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11 Bekeken · 25/07/01
10 Bekeken · 25/10/08
Ayyame Aza mein Shadi Ya Ayyame Aza mein Matam? | Muharram Main Shadi Karna? | Youth Vibe
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9 Bekeken·
24/08/10
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[0:00]दुश्मन को खले का ना अद करना अया में अजा में आराम
[0:05]नहीं है जायज है क्लियर होना चाहिए हमारे लोगों के लिए मोमिनीन
[0:09]के लिए ये बात के शरीयत क्या हुक्म देती है हराम है
[0:13]आपके लिए लेकिन अगर शिया ने हैदर कर्रार सवाल ये करें आपको
[0:16]अख्तियार दिया गया है एक तरफ अया मेंे अजा और एक तरफ
[0:19]आप खुशी आपकी इंसानियत के नाते आपको अख्तियार दिया गया है हो
[0:23]सकता है कि हालात की वजह से हम शादी कैंसिल ना कर
[0:26]सके रमत को पामा मत कीजिए और रिवाय तों की भरमार है
[0:28]अगर आप देखना चाहे अकली तौर पर तो फैसला कर दया शर
[0:31]बताइए हमें मसला क्या है अजु बिल्ला मिन शैतान रम बिस्मिल्लाह रहमान
[0:39]रहीम मौलाना साहब सलाम अलेकुम वालेकुम अस्सलाम रहमतुल्लाह व बरकात प्रोग्राम यूथ
[0:43]वाइब में आपका खैर मकदम है कबल इसके कि मौलाना साहब हम
[0:48]प्रोग्राम को शुरू करें थोड़ा सा हमारे नाजरीन को जो है अपना
[0:50]तारुफ दे दें जी मैं सैयद मोहम्मद अब्बास रिजवी हिंदुस्तान से मेरा
[0:56]ताल्लुक है और हमारा तालीमी सिलसिला जो है व हौज इलमिया कुम
[0:58]से रहा है तो चलते हैं अपने पहले सवाल की जानिब माहे
[1:03]मुहर्रम और माहे सफर खुसूस 10 मुहर्रम को जो है शरन शादी
[1:05]करना निकाह करना अगद करना शरन इसमें क्या कबाह है अजु बिल्लाह
[1:12]मिन शैतान रजी बिस्मिल्लाह रहमान रहीम वब नस्त सवाल काफी आपका अच्छा
[1:16]है और इस वक्त माशे की जरूरत है मैं समझता हूं लेकिन
[1:20]जवाब को पहले एक छोटा सा मुकद्दमा पेश करके फिर जवाब आपको
[1:22]देता हूं इंशा अल्लाह देखिए शादी एक ऐसा अमल है कि जिसमें
[1:27]इंसान खुशी का इजहार करता है और यह जो सिलसिला है अया
[1:31]अज का यह गम का है तो खुशी और गम एक दूसरे
[1:34]के अपोजिट है एक साथ जमा नहीं हो सकते आप यह कहें
[1:35]कि हम तो सिर्फ अद करते हैं और खुशी नहीं मनाते तो
[1:38]ये मुमकिन नहीं है कम से कम जिसका अद है वो तो
[1:41]खुश है ना या ये कि कोई खास मसला हो किसी की
[1:44]गन पॉइंट पे शादी हो रही हो तो वो एक अलग मसला
[1:46]है वरना वो खुश भी है और यह भी कह रहा है
[1:48]कि हम अया में अजा नबी के नवासे का गम भी मना
[1:50]रहे हैं ये दोनों एक साथ मुमकिन नहीं है या खुशी मनाए
[1:51]या गम मनाए पैगंबर अकरम सल्लल्लाहु अहि वसल्लम जब खुश है तो
[1:57]हमें खुश होना चाहिए जब वो मगम है तो हमें भी मगम
[2:00]होना चाहिए ये मेयार बनाकर हम चले तो हमें कोई मुश्किल नहीं
[2:03]होगी हमें यह देखना है कि पैगंबर आयाम अजा में खुश हैं
[2:07]या मगम है तो पहली रवायत आप देखें कि जिब्रील अमीन आए
[2:10]और खबर दी पैगंबर मगम है आंखों से आंसू जारी है बल्कि
[2:14]पैगंबर ने लोगों को भी वसीयत की इमाम हुसैन अल सलाम के
[2:19]बारे में कि जो इन पर मुसीबतें आएंगी उनके गम को मनाया
[2:20]जाए तो अब यह सवाल होता है कि क्या पैगंबर अकरम ने
[2:24]मना किया यानी शरीयत इस्लाम ने अद करने को मना किया शरीयत
[2:29]से पहले अकली आते हैं अकली तौर पर क्या जो इंसान अया
[2:31]में गम में है वह अपने यहां शादी रख सकता है मैं
[2:36]पहले माशे की मिसाल देता हूं हम और आप आमने-सामने रहते हैं
[2:39]हो सकता है हमारा और आपका मजहब भी एक ना हो लेकिन
[2:40]सामने वाले घर में एक 18 बरस के जवान के लड़के की
[2:44]मयत हो गई मौत हो गई हमारे यहां खुशी है क्या हमारी
[2:48]खुशी पर असर पड़ेगा हो सकता है कि हालात की वजह से
[2:49]हम शादी कैंसिल ना कर सके क्योंकि एहतमाम होते हैं लेकिन वो
[2:54]जो खुशी थी सिर्फ एक पड़ोसी के होने की वजह से जो
[2:58]हमारा हम मजहब भी नहीं था इंसानियत के नाते असर असर अंदाज
[3:00]हो जाती है एहतराम की वजह से असर अंदाज हो जाती है
[3:04]पड़ोसी छोड़ दीजिए हमारा भाई सामने रहता है हमारा रिश्तेदार सामने रहता
[3:06]है तो जैसे-जैसे रिश्ता मजबूत हो जाएगा वैसे-वैसे गम मजबूत होता जाएगा
[3:11]रिश्तेदार नातेदार छोड़ दीजिए हम उसकी बात कर रहे हैं जिस परे
[3:15]हमारे मां-बाप फिदा हो जाएं हम कायनात के रसूल की बात कर
[3:18]रहे हैं हम वारिस रसूल की बात कर रहे हैं हम फर्जंद
[3:19]रसूल की बात कर रहे हैं उनके घर में गम है तो
[3:23]कैसे मुमकिन है कि हमारे घर में शादी हो जाए रोज महशर
[3:26]क्या आपकी मुलाकात रसूल अकरम से नहीं होगी और अगर होगी और
[3:29]उन्होंने पूछ लिया ए मेरे कलमा पढ़ने वाले मेरे नवासे की शहादत
[3:34]का दिन था और तू अपने बेटे या बेटी की शादी में
[3:38]खुशी मना रहा था मशगूल था तो क्या जवाब दे सकते हैं
[3:40]आंखें मिला सकते हैं पैगंबर के सामने खड़े हो सकते हैं ये
[3:44]तो एक अकली बात है कि इंसान नहीं कर सकता जिस घर
[3:47]में शादी है उसी घर में मौत हो जाए तो हालात बदल
[3:50]जाते हैं यह सिर्फ अजज और अकार की बात है और ना
[3:50]यह कि वो कि जिसने इंसानियत और बशरी अत पर एहसान किया
[3:55]हो बल्कि हम तो अकली तौर पर यह कहते हैं कि अल्लाह
[3:58]ने हमें 12 महीने दिए हैं ना वही अल्लाह ये कहता है
[4:03]आप हदीस के साम में मुराज कीजिए इनी माल समाया मया हमने
[4:05]जमीन आसमान कायनात यह खल्क की है अहले बैत के सदके में
[4:09]जिन अहले बैत के सदके में अल्लाह ने हमें 12 महीने दिए
[4:10]क्या उन अहले बैत को हम दो महीने नहीं दे सकते कि
[4:13]हम आपके गम में शरीक हैं उसके बाद तो 10 महीने बचे
[4:16]हैं ना हमारे पास तो हमें अकली तौर पर अखलाकी तौर पर
[4:20]इंसान होने के नाते बशर होने के नाते रसूल खुदा की वजह
[4:22]से जिनका हम कलमा पढ़ते हैं जिनके नाम पर हम जीते हैं
[4:25]मरते हैं अगर बात आ जाए तो हम कहते हैं कि रसूल
[4:29]के नाम पर अपनी जान दे देंगे जान मत दीजिए रसूल के
[4:32]नाम पर यह गम मना लीजिए जो रसूल को महबूब है यह
[4:35]गम खुद मनाना चाहते थे रसूल तो आइए इतना तो कर लीजिए
[4:37]कम से कम रसूल के नाम पर यह अकली तरीका हो गया
[4:41]जो हम एक नफ्स नफ्स तौर पर कह सकते हैं कि इस
[4:46]बात को करना चाहिए ठीक है मौलाना साहब रोज आशूर जो है
[4:50]शहादत का दिन है रोज आशूर गम का दिन है हम जो
[4:53]है अपने आप को रोके रहेंगे रोज आशूर गम मनाएंगे गमगीन रहेंगे
[4:55]लेकिन हम दो महीने तक अपने आप को क्यों रोके रहे अपने
[5:00]आप को इस चीज का क्यों पाबंद बनाए रहे दो महीना लगातार
[5:01]हम रोज आशूर जो है अपने आप को पाबंद किए रहेंगे लेकिन
[5:06]दो महीने तक का क्या मतलब है देखिए बात यह होती है
[5:11]ना कि शहादत ठीक है एक दिन हुई है आइए उसी शरीयत
[5:12]से लेते हैं ना आइए बारगाह रिसालत में चलकर सवाल करते हैं
[5:17]के या रसूल अल्लाह हजरत खदीजा की वफात हुई है हजरत अबू
[5:22]तालिब की वफात हुई है एक दिन दो दिन यह एक साल
[5:23]आमल हुजन क्यों ऐलान हो रहा है या हजरत हमजा पर शिद्दत
[5:28]जुल्म की वजह से आपको सैयद शोहदा कहा गया एक खास एहतमाम
[5:34]हुआ ना रसूल अल्लाह ने गम का एहतमाम एक दिन दो दिन
[5:36]नहीं अच्छे खासे अया तक गम का एहतमाम किया हजरत हमजा के
[5:41]लिए लोगों को बिलाया कि आके हमजा की कब्र पर बैठकर गिरिया
[5:45]और मातम करो हजरत हमजा पर शिद्दत जुल्म हो जाए तो कायनात
[5:48]का रसूल चंद अया तक गम मना करके यह बता रहा है
[5:52]कि सुन्नत यह है कि जब इस तरह की शख्सियत शख्सियत हैं
[5:56]जिनका दारोमदार दीन पर हो दुनिया से जाएं तो एक तुलानी मुद्दत
[5:59]तक इनका गमना बनाया जाए या खुद कायनात का रसूल इस दुनिया
[6:03]से जाता है उस बेटी के लिए जिसके लिए रसूल खुद कह
[6:06]के गए कि ये बजत मिनी मेरा जुज है उसने देखी जब
[6:07]तक जिंदा रही वो गम मनाया वो गिरिया जहां यहां तक कि
[6:12]वो शिकायतें कि या रात में रो लिया करें या दिन में
[6:15]फिर जाकर के वो बैतुल एजान की तामीर होती है बैतुल हुजन
[6:17]की वहां जाकर के जनाबे सैयदा का गिरिया करना और मातम करना
[6:21]और ये ये ये हमारे पास शरीयत से दलीलें हैं कि हम
[6:25]एक तुलानी मुद्दत तक कर सकते हैं ये मैंने कायनात के रसूल
[6:26]की बात की उम्मते मुस्लिमा के लिए लेकिन अगर शिया ने हैदर
[6:30]कर्रार सवाल ये करें तो आइए उठा कर के देखिए आईमा की
[6:31]तारीख में इमाम सज्जाद अलैहि सलाम इमाम मोहम्मद बाकर अल सलातो वसलाम
[6:37]ने एक तुलानी मुद्दत तक एहतमाम किया आयामे अज का और रिवाय
[6:39]तों की भरमार है अगर आप देखना चाहे इमाम रज अल सलाम
[6:43]इबन शबीब से कहते हैं इब्ने शबीब तुम चाहते हो कि जन्नत
[6:47]में तुम्हें खुशी होगी इस बात पर कि जन्नत में तुम्हारा मकाम
[6:49]हमारे बराबर हो कहा मौला कहा हमारे गम में मगम रहा करो
[6:53]हमारी खुशी में खुश रहा करो इमाम सादिक अलैहि सलाम है बुलाबुला
[6:55]के लोगों को अजाए इमाम हुसैन का एहतमाम करते हैं रवायत भरी
[6:59]पड़ी हुई है तो हमें अगर रसूल से सीरत लेनी है तो
[7:03]वहां से भी ले सकते हैं आइमा से सीरत लेनी है तो
[7:03]वहां से भी ले सकते हैं कि जब दीन की अहम शख्सियत
[7:07]इस दुनिया से जाती है तो हम उसका तुलानी मुद्दत तक एक
[7:11]एहतमाम करते हैं और गम मनाते हैं दो महीने के बच्चे का
[7:15]इंतकाल हो तो गम अलग होता है 18 बरस के जवान का
[7:16]इंतकाल हो तो गम अलग होता है जो घर का वारिस है
[7:19]सरपरस्त है अगर वो दुनिया से उठ जाए तो गम के हालात
[7:23]बदलते रहते हैं शख्सियत के ऐतबार से और जब हम सैयद शोहदा
[7:25]की बात करेंगे तो कायनात में इनसे बड़ा अगर देखा जाए दीन
[7:30]की खिदमत करने करने वाला दन को आगे बढ़ाने वाला दीन के
[7:33]नबी की सीरत को जिंदा करने वाला हयाते जावेद अता करने वाला
[7:35]इनसे बड़ा कोई नहीं है तो उनका गम तो हमारा फरीजा है
[7:39]कि हम ज्यादा से ज्यादा मनाए ये आपने कहा कि शहादत तो
[7:43]एक दिन है भाई एक शख्स की शहादत तो नहीं है ना
[7:47]आप अगर रोज आशूर की बात कर रहे हैं तो वहां सिर्फ
[7:48]18 बनी हाशिम भी नहीं है असब है अंसार हैं तो इन
[7:52]तमाम लोगों की शहादत पर हम सिर्फ एक दिन आप हमारे अया
[7:56]में अजा को उठा के देखिए तो अगर जिसको ये ऐतराज है
[7:57]मैं उसके उससे यह सवाल करता हूं उठा के तो देखिए मुनासिब
[8:00]होती हैं एक मुहर्रम से चार मुहर्रम तक हम असब अंसार की
[8:05]गुफ्तगू करते हैं जबकि उनकी तादाद बहुत ज्यादा है हमने तो खुद
[8:07]भी शर्ट किया हुआ है उसके बाद हम बनी हाशिम का जिक्र
[8:10]करते हैं और जब आशूर तमाम हो गई सब शहीद हो गए
[8:14]तो हमारे यहां जुल्म रुका तो नहीं ना 11 मुहर्रम को अहले
[8:16]हरम को असीर कर लिया जाता है और असीर करके कर्बला से
[8:20]कूफा और कफे से शाम फिराया जाता है तो जो ये हमारे
[8:24]गम का जो सिलसिला आगे बढ़ता है ये मुनासिब तों से बढ़ता
[8:28]है फिर इमाम सज्जाद की शहादत आती है फिर इस तरह से
[8:30]जो कैद खाने में जनाबे सकीना की शहादत होती है इन तमाम
[8:34]अया को जो है हमने मुनासिब तों के ऐतबार से यह मनाया
[8:38]है और अगर हम इजहार मोहब्बत करना चाहे तो शायद ये दो
[8:40]महीने भी हमारे लिए कम है मनाना चाहिए हमें और यह हमारा
[8:44]फरीजा होता है कि इजहार मोहब्बत के तहत हम इन दो महीने
[8:48]में परहेज कर लें बाकी 10 महीने हमारे हैं जितना चाहे खुशी
[8:50]मनाएं जो चाहे वो करें मौलाना साहब वो सवाल अपनी जगह प
[8:55]बाकी रह गया शरीयत इस अमल को जायज करार देती है आज
[8:56]के जमाने में अगर देखा जाए तो उलमा मौजूद हैं उलमा इस्लाम
[9:00]है मराज कराम है वो सब जो है इस बारे में क्या
[9:04]फतवा देते हैं यानी क्लियर होना चाहिए हमारे लोगों के लिए मोमिनीन
[9:06]के लिए यह बात के शरीयत क्या हुक्म देती है और मराज
[9:10]इराम का क्या फतवा है बहुत ही खूबसूरत सवाल किया आपने और
[9:14]सच पूछिए तो इस सवाल की यहीं पर जगह थी और जो
[9:15]आपने बेहतरीन तरीके से कर करके सवाल की अहमियत को बढ़ा दिया
[9:19]हमने अकली तौर पर तो फैसला कर दिया लेकिन हमारी उम्मत तो
[9:24]हमसे सवाल कर रही कि शर बताइए हमें मसला क्या है अद
[9:26]करना अया में अजा में बे नफ्स ही खुद अद हराम नहीं
[9:30]है जायज है आपको अख्तियार दिया गया है आपकी इंसानियत के नाते
[9:34]आपको अख्तियार दिया गया है अख्तियार दे कर के आपकी मोहब्बत की
[9:39]आजमाइश है फी नफ्स ही अद करना हराम नहीं है लेकिन जिम्नी
[9:42]तौर पर आइए आप सवाल में आपने कहा कि मरा कराम क्या
[9:46]कहते हैं जायज है या नाजायज है आइए आयतुल्लाह सिस्तानी या आयतुल्लाह
[9:49]खमना इनकी तकलीद इस वक्त माशे में अल्हम्दुलिल्लाह हो रही है ये
[9:54]दो शख्सियत है मैं इनकी मिसाल देता हूं तो इन्होंने यही जवाब
[9:56]दिया कहा देखो अया में अजा में अद करना बे नफ्स ही
[10:01]हराम नहीं है लेकिन अगर यह अद इन अया की हुरमत को
[10:05]पामा कर रहा हो तो जायज नहीं है जायज नहीं है जायज
[10:06]नहीं है क्यों इसलिए कि इन अया की हुरमत को पामा कर
[10:11]रहा है एक तरह से इस मुकद्दस अया की तौहीन हो रही
[10:15]है एक तरफ अया में अजा और एक तरफ आप खुशी तो
[10:19]अया में अजा की हुरमत पामा होने की वजह से अद को
[10:20]जायज करार नहीं देते आयतुल्लाह स सिस्तानी और आयतुल्लाह खाम नई इन
[10:26]आयाम अजा में देखिए अब इसकी मैं एक मिसाल से वाज करता
[10:28]हूं माहे मुबारक रमजान में जो मुसाफिर है उसके ऊपर रोजा नहीं
[10:33]है खा पी सकता है ना जायज है लेकिन शरीयत ये कहती
[10:37]है कि घर में बैठ के खाओ शहरा पर उमू जगहों पर
[10:40]आम जगहों पर आकर के मत खाओ कि मैं तो मुसाफिर हूं
[10:41]यहां भी खाऊंगा वहां भी खाऊंगा ऐसा मत करो क्यों क्यों नहीं
[10:45]खा सकता इसलिए नहीं खा सकता कि माहे मुबारक रमजान की हुरमत
[10:51]पामा हो रही है हुरमत को पामा मत कीजिए जिस तरह यहां
[10:52]पर जायज नहीं है उसी तरह से हमारे मराज कराम यह फरमाते
[10:57]हैं कि ये अया अजा है मोमिनीन उमू तौर पर मगम है
[11:00]गम मना रहे हैं अहले बैत अतहा का कर्बला का वाकया और
[11:03]हादसा मामूली नहीं है भरा घर उजड़ गया है अहले बैत का
[11:07]मोमिनीन मगम में है तो लिहाजा आपको परहेज करना है हराम है
[11:11]आपके लिए और देखिए इसलिए ये गम की अहमियत भी जो है
[11:15]ना हमारे यहां बहुत ज्यादा है क्यों यह कि दुनिया यह कहती
[11:17]है हम गम मनाते हैं जबकि कर्बला हमारी दर्स गह है और
[11:21]हम यह भी देखते हैं ना कि जिन लोगों का तराज है
[11:25]हम पर कि इतना लंबा गम क्यों मनाते हैं वो यही देखते
[11:26]हैं कि इस दर्स गह के जरिए से हमारी तरबियत होती है
[11:29]वो ये देखते हैं कि हमारे अंदर वो इंकलाब हुसैनी जिंदा हो
[11:32]जाता है हुसैन इब्ने अली के अया में गम मनाने में हम
[11:36]जालिम का गिरेबान पकड़ने के लिए खड़े हो जाते हैं मुहर्रम के
[11:41]बयानात शुरू करके अपने दीन को कवी मजबूत अपने इरादों को कर्बला
[11:43]के जरिए से करने लगते हैं तो दुश्मन को ये सारी चीजें
[11:47]खलती हैं के साल भर हमने इनको बिगाड़ा था लेकिन इनका दो
[11:49]महीना अया में अजा आया ये फिर उसी रास्ते पर आ गए
[11:52]जिस रास्ते पर हुसैन लाना चाहते थे ये उसी रास्ते पे आ
[11:55]गए जिस रास्ते पे कायनात का रसूल लाना चाहता था तो दुश्मन
[11:57]को खले का ना परेशान होगा ना तो परेशान होगा करके फिर
[12:01]वो के क्यों इतना लंबा और क्यों इतना ज्यादा और यह सवालात
[12:03]होंगे इसलिए कि यह अया मेंे अजा हमारे लिए हुसैन की दसगांव
[12:11]हों में करते हैं और वहां से हुसैन के मिशन को आगे
[12:15]बढ़ाने की गुफ्तगू करते हैं दीन मोहम्मद को मजबूत करने की बात
[12:18]करते हैं जो दुश्मन को नागवार गुजरती है और इन आयाम पे
[12:22]इतरात करते हैं बहुत-बहुत शुक्रिया मौलाना साहब आपकी इस गुफ्तगू के जरिए
[12:24]से बहुत सारे डाउट्स क्लियर हुए हैं और उम्मीद करते हैं कि
[12:28]मोमिनीन के लिए भी इंशाल्लाह यह डाउट्स जो है क्लियर हुए होंगे
[12:33]बहुत सारे पॉइंट जो है क्लियर हुए होंगे और इंशाल्लाह हम दोबारा
[12:36]से आपको जहमत देंगे किसी दूसरे नए टॉप टॉपिक के साथ तब
[12:41]तक के लिए खुदा हाफिज शुक्रिया जजाकल्लाह कि आपने इस प्रोग्राम का
[12:45]एहतमाम किया
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