाया है ये
[49:54]है अली का आदल इतना भी तसरफती अल्लाह अकबर इस अंदाज से
[49:58]आने वाले कौन थे नाम लेने की जरूरत ही नहीं है गवर्नरशिप
[50:01]लेने आए थे जब ये मामलात देखे भैया यहां तो चिराग भी
[50:04]अलग-अलग हैं तो उन्होंने अपना रास्ता भी अलग ही कर लिया कि
[50:09]यहां पर मिलने वाला कुछ नहीं है यहां तक कि अगर भाई
[50:12]भी कह रहा है कि मुझे ज्यादा मुझे ज्यादा दे दें तो
[50:16]कहे कि क्या मैंने तुम्हें कम दिया है कहा नहीं दिया है
[50:18]सही दिया है लेकिन मुझे ज्यादा दे दें तो उनके हाथ पे
[50:23]भी गर्म सलाख लगा देते हैं और कहते हैं जब वो अपना
[50:24]हाथ हटाते तो कहते हैं कि अच्छा आप तो इस आग से
[50:29]बच रहे हैं और मुझे आग में धकेल रहे हैं अल्लाह अकबर
[50:33]आखरी बात करते हैं और वो यह कि शौक शहादत तो रखते
[50:40]ही थे शाबान के उस खुतला ने उन्हें यह खबर दी कि
[50:46]अली रमजान ही की रात होगी कि तुम्हारी दाढ़ी को तुम्हारे खून
[50:50]से खिजाब किया जाएगा तो शहादत की खबर दे दी तो अब
[50:55]होना क्या चाहिए बहुत तवज्जो शहादत की खबर मिल रही है कत्ल
[51:00]होने की खबर मिल रही है तो पहला सवाल क्या करते हैं
[51:06]या रसूल अल्लाह क्या उस वक्त मेरा दीन सलामत होगा जनाब मकतब
[51:10]के जो रहबर हैं वह यह सवाल कर रहे हैं कि क्या
[51:17]मेरा दीन सलामत होगा तो आज हमें कौन सा सबक पढ़ाया जा
[51:22]रहा है कि तुम्हें कुछ करने की जरूरत ही नहीं है तुम
[51:24]तो जन्नत का टिकट लेकर घर में बैठे हुए हो वो जो
[51:28]रहबर है वो पूछ रहे हैं या रसूल अल्लाह क्या मेरा दीन
[51:34]सलामत होगा आपने कहा जी हां या या अली आपका दीन सलामत
[51:35]होगा बस वो बात जहन में रह गई कि उस वक्त तुम्हारा
[51:40]दीन सलामत होगा वक्त गुजरता गया गुजरता गया यह 11 हिजरी के
[51:47]वाकत हैं अब गुजरता गया वक्त आ गया 40 हिजरी आ गई
[51:52]वो जुमला अभी जबान जहन में मौजूद है हां तुम्हारा दीन सलामत
[51:55]होगा तुम्हारा दीन सलामत हो हो यहां जर्बत चली और अपनी शहादत
[51:59]को सामने देखा जुबान पर हमद जारी यही हो गई फुस्त बिल
[52:04]काबा मैं कामयाब हो गया
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