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Ramzan Mein Logon Ki Soch | Public Interviews | Shaheenbagh New Delhi
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محاضرات
Ramzan Mein Logon Ki Soch | Public Interviews | Shaheenbagh New Delhi Ramzan #Ramadan #StreetInterview #Delhi #ShaheenBagh In this video, we went to Shaheen Bagh, New Delhi and asked Muslims about their Ramzan lifestyle. From roza and ibadat to food and daily routines, people shared their honest thoughts about how they spend Ramzan. Watch these public interviews to see different perspectives about fasting, faith, and iftar during Ramzan.
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Transcript
[0:00]रमजान इंसान को सिर्फ भूखा नहीं रखता। यह महीना इंसान को जिंदा
[0:04]करता है। आज मैं निकला हूं एक सिंपल सवाल के साथ। आपकी
[0:08]नजर में रोजा क्या है?
[0:09]क्या ये सिर्फ सहरी और इफ्तार का रूटीन है या फिर खुद
[0:11]को बदलने का मौका। मेरे लिए रोजा एक सैक्रिफाइस है। परहेजगारी, तकवा
[0:15]ऐसे नहीं बता सकता मैं रोजा क्या है?
[0:17]भयंकर गुस्सा होता है। एक तो जब इंसान भूखा रहता है, तो
[0:21]उसका टेंपरामेंट थोड़ा सा शॉर्ट हो जाता है। भूखे रहने से हम
[0:22]अल्लाह के नजदीक कैसे जाएंगे?
[0:24]ये नहीं है कि रमजान का महीना है तो आप कुर्ता टोपी
[0:26]लगाकर बाइक पे एक, बाइक पे तीन, तीन बाइक पहनो। शहत नहीं
[0:32]है डिजायर्स [संगीत] में। लोग बोलते हैं कि लोगों से स्मेल आ
[0:35]रही आ रही है। रमजान में कुछ खास इबादतें हम करते हैं।
[0:38]वो क्यों करते हैं?
[0:39]क्यों?
[0:40]क्यों का वजह नहीं है ना?
[0:42]हर चीज का जवाब आपको नहीं मिल पाएगा। खाना आगे है। हां।
[0:45]बैठे हुए हैं वरना इस दुनिया में कोई ऐसी ताकत नहीं। मुझे
[0:50]खाने से रोक ले। बिलकुल। आज हम सुनेंगे आवाम की आवाज। देखते
[0:53]हैं रमजान लोगों के दिलों में है या सिर्फ कैलेंडर में। अस्सलाम
[0:57]वालेकुम। मेरा नाम है अयाज़ और आप देख रहे हैं सबील वॉक्स
[0:59]बाय सबील मीडिया। ठीक है। अस्सलाम वालेकुम। वालेकुम अस्सलाम। आपके लिए रोजा
[1:07]क्या है?
[1:06]रोजा हमारे लिए गुनाहों से दूर होने का एक बहुत बेहतरीन महीना
[1:11]है। जिसमें हम साल भर तो हम अपने स्टूडेंट हैं। अब तो
[1:17]हम अपने अकॉर्डिंग बताएंगे ही कि साल भर तो हम इतना तकवा
[1:19]परहेज परहेजगारी नहीं कर पाते हैं। लेकिन रमजान में स्पेशली हम लोग
[1:24]इसका ख्याल रखते हैं। रमजान एक बहुत पाक महीना है और इबादत
[1:29]का महीना है और अल्लाह से करीबी का महीना है। रोजा एक
[1:31]इबादत है जिसमें हम अपने नफ्स को काबू में कर सकते हैं।
[1:35]गुनाहों से बचने का एक तरीका खुदा ने मौका दिया है आपको
[1:40]कि दोबारा उसकी तरफ पलट आए और इस महीने मुबारक में खुदा
[1:43]इतना मेहरबान होता है वो इंसान के हर उस गुनाह को माफ
[1:47]करता है जो उसने पूरे साल में किए हैं। आपके लिए रोजा
[1:49]क्या है?
[1:50]रोजा जी ऐसे नहीं बता सकता मैं रोजा क्या है?
[1:53]मतलब रोज़े की तारीफ आपके लिए रोजा क्या है?
[1:59]आपके लिए क्या चीजें ला रहा है?
[2:00]आप रोज़े को क्या समझते हैं?
[2:02]क्या आप इसको सोशल फेस्टिवल रूटीन चेंज एक इबादत का महीना समझते
[2:06]हैं?
[2:05]इबादत है। इबादत है। पर्सनल चीज इबादत है। उसमें मैं क्या बताऊं
[2:09]कि क्या समझता हूं, क्या नहीं समझता हूं। बस एक लाइन में
[2:16]कहें तो आप इस मस्जिद को देख के आप ये कह सकते
[2:22]हैं कि ये उम्मत गफलत में जी रही है। रमजान की वजह
[2:25]से अब सुधर रही है। रमजान में सुधर रही। मतलब एक कह
[2:29]रहे हैं कि हां थोड़ी देर के लिए उनको लगता है कि
[2:30]एक महीना का इबादत है। इबादत कर लिया और फिर छुट्टी। हां।
[2:34]जैसे आप तरावीह के देखिए 10 दिन पढ़ लिए तरावीह फिर छुट्टी।
[2:39]हालांकि तरावीह चांद देख के शुरू होती है। चांद देख के खत्म
[2:41]होती है। मेरे लिए रोजा एक सैक्रिफाइस है। जो हम अपने नबी
[2:46]की मोहब्बत में ये जो रमजान का महीना है बहुत ही पाक
[2:48]साफ है। हम अपने और सभी कामों को छोड़कर या और उनके
[2:52]साथ-साथ करते हुए हम भूखे प्यासे रहते हैं। तो मेरे लिए रोजा
[2:56]है। ये एक अपने नबी की मोहब्बत है और एक ये सैक्रिफाइस
[2:58]भी है। रोजा हमारे लिए जो है बहुत अहम चीज है और
[3:01]रोजा से बहुत फायदा है। जैसे फायदों में क्या-क्या आता है?
[3:09]रोजा रखने से साइंस यह बताती है अगर कोई शख्स 12 महीने
[3:11]में एक महीने तकरीबन 12 से 14 घंटे रोजे रखे तो बहुत
[3:17]सारी बीमारियों से इंसान बच सकता है। बहुत सारे जैसे कैंसर नहीं
[3:20]हो सकता और बहुत सारी बीमारियों से क्योंकि साल में कुछ दिन
[3:25]पेट को जो है कुछ वक्त के लिए भूखा रखना चाहिए। हम
[3:27]इसलिए हम रोजा रखते हैं। रमजान मेरे लिए एक इबादत है और
[3:33]एक फीलिंग है जो हमें रमजान रखकर समझ में आती है कि
[3:38]जो गरीब लोग हैं जिन लोगों को खाना टाइम से नहीं मिलता
[3:42]है। जिनको पीना टाइम से नहीं मिलता तो वो किस दर्द से
[3:44]गुजरते हैं। यहां पे लोग भाग रहे हैं। पता नहीं यहां जबरदस्ती
[3:46]कैमरा ऑन करके सामने जा रहा हूं। फिर ले रहा हूं इनकी
[3:52]रिकॉर्डिंग। [संगीत] आपको क्या लगता है?
[4:00]रमजान हमारे लिए एक सोशल फेस्टिवल है। इबादत का महीना [संगीत] है
[4:03]या एक रूटीन चेंज का महीना है?
[4:05]मुझे लगता है तीनों है इसमें चीजें। [संगीत] तीनों मिली हुई है
[4:11]क्योंकि इबादत है। खुदा से करीबी है और सोशल गैदरिंग [संगीत] भी
[4:13]हो जाती है कि मतलब सब लोग एक साथ एक दस्तरखान पर
[4:18]बैठकर के इफ्तार कर रहे हैं। एक साथ सहरी कर रहे हैं।
[4:22]कल्चरल भी चीज भी है। नहीं रूटीन चेंज का महीना तो नहीं
[4:25]कहा जाएगा क्योंकि ये चीज आप कहें फिर साबित कैसे करेंगे कहां
[4:28]है?
[4:29]तो सोशल फेस्टिवल तो बेसिकली ये है कि मिलना मिलाना मोहब्बत और
[4:32]जिस तरीके से जो नेगेटिव चीजें हैं मोहब्बत बढ़ जाती है रमजान
[4:37]में बढ़ जाती है क्योंकि इस हां क्योंकि इंसान भूखा रहता है
[4:39]उसका एक असर इंसान पे होता है और फिर खुदा ने जिस
[4:42]तरीके का इस्म में रहमत और बरकतों वाली बात कही है तो
[4:46]उसका एक असर नजर आता है लोगों पे भी तो अग्रेशन और
[4:46]वो जिस तरीके की टेंशन फुजूल की बातें बैटिंग ये सब चीज
[4:50]इंसान खुद ही बचने लगता है परहेज करता है ये मेरे लिए
[4:53]तो मेरा अपना एक्सपीरियंस है जब रमजान आता है तो मेरा एक
[4:57]रूटीन भी चेंज हो जाता हमारा एकदम मतलब जैसे हम अदर दिन
[4:58]रहते हैं रमजान में एकदम अलग हो जाते हैं। मतलब अलग तरीके
[5:02]से रहते हैं और बहुत ही एक अच्छा एक्सपीरियंस होता है। बचपने
[5:07]से जब भी यहां रमजान आया है हमें एक ऐसा फील होता
[5:09]है जिससे एक स्पिरिचुअल मतलब कि एकदम अलग से एक एनर्जी अंदर
[5:12]से लगती है कि हां अल्लाह के साथ कनेक्शन अल्लाह के साथ
[5:15]कनेक्शन अच्छा हो जाता है और बहुत सी चीज़ शैतान से दूरी
[5:18]शैतान से दूरी हो जाती है। ऑफ कोर्स वो इबादत है हमारी
[5:22]रूटीन चेंज तो है ही क्योंकि उससे एक तो अगर साइंस तौर
[5:26]पे देखा जाए तो भूखा रहना चाहिए इंसान को एक साल में
[5:28]कम से कम एक में 30 दिन लेकिन रोजा हमारे लिए एक
[5:31]इबादत है और बहुत अफजल इबादत है रोजा हमारे लिए तो क्या
[5:34]हमें सिर्फ रमजान में इबादत करनी है नहीं रमजान रमजान में तो
[5:38]फर्ज है रोजा रखना है हम आम दिनों में भी इसको रोजे
[5:41]को रख सकते हैं आम दिनों में भी उसका सवाब है लेकिन
[5:42]रमजान में जो उसका सवाब है वो आम दिनों में उसका सवाब
[5:46]नहीं मिलेगा रमजान में बहुत फजीलत पड़ जाती है रोजे की बिल्कुल
[5:48]देखिए शौक ऑफ हर जगह है। ये नहीं है कि रमजान का
[5:52]महीना है तो आप कुर्ता टोपी लगाकर बाइक पे एक बाइक पे
[5:56]तीन, तीन बाइक पे नौ इस तरीके से घूमेंगे और उसको सभी
[5:57]को दिखाएंगे कि रमजान का महीना है। रमजान का महीना में दिखाने
[6:01]से रमजान का महीना रमजान का महीना नहीं हो जाता। इबादत करने
[6:03]से होगा। ठीक है?
[6:04]आप पांचों टाइम की नमाज़ें पढ़ें, तहज्जुद पढ़ें, कुरान पढ़ें, लोगों की
[6:07]मदद करें, लोगों को इफ्तार कराएं। जिसका बहुत ही आला सवाब है।
[6:10]आपके बचपन का रमजान और आज का रमजान आपको क्या फर्क दिखती
[6:15]है?
[6:14]फैमिली मेंबर्स की कमी लगती है अपने नहीं आसपास क्योंकि बहुत कैसा
[6:18]लगता है घर से दूर होकर रमजान बिताना अकेलापन तो लगता है
[6:23]बट ठीक है जहां पर अल्लाह की मर्जी हो वहां बेहतर है
[6:28]चीजें आप अकेली खुद मैनेज करते हो सारा जी अल्हम्दुलिल्लाह कुकिंग सब
[6:32]कुछ जी अल्हम्दुलिल्लाह बहुत फर्क था बचपन में उतनी जब हम छोटे
[6:35]थे सात आठ साल उतनी समझदारी नहीं थी अल्हम्दुलिल्लाह आज मैं एक
[6:38]हाफिज कुरान आलिम दीन हूं मैंने दारूम देवबंद में इल्म हासिल किया
[6:44]बचपन के रमजान में मतलब कि जब रोज़ वाजिब नहीं थे तब
[6:46]ज्यादा वो रहता था कि खाना पीना बस उससे ज्यादा हुआ था।
[6:51]अब इबादत की तरफ ज्यादा मुतवजे हैं। बचपन में हम समझते थे
[6:56]कि सिर्फ खाने पीने का रोजा है। तो हम बहुत इंतजार करते
[6:58]थे कि इफ्तारी कब आएगी कब आएगी। लेकिन अब बड़े होते बड़े
[7:02]हो रहे हैं तो हमें धीरे-धीरे रियलाइज हो रहा है कि रमजान
[7:05]सिर्फ खाने का नहीं है। रमजान में खुदा मेहरबान होता है। आपकी
[7:12]इबादत का सवाब हो जाता है। और रमजान में सिर्फ खाने का
[7:15]भरोसा नहीं है। आपके गलत अल्फाजों का आपके न आपके डिजायर्स का
[7:22]जैसे मैंने खुद अपने डिजायर्स को कंट्रोल किया। वो वाला रूटीन मेरा
[7:26]आ जाता है। क्या है आपके डिजायर्स?
[7:30]बेसिकली डिजायर्स जैसे कि एक्स्ट्रा एंटरटेनमेंट में टाइम देना, फोन में अपना
[7:35]ज्यादा टाइम देना वो सब शहत नहीं है डिजायर्स में शहत अट्रैक्शन
[7:43]टुवर्ड्स फीमेल्स वो कंट्रोल हो पा रहा है वो कंट्रोल हो जाता
[7:48]है वो मेरा पहले से कंट्रोल कर लिया मैंने चलिए माशा्लाह कैसा
[7:50]गया आपका पहला रोजा मेरा पहला रोजा था कि मुझे इतनी समझ
[7:55]नहीं थी कि पहला अगर आपने अनजान में कुछ खा लिया है
[7:57]तो वो रोजा रोजा बाततिल नहीं होगा। लेकिन मैंने खा लिया और
[8:02]मुझे घर वाले मना करते रहे मत खाओ। मुझे लगा अब तो
[8:06]बाततिल हो गया है। उन्होंने कहा कि मत खाओ लेकिन मैं खाता
[8:07]रहा। मैं ये कहूंगा कि रमजान में बहुत सारे काम आसान हो
[8:10]जाते हैं इंसान के। खाने पीने की टेंशन ही खत्म हो जाती
[8:13]है। तो इंसान अपने काम पे फोकस कर सकता है। आपको रमजान
[8:15]में सबसे अच्छी और सबसे मुश्किल चीज क्या लगती है?
[8:17]सबसे अच्छी चीज ये लगती है कि इंसान जो है वो अपने
[8:20]गुनाहों से दूर हो जाता है। खुदा के करीब हो जाता है।
[8:23]और सबसे मुश्किल काम इंसान के लिए बेसिक लेवल पे ये है
[8:26]कि वो अपने नफ्स पे काबू कर कर सके। क्योंकि नफ्स पे
[8:29]काबू करना सबसे मुश्किल काम है। जी मुश्किल तो हिस्सा ऐसा कुछ
[8:33]भी नहीं है क्योंकि मुझे नहीं लगता कि मैं अगर सुबह से
[8:34]ले शाम शाम तक अगर भूखा हूं तो मैं बिल्कुल मरने की
[8:38]तादाद पे पहुंच चुका हूं। तो मुझे नहीं लगता कि रमजान रखना
[8:42]मेरे लिए कोई ऐसी मुश्किल बात है। और सबसे अच्छी बात ये
[8:44]है कि कि हम इस चीज पर अमल कर पाते हैं। जो
[8:47]कि हमें हर महीने खाने के लिए कभी कुछ ना कुछ चाहिए।
[8:50]कभी फास्ट फूड चाहिए। कभी जंक फूड, कभी हमें बिरयानी, कोरमा खाना
[8:52]है। रमजान एक ऐसा है कि आप सहरी से लेके बिल्कुल बिल्कुल
[8:56]से कंट्रोल करते हैं। तो मेरे लिए सबसे अच्छा यह है कि
[9:00]आप कंट्रोल करते हैं अपनी चीजों पे, अपने डिमांड्स पे, अपने डिजायर्स
[9:03]पे। सबसे मुश्किल है कि रमजान रखकर काम करना और सबसे अच्छी
[9:06]चीज भी यही है कि रमजान रखकर काम करना और हमें एहसास
[9:10]होना कि गरीब लोग किस दर्द से गुजरते हैं, किस पेन से
[9:12]गुजरते हैं। रमजान में सबसे अच्छा और सबसे मुश्किल हिस्सा क्या है?
[9:18]देखिए मेरे लिए मुश्किल कोई हिस्सा नहीं है। ऐसा नहीं है कि
[9:23]मैं भी काम कर रहा हूं, बिनेस कर रहा हूं। लेकिन ऐसा
[9:26]नहीं है कि पागल है थोड़ा बहुत। नहीं बिल्कुल भी नहीं। कुछ
[9:30]भी नहीं। कुछ भी नहीं। मेरा अपना मामूल है। पहले से रमजान
[9:32]में मेरा नियत होता है कि भाई तरावीह पढ़ के आना है।
[9:37]खाना खाना है। सो जाना है। फिर तहज्जुद में जगना है। फिर
[9:38]अपना ये करना है। इशाक पढ़ के आना है। फिर सोना है।
[9:42]जोहर से पहले एक डेढ़ घंटा पहले जग गए हैं। अपना जो
[9:46]कॉल करना हुआ किए हैं। फिर दोहर की नमाज पढ़े। कहीं जाना
[9:48]हुआ चले गए। सबसे अच्छा पार्ट रोज़ में क्या लगता है?
[9:52]सबसे अच्छा पार्ट रोज़ में अफ्तार के वक्त खाना आगे है बैठे
[10:03]हुए हैं और अल्लाह की एक हुकुम कि रुके रहना है और
[10:09]रुके हुए हैं। बिल्कुल वरना इस दुनिया में कोई ऐसी ताकत नहीं
[10:16]कि दूसरे की बात नहीं मुझे खाने से रोक ले। बिल्कुल। मेरे
[10:18]सामने खाना है। भूख लगी हुई है। मैं खाऊंगा। लेकिन अल्लाह की
[10:21]एक हुकुम बंदा रोका। आपको क्या लगता है?
[10:25]कैसे हम अल्लाह के क्लोज होते हैं?
[10:27]भूखा रहने से। अल्लाह ने जो हुकुम दिया है भूखा रहने का
[10:30]भूखा ही नहीं रहना है हमें और भी इबादत भी करनी है
[10:34]और भूखा रहने से अज़ाब इनिशियली महसूस हो सकता है इंसान की
[10:38]नजर में बट अगर हम साइंस के अकॉर्डिंग देखें तो हमें काफी
[10:43]बॉडी में जो फायदे मिलते हैं वो चीज हम इग्नोर इसलिए हम
[10:46]कह सकते हैं बॉडी डिटॉक्स होती है या हां इसलिए ले जाती
[10:50]है क्योंकि हम अल्लाह का हुकुम मानते हैं चाहे तो हम खाना
[10:54]खा सकते हैं लेकिन ये हमारे रब का हुकुम है अल्लाह का
[10:56]फरमान है इसलिए इसलिए हम रोजा रखते हैं। अल्लाह के हुक्म की
[11:01]तावेदारी करते हैं। अल्लाह खाना रखा हुआ। हर चीज अच्छी-अच्छी नेमतें रखी
[11:04]हुई लेकिन फिर भी हम नहीं खाते। इसलिए क्योंकि मेरे रब का
[11:06]हुकुम है अभी नहीं खाना। जब अल्लाह का हुक्म होता है तब
[11:09]हम खाना खाते हैं। देखिए जब हम रोजा रखते हैं तो हम
[11:14]बहुत सारी चीजों से दूर होते हैं। सपोज के जो हम ज्यादा
[11:15]खाना खाते हैं उससे हमारे करीब जो है बीमारियां पैदा होती है
[11:20]बहुत सारी जिस्म के अंदर उस बीमारियों से हम दूर हो सकते
[11:21]हैं। मतलब कोलेस्ट्रॉल हमारा कंट्रोल हो सकता है। प्लस हमारा रूह जो
[11:25]है वो उसको ताजगी मिल सकती है कि हम अपने आप को
[11:28]गबत करने से रोकते हैं। दूसरों से लड़ाई करने से रोकते हैं।
[11:30]ये सब चीजें हमें तो रमजान हमारे लिए एक स्पिरिचुअल ग्रोथ है।
[11:34]बिल्कुल ना कि बस दुनियावी लिहाज से हम नहीं बॉडी को थोड़ा
[11:39]क्लियर करे हुए स्पिरिचुअल सारा स्पिरिचुअल चलिए गुस्सा आता है गुस्सा आता
[11:47]है लेकिन जाहिर सी बात है अभी मौलाना ने बताया कि गुस्सा
[11:49]इंसान को आता है लेकिन जो इंसान गुस्से को रोक रोक लेता
[11:54]है और दूसरे को माफ कर देता है खुदा उस [संगीत] उन्हीं
[11:56]लोगों को दोष रखता है। नॉर्मल इंसान हूं मैं तो गुस्सा आता
[12:00]है बट मैं कोशिश करता हूं कि मैं उसको कंट्रोल कर सकूं।
[12:03]तो एक्चुअली क्या रीजन है रोज़ में गुस्सा आने का?
[12:06]एक तो जब इंसान भूखा रहता है तो उसका टपरामेंट थोड़ा सा
[12:10]शॉर्ट हो जाता है। तो ये वजह होती है कि उसे गुस्सा
[12:11]आता है। बट जैसे कि अभी मौलाना साहब ने भी जिक्र किया
[12:16]कि गुस्से को काबू करना बहुत जरूरी है और इससे इंसान खुदा
[12:19]का दोस्त बन जाता है। नहीं मेरी फैमिली में मैंने कभी ऐसा
[12:22]फेस नहीं किया है क्योंकि वो गुस्सा अगर गलत काम हो गया
[12:24]है तो वो चाहे रमजान हो या बाकी महीना हो भयंकर गुस्सा
[12:27]होता है। रोजे में गुस्सा आता है। नहीं गुस्सा अगर आए तो
[12:31]फिर भी गुस्सा कंट्रोल करना चाहिए क्योंकि सब्र का बदला जन्नत है।
[12:34]बिल्कुल। खासकर रमजान में ज्यादा सब्र दिखाना होता है। तो बेसिकली रमजान
[12:38]में हम सब्र सीखते हैं, तकवा सीखते हैं, परहेजगारी सीखते हैं। नहीं
[12:43]आता है। सबसे अच्छी बात ये है कि मुझे तो नहीं आता
[12:45]है और लोगों का पता नहीं। कई बार होता होगा कि लोग
[12:49]बार चिड़चिड़े हो जाते होंगे। लेकिन मुझे हमेशा ये दिमाग में रहता
[12:53]है कि मेरा रमजान है और मैं खुदा की इबादत कर रहा
[12:54]हूं। तो मुझे कभी भी गुस्सा नहीं आता। तो कैसे मैनेज कर
[12:57]लेते हो आप स्टडीज और रोजा?
[12:59]ज्यादातर हमारे कॉलेज की छुट्टी रहती है लेकिन फिर भी रमजान में
[13:06]रात भर इबादत और पढ़ाई जो भी है और सुबह को अगर
[13:11]कॉलेज होगा तो दो-ती घंटे की नींद लेके उसके बाद कॉलेज से
[13:14]आने के बाद ऐसे ही ड्रेस ले लेंगे कॉलेज जाने के बाद
[13:20]फिर इफ्तारी के बाद फिर वही जिम और स्टडी अपनी और इबादत
[13:22]तो आपका रूटीन चेंज हो जाता है। रोज़ की हालत में पढ़ाई
[13:25]कैसे मैनेज कर लेते हैं आप?
[13:26]मेरे लिए रोज़े की हालत पढ़ाई करना ज़्यादा अच्छा हो जाता है।
[13:29]आसान हो जाता है। हां। और रोज़ा कोई रुकावट नहीं है। मैं
[13:33]समझता हूं ये इंसान को बहुत एनर्जी मज़द एनर्जी कर देता है।
[13:35]ये रोज़ा कोई रुकावट नहीं है। कोई हर्डल नहीं है। मेरा ऐसा
[13:38]मानना है क्योंकि मैं खुद अब इस चीज को एक्सपीरियंस करता हूं।
[13:40]तो मैंने फिर कहा कि ये सब्जेक्टिव चीज हो सकती है। हो
[13:43]सकता है किसी और के लिए ऐसा ना हो। लेकिन बहरहाल रोजा
[13:45]रख के किसी को प्रॉब्लम नहीं होगी। ये अगर होती तो खुदा
[13:49]अपने बंदे को अज़ियत में नहीं डालता। तो एक प्रिंसिपल है। आपका
[13:51]नाइट रूटीन चेंज हो जाता है। थोड़ा डिस्ट्रॉय सा हो जाता है।
[13:56]नहीं देखो हां मैं जर्नलिज्म से हूं तो मेरा तो नाइट रूटीन
[13:58]वही मतलब रहता है कि नाइट में ही सबसे ज्यादा काम होता
[14:02]है। चलिए देखिए मैं डॉक्टर हूं। ईएनटी सर्जन हूं। ठीक?
[14:06]तो मेरा दिन ऐसे ही चला जाता है। मैं वैसे भी दिन
[14:09]में 5:00 बजे खाता था। अच्छा। ठीक है। मेरे को मतलब खाने
[14:13]भूख और प्यास में एस सच वैसे भी टाइम नहीं मिल पाता
[14:15]है। वही है उसमें बीच में हम इबादत का टाइम निकाल लेते
[14:19]हैं। नमाज का टाइम निकाल लेते हैं। जैसे भी हो खाने और
[14:21]पीने का तो वैसे भी नहीं मिलता। अब एक फाइनल मैसेज रमजान
[14:25]का असली मकसद क्या है?
[14:26]रमजान का असली मकसद है सिर्फ और सिर्फ इबादत। और जो चीज
[14:32]रमजान में आप कर सकते हैं तो वो आप पूरे साल कर
[14:37]सकते हैं कि जो गरीब लोग हैं जो जो गुरबत में जी
[14:39]रहे हैं उनकी परेशानियां समझना और उनके साथ ऐसे ही हम्ल रहना
[14:45]जिस तरह आप रमजान में रहते हैं और जो जो गरीब लोग
[14:49]हैं उनकी मदद करना और खुदा की इबादत करना। रमजान का असली
[14:52]मकसद है इबादत करना। अपने से नीचे वाले को देखकर उसकी मदद
[14:59]करना। अपने आप पर काबू रखना। रमजान का असल मकसद है कि
[15:00]जो गरीब लोग हैं जो जो गुर्बत में जी रहे हैं उनकी
[15:05]परेशानियां समझना और उनके साथ [संगीत] ऐसे ही हम्ल रहना जिस तरह
[15:11]आप रमजान में रहते हैं और जो जो गरीब लोग हैं उनकी
[15:12]मदद करना और खुदा की इबादत करना। तो ये थी आवाम की
[15:16]सोच। हर किसी का रमजान अलग होता है। लेकिन मकसद एक ही
[15:20]होता है अल्लाह के करीब जाना। तो आपके लिए रमजान क्या है?
[15:22]कमेंट्स में जरूर लिखना। अगर वीडियो पसंद आई तो शेयर जरूर करना।
[15:29]शायद किसी का रमजान बेहतर हो जाए। खुदा हाफिज।
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