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Bulandiy-e-Khuda | H.I Shoaib Naqvi
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24/07/29
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Record date: Feb 2011 - بلندی خدا
These video lectures are presented by almehdi educational society, Karachi for our youth.
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Transcript
[0:03]अज बिल्लाह मिन शैतान बमला अल हमदुलिल्ला मलकल कुद दूस अजल हकीम
[0:15]रही स सलातो सलाम अला नबीना हबी बना मोहम्मद सल्लल्लाहु अल वा
[0:29]ला सलाम बाद फला ताला कुरा हकीम बिस्मिल्लाह रहमान रहीम ल मसला
[0:36]समावा ल अ ल अजल हकीम साते बारी ताला अपनी पाक किताब
[0:45]कुराने मजीद में सूर रूम के अंदर इरशाद फरमा रहा है कि
[0:55]तुम जमीन और आसमान में जितनी बुलंदिया देख रहे हो तमाम बुलंदिया
[1:05]दर हकीकत सब की सब खुदा के लिए जितनी बुलंदियों की मिसाले
[1:11]हैं वह तमाम खुदा के लिए हैं चाहे वह जमीनों में हो
[1:15]या आसमानों में लेकिन कमाल यह है हमारी इंसानी जिंदगी के अंदर
[1:25]जब हम गौर कर रहे हैं बुलंदी बालाईजीरिया नशे बो फराज पस्ती
[1:37]टॉप बॉटम हाइट लो यह व अल्फाज है यह व मुत दफा
[1:45]है जिनसे हम सब वाकिफ है रोजमर्रा जिंदगी में इन्ह इस्तेमाल कर
[1:49]रहे हैं हर इंसान जिस मुकाम पर है जिस प्रोफेशन में है
[1:57]जिस मरहले पर है चाहता यह है कि किसी ना किसी तरह
[2:01]बुलंदी तक पहुंच जाए आला रुतबे पर पहुंच जाए फला साहब बहुत
[2:07]आला मुकाम पर है फला साहब बहुत आला पोस्ट पर है लेकिन
[2:12]कुराने मजीद कह रहा है कि जितनी आलाय है जितना उलू है
[2:19]जितनी बुलंदी है जितनी हाइट है और उसकी जितनी मिसाले इस दुनिया
[2:23]में पाई जाती है चाहे व जमीनों में हो चाहे वो आसमानों
[2:28]में वो सब की सब खुदा के लिए उसके सिवा कुछ नहीं
[2:32]लेकिन जब इस बुलंदी के बारे में इंसान सोच रहा है तो
[2:42]यह चाहता है कि जिस तरह मुमकिन हो भले उसे गलत रास्तों
[2:49]से क्यों ना गुजरना पड़े भले उसे किसी का हक क्यों ना
[2:53]मारना पड़े चाहे बड़े से बड़ा रिस्क क्यों ना उठाना पड़े लेकिन
[2:57]उसे बुलंदी तक पहुंचना है बाला तक पहुंच एक ऐसी बालाईजीरिया [संगीत]
[3:30]चाहे वह केटू की चोटी हो या माउंट एवरेस्ट की चोटी हो
[3:37]इंसान वहां पहुंचने के बावजूद अपने आप को कमतर महसूस कर रहा
[3:42]है और इंसान का यह एहसास कमतरी इस बात की दलील है
[3:51]के वह इतनी बुलंदी पर जाने के बावजूद कोई ऐसी हस्ती है
[3:57]जिससे वाकफ रखता है जिससे इल्म रखता है जो उससे भी ज्यादा
[4:00]बुलंदी पर है जो उससे भी ज्यादा हाइट पर है लेकिन इस
[4:08]तमाम बुलंदी के अंदर जितनी भी बुलंदियां है इंसान अपनी रोजमर्रा की
[4:14]जिंदगी में देख रहा है कितनी मर्तबा हमने दीन में सर बुलंद
[4:18]होने का सोचा कितनी मर्तबा हमने यह सोचा कि वह बुलंदी अ
[4:24]हो जो सिर्फ इस दुनिया में ना हो बल्कि आखिरत में भी
[4:30]बुलंदी रहे वो बुलंदी जो हमेशा सर बुलंद दिखाई दे एक ऐसी
[4:32]बुलंदी कि जो सिर्फ और सिर्फ सिर्फ और सिर्फ राहे खुदा में
[4:39]चलने से हासिल हो सकती है एक ऐसी बुलंदी जो सिर्फ इतनी
[4:50]सी आपसे रिक्वेस्ट कर रही है एक मर्तबा तुम खुद को झुकाने
[4:53]की कोशिश करो फिर हम देखो तुम्हें किस तरह बुलंदी अता करते
[4:57]हैं और दुनिया जानती है जिसने गुरूर किया जिसने तकब किया जिसने
[5:02]खुद को बड़ा समझा उसका नामो निशान मिट गया मामून है हारून
[5:10]है शद्दाद है आखिर कहां है यह सब आज क्यों नहीं नजर
[5:18]आ रहे वो बनी इराल जिसने हजारों अंबिया को सहरा पहाड़ों के
[5:23]दामन में दफना दिया वो कौम कि जो अपने आप को इस
[5:29]जमीन पर हुक्म रवा समझती थी वो जो खुद को रक आला
[5:31]कहा करता था क्या वही फिरौन आज किसी सूरत में बाकी है
[5:38]लेकिन इंसान उसके बावजूद बुलंदी तक जाना चाह रहा है उसको एक
[5:45]ऐसी बुलंदी की जुस्तजू है जिसका दर हकीकत उसे खुद इल्म नहीं
[5:48]क्या आखिर कौन सी बुलंदी है हर दौड़ जिसमें इंसान कामयाब होना
[5:58]चाहे उसकी पहली खुसूसियत यह है उसको मकसद का अंदाजा होना चाहिए
[6:04]अगर बे मकसद अगर बगैर किसी बैरियर के बगैर किसी टारगेट के
[6:11]एक इंसान भागना शुरू कर दे तो पूरी जिंदगी भाग तो सकता
[6:15]है दौड़ तो सकता है लेकिन अपने मकसद को नहीं पा सकता
[6:17]लेकिन अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकता इसलिए क्योंकि उसने पहला कदम
[6:25]उठाने से पहले अपने मकसद का तायन नहीं किया उसने बुलंदी जो
[6:29]चाही है वो हत बुलंदी नहीं है वो इस बुलंदी पर आने
[6:35]के बावजूद जब देखता है इससे बहुत और आगे ऐसे मुका मात
[6:39]है जो इससे ज्यादा बुलंद जो इससे कहीं ज्यादा ऊंचे हैं और
[6:44]उस्ताद अजीज आयतुल्लाह मोहसिन किराती कहा करते थे कि इंसान इस दुनिया
[6:49]में ऊपर जाना चाह रहा है इंसान इस दुनिया में मशहूर होना
[6:55]चाह रहा है इंसान इस दुनिया में चाहता है कि जहां जाए
[6:59]चार छह लोग जमा हो जाए और उसे देखना शुरू कर दे
[7:00]तो इस मौके पर उस्ताद कहते हैं कि ताज्जुब है कि गंदगी
[7:05]से उठने वाला धुआ जितनी ऊपर जाता है इतने ऊपर इंसान तो
[7:12]नहीं जा सकता क्या वो धुआ इंसान से ज्यादा ताकतवर है एक
[7:16]इंसान मशहूर होना चाह रहा है आज माउंट एवरेस्ट केटू पूरी दुनिया
[7:22]में मशहूर है लेकिन जहां है जैसी है उसी तरह सदियों से
[7:25]अपनी जगह पर मौजूद है उसकी सेहत पे उसकी शक्ल पर कोई
[7:29]फर्क नहीं पड़ रहा आज इंसान चाह रहा है कि उसके गिर्द
[7:35]अफराद जमा हो जाए आप आज एक ऐसे जानवर को ले आए
[7:36]जो आपके इलाके में नहीं पाया जाता उसके गिर्द भी चार अफराद
[7:40]जमा हो जाते हैं एक बंदर गली में आ जाए 25 बच्चे
[7:45]उसके गिर्द जमा हो जाते हैं यानी वो तमाम टारगेट्स वो तमाम
[7:48]बुलंदियां वो तमाम मुलाकात जो इंसान ने अपनी बुलंदी के लिए तान
[7:54]किए हैं दर हकीकत वो किसी सूरत में बुलंद नजर नहीं आते
[8:00]यही वजह है उस बुलंदी पर जाने के बावजूद फिर इंसान सर
[8:03]गर्दा है फिर परेशान है किय बुलंदी व बुलंदी नहीं जो मैं
[8:10]सोच रहा था यह बुलंदी हरगिज उसको सर बुलंदी अता नहीं कर
[8:16]रही अगर वह इतनी बुलंदी पर पहुंचने के बावजूद अपने सर को
[8:19]झुकाए जा रहा है तो इसका मतलब वह बुलंदी नहीं है इसीलिए
[8:24]अल्लामा इकबाल ने कहा था कि वो एक सजदा जिसे तू ग
[8:32]समझता है हजार सजदों से देता है आदमी को निजात यह बुलंदी
[8:38]है जो एक मर्तबा इस सर को झुकाने के बाद व परवरदिगार
[8:41]अता कर रहा है जो दर हकीकत रब्बे आला है जो दर
[8:50]हकीकत उन तमाम बुलंदियों का मालिक है जो इस दुनिया में या
[8:57]आखिरत में पाई जाती है या कश्फ हो सकती है और वो
[8:59]तमाम बुलंदिया जो यहां पर मौजूद नजर आ रही है बहुत मुमकिन
[9:05]है कि बुलंदी बुलंदी ना हो हम इस बुलंदी को बुलंदी तसव्वुर
[9:12]कर रहे हैं एक मर्तबा बुलंदी को उस शख्स की निगाह से
[9:15]देखिए जो आपसे बुलंदी पर फायज है वह हमेशा आपको पस समझ
[9:23]रहा है लेकिन कमाल यह है कि इंसान जितनी बुलंदी पर पहुंच
[9:26]जाए उस रब्बुल अकबर का शुक्र अदा करता रहे उसके सामने सर
[9:34]को झुकाता रहे ताकि इस दुनिया की कोई बुलंदी ऐसी ना हो
[9:36]इस दुनिया का कोई फराज ऐसा ना हो इस दुनिया का कोई
[9:43]आला दर्जा मुकाम ऐसा ना हो जहां उसका नाम उसके रब्बुल आला
[9:48]के नाम के साथ बाकी ना रह [प्रशंसा] सके मलाना मला या
[10:05]मलाना अली या मलाना या मला या मलाली या मलाना या मला
[10:19]बिस्मिल्ला रहमान रहीम ला अमीर मोमिनीन अ सलाम बला कमामा फ मोमन
[10:33]अल ममन बशर न क सदर न यता यर सब म सली
[11:11]न म कल माते हिकमत में 333 नंबर मला मुत फरमा रहे
[11:28]हैं सिफात मोमिन बयान करते हु कि मोमिन दर हकीकत वो है
[11:34]कि जिसका चेहरा बश है हश है जिसका चेहरा तुम्हें हमेशा हस्ता
[11:38]मुस्कुराता नजर आ रहा है लेकिन उसका दिल रंज गम से भरा
[11:46]हुआ है और उसका यह दिल जो रंजो गम से भरा हुआ
[11:47]है यह रंजो गम दुनियावी रंजो गम नहीं है इससे मुराद व
[11:55]रंजो गम है कि जो आखिरत के लिए जो गम है कि
[12:00]जो मोमिन हबते आमाल से डर रहा है वो डर रहा है
[12:07]कहीं मेरे आमाल जाया ना हो जाए वो डर रहा है कहीं
[12:10]ऐसा तो नहीं कि मैं इससे ज्यादा बेहतर अपने रब का शुक्र
[12:13]अदा कर सकता था कि मैं इससे ज्यादा बेहतर अपने खुदा को
[12:20]याद कर सकता था उसके आगे मौला फरमाते हैं कि सिफत मोमिन
[12:29]ये है कि इसका सीना इंतहा कुशा है और इस कुशा सीने
[12:34]के साथ-साथ व मुत वाजे है यानी कितना ही बड़ा सीना है
[12:38]लेकिन उसके बावजूद व हर एक से तुम्हें झुकता मिल रहा है
[12:43]हर एक से अदब एतराम के साथ मिल रहा है हरगिज गुरूर
[12:49]नहीं कर रहा हरगिज तकब नहीं कर रहा जबक व इस दर्जे
[12:53]पर है कि उसके दिल में इंतहा रंजो गम है जबकि वो
[13:01]सफे मोमिन में खड़ा है और यह हमारी आपकी निगाह में मोमिन
[13:06]नहीं है बल्कि अमीरुल मोमिनीन की निगाह जिसे मोमिन समझ रही है
[13:10]लेकिन उसके बावजूद कमाल मोमिन यह है कि वो अपना सीना कुशा
[13:15]होने के साथ-साथ मुत वाजे और यही बुलंदियां यही हाइट्स कि जहां
[13:27]पहुंचने के लिए हर इंसान हर रास्ते से गुजरने के लिए तैयार
[13:31]है चाहे उसे अपने किसी मोमिन भाई के शाने प पांव रख
[13:37]के ऊपर जाना पड़े चाहे किसी मजलूम का सर कुचलना पड़े चाहे
[13:42]किसी का हक गजब करना पड़े लेकिन उसे बुलंदी तक पहुंचना है
[13:44]उसे आला मुकाम पर पहुंचना उसे हाइट तक जाना और इस दीवानगी
[13:53]की हद तक इस आला मुकाम की ख्वाहिश उसके दिल में है
[13:56]कि वो रब्बुल आला को फरामोश कर चुका मौला मुत फरमाते हैं
[14:03]कि मोमिन की सिफत यह है कि वह बुलंदी से नफरत करता
[14:08]है बहुत अजीब कलाम है मौला का तो बुलंदी से नफरत करता
[14:14]है व हरगिज इसलिए बुलंदी से नफरत नहीं करता कि वह इनको
[14:19]नेमत खुदा नहीं समझता नहीं बल्कि वह इसलिए नफरत करता है कहीं
[14:22]ऐसा ना हो मैं बुलंदी पर जाने के बाद मगरूर हो जाऊ
[14:26]कहीं ऐसा ना हो मैं बुलंदी पर चला जाऊ तो से नीचे
[14:33]वाले अफराद को बस तसवर करने लग जरा सोचिए अगर हर व
[14:39]शख्स जो आज खुद को एक बुलंदी पर तसव्वुर कर रहा है
[14:41]व अपने से नीचे जितनी मखलूक मौजूद है जब उन्हें देखना शुरू
[14:48]करता है किस कदर पस्त नजर आती है क्या हम और आप
[14:54]इस दुनिया में रहते हुए इस चीज का तसव्वुर कर सकते हैं
[15:00]कि जब अर्शे इलाही से हमें देखा जाता है तो हमारा क्या
[15:06]कद नजर आता है हमारी क्या बुलंदी नजर आती है हमारा क्या
[15:09]मुकाम नजर आता है इसीलिए कहा गया कि अनक तुम में सबसे
[15:16]बेहतर वह है जो सबसे ज्यादा तक वाला है इसलिए मोमिन बुलंदी
[15:22]से नफरत कर रहा है कि कहीं ऐसा ना हो मैं बुलंदी
[15:28]पर जाने के बाद मगरूर हो जाऊ कहीं ऐसा ना हो कि
[15:32]मैं बुलंदी पर जाने के बाद तवाजो को छोड़ दू कहीं ऐसा
[15:34]ना हो मैं बुलंदी पर जाने के बाद उन लोगों को भूल
[15:38]जाऊ जो मुझसे पस्त है या जो मुझसे नीचे रह गए और
[15:42]मौला कह रहे हैं कि मोमिन शोहरत से नफरत कर रहा है
[15:48]उसका गम तवील है वो शोहरत के आम इंसान जिसके पीछे भाग
[15:56]रहा है मोमिन शोहरत नफरत कर रहा है य वो तमाम बुलंदियां
[16:03]है कि जिनको हम बुलंदी तसव्वुर कर रहे हैं लेकिन सवाल यह
[16:10]है क्या ये तमाम हाइट्स ये तमाम बुलंदियां जिन्हें हम बुलंदी समझ
[16:14]रहे हैं क्या ये वाकई बुलंद है या नहीं कहीं ऐसा तो
[16:20]नहीं कि जिसे हम बुलंदी तसव्वुर कर रहे हो वो दर हकीकत
[16:26]पस्ती हो जिसे हम पस्ती तसव्वुर कर रहे हैं वो दर हकीकत
[16:29]बुलंदी इसीलिए कहा गया कि जब इंसान मुब्तला है मुसीबतों में उस
[16:41]वक्त अपने रब की कुवत का कुदरत का उसे एहसास है और
[16:46]जिस वक्त व लज्जत में जिंदगी गुजार रहा है उस वक्त उसको
[16:52]हरगिज खुदा याद नहीं आ पा रहा अजीब बुलंदी बुलंदी की दास्तान
[17:01]अजीब है सदियों से यह बुलंदियों का सफर चल रहा है यह
[17:05]पहाड़ जिन्ह हम बे मकसद समझ रहे हैं जिन्ह कुराने मजीद ने
[17:13]यह बयान किया कि यह दर हकीकत वह मखे हैं वह कीले
[17:18]हैं जो हमने जमीन पर लगा दी वो मखे कि जिनकी वजह
[17:25]से जमीन का बैलेंस बरकरार है और याद रखना रोज कयामत य
[17:32]पहाड़ जिन्ह तुम बहुत ताकतवर तसव्वुर कर रहे हो रूई के गालों
[17:35]की तरह हवाओ में उड़ते चले जाएंगे यानी कमाल है व बुलंदी
[17:42]जिसको हम अपनी तमाम जिंदगी में बुलंदी तसव्वुर करते रहे व बुलंद
[17:48]वाला परवरदिगार जब हुकम सादिर करेगा तो यह इतनी बुलंद छे रूई
[17:53]के गालों की तरह उड़ जाएगी इस कदर मजबूत इतनी चटी इतनी
[18:00]ताकतवर इतनी सख्त जमीन के जिसको तराशने के लिए हर तिशा काम
[18:09]नहीं आ सकता यह अजीम पहाड़ रूई के गालों में तब्दील हो
[18:17]जाएंगे तो आखिर कैसे मुमकिन है कि परवरदिगार किसी ऐसे मोमिन को
[18:21]कि जिसने अपने रब की खातिर अपने रब की बुजुर्ग की खातिर
[18:28]अपने सर को झुका लिया हो उसे सर बुलंदी ना करे और
[18:30]हकीकी सर बुलंदी वही है जो सिर्फ इस दुनिया में नहीं है
[18:36]बल्कि इस दुनिया से गुजर जाने के बाद भी सर बुलंद है
[18:41]कमाले जिंदगी यह नहीं कि जब तक जिंदा है लोग याद रखें
[18:43]कमाले जिंदगी यह है कि इस दुनिया से दारे बाकी की तरफ
[18:48]कूछ कर जाने के बाद भी लोग उसे याद रखें सर बुलंदी
[18:54]यह है सरफराज यह है हाइट ये है हाइट ऑफ लाइफ यह
[19:02]है कि इंसान जाहिरी तौर पर जब अपनी जिंदगी खत्म कर ले
[19:09]इस दुनिया से चला जाए उसके बाद उसकी जिंदगी का सफर शुरू
[19:12]है अब यह सफर बुलंदियों की जानिब है यहां देखना है कि
[19:19]कौन किस बुलंदी पर जा सकता है कौन किस मेराज पर है
[19:24]और यह जितनी चीजें ये जितनी बुलंदिया है यह सब इंसान के
[19:28]लिए है इसीलिए तने इशाद किया मुता जगह कुरान में कहा लकलक
[19:35]सकम तुम्हारे लिए तो खक किया तुम्हारे लिए तो मैंने काबिले तसर
[19:48]बनाया है [संगीत] इसको ज [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] लेकिन कमाल है इंसानी
[20:12]जिंदगी का इंसान बुलंदी की तग दो में बुलंद से बुलंद बेहतर
[20:24]से बेहतर ऊंचे से ऊंचे मुकाम के पीछे जाता रहा लेकिन जब
[20:28]एक मुकाम पर पहुंच गया तो उस मुकाम पर पहुंचने के बाद
[20:34]या तो गुरूर में मुब्तला हो गया या अपने से पत लोगों
[20:44]पर जुल्म करने लगा नज बला में मौला मुत कियान फरमा रहे
[20:52]हैं मन नाला ताला जिसको मनसब मिल गया जिसको मुकाम मिल गया
[21:01]जिसको पोस्ट मिल गई बस उसने फौरन ही अपने मातहतों पर जुल्म
[21:07]शुरू कर दिया ऐसा नहीं है कि हर शख्स ऐसा कर रहा
[21:12]हो मगर अक्सर यही देखा जा रहा है मन नाला तेताला किसको
[21:23]मुकाम मिलता जा रहा है वो जुल्म करना शुरू करता जा रहा
[21:29]है अब इस इंसान को इस जिंदगी में समझना यह है कि
[21:40]कौन सा मुकाम वह मुकाम है कि जहां के लिए इसे बनाया
[21:44]गया अगर इंसान यह समझ रहा है कि एक पहाड़ी की चोटी
[21:52]को सर करके उसने अपना मकसद तकली पूरा कर दिया तो बेशक
[22:00]बिल्कुल गलत सोच रहा है ये तो था ही तुम्हारे लिए सरकम
[22:06]इशाद बारी ताला है कि तुम्हारे लिए काबिले तसर है ये तो
[22:13]तुम्हारी ना अहली है कि तुम अब तक यहां तक ना पहुंच
[22:19]सके थे यह तो तुम्हारी नादानी है कि तुमने आज तक यह
[22:21]चीज कश्फ ना की थी लेकिन अगर तुम्हारी नजर में बुलंदी सिर्फ
[22:30]इस दुनिया में बुलंदी है तो याद रखो इस दुनिया की तमाम
[22:41]कीमती चीजें जिसको इंसान आज कदर कीमत की निगाह से देख रहा
[22:44]है वह पतियों में पाई जाती है व गहराइयों में पाई जाती
[22:50]है लेकिन बुलंदी के साथ ऐसा लगता है कि एक सिफत एक
[22:59]स्पेशल अटच हो गई है एक सिफत मुसल हो गई ऐसा लगता
[23:05]है कि जो बुलंद है वह बेहतर है हमेशा ऐसा नहीं है
[23:10]यह कोई कुलिया नहीं है कोई फार्मूला नहीं है जो बुलंद हो
[23:16]वो बेहतर हो बल्कि अकली फार्मूला यह है इलाही फार्मूला यह है
[23:24]कि जो बेहतर है वह बुलंद है वही अल्फाज है वही अल्फाज
[23:33]है सिर्फ तरतीब में तब्दीली है जो इंसान यह सोच रहा है
[23:39]कि जो बुलंद है वह बेहतर है तो उसके मौके उसके सामने
[23:46]जो भी बुलंदी पर आ जाए व उसे बेहतर लगेगा लेकिन एक
[23:52]इंसान जो अपनी जिंदगी का विजन यह रखता है कि जो बेहतर
[24:00]व बुलंद है तो चाहे उसे बेहतरी समंदर की तहो में मिले
[24:06]चाहे उसे वह बेहतरी पहाड़ों के बजाय खाइयो में मिले क दर
[24:12]हकीकत देखा जाए तो हर पहाड़ अगर उसको पलटा दिया जाए तो
[24:21]खाई बन सकती है हर व खाई हर वो गहराई जिसे आप
[24:28]खाई समझ रहे हैं अगर उसको लट दिया जाए तो एक तनमन
[24:31]पहाड़ बन सकता है लेकिन इंसान इस बुलंदी और पस्ती का तसव्वुर
[24:43]नहीं कर सका मुश्किल य है बुलंदी वो बुलंदी है कि जो
[24:50]उसको मुशे की निगाह में बुलंद करे बुलंदी वो बुलंदी है जो
[24:58]सबसे बुलंद बाला उसके खुदा नजर में उसे बुलंद करे आखिर अगर
[25:04]दो चार अफराद के सामने अगर आप किसी मुकाम पर है तो
[25:12]हरगिज यह ना समझिए कि आप आज जिस मुकाम पर है कल
[25:17]भी इसी मुकाम पर होंगे मुश्किल इंसान यह है हमारी प्रॉब्लम यह
[25:23]है कि हम हर मुकाम पर आने के के बाद मौला के
[25:32]कौल के मुताबिक मनाला इस्ता जैसे ही मनसब मिल जाए हम जुल्म
[25:39]शुरू कर देते हैं हम गुमराही का रास्ता इख्तियार कर लेते हैं
[25:46]हम बुलंदियों को बहुत सथी माना में तसव्वुर कर रहे हैं हकीकी
[25:54]बुलंदी तो वो है कि चाहे इंसान अपनी तमाम जिंदगी खाक नशी
[26:05]में गुजार दे लेकिन हमेशा बुलंद लोगों में उसका नाम लिया जाए
[26:10]हर बुलंद बाला हस्ती उसका नाम ले इसीलिए कहा गया मन सना
[26:19]फिला फ बका माला जिसने खुद को अपने की जात में गुम
[26:31]कर दिया जिसने खुद को खुदा की राह के लिए वक्त कर
[26:36]दिया बस समझ लो उसको हकीकी बुलंदी नसीब हो गई और हरगिज
[26:47]इस्लाम यह तसवर नहीं देता कि खुदा आपको सिर्फ पहाड़ों बया बानों
[26:53]में मिलेगा बुलंदियों पर मिलेगा बुलंदी पर जाया जाए तो दुआओ में
[26:56]याद रखा जाए हरगिज ऐसा नहीं हरगिज ऐसा नहीं है जरा तसव्वुर
[27:07]कीजिए तो पहाड़ों की तहो में रहने वाले हजार हा कीड़े मकोड़े
[27:15]अगर रिजक पा रहे हैं अगर जिंदगी गुजार रहे हैं तो इसका
[27:22]मतलब यह है कि परवरदिगार उन्हें देख रहा है तो इसका मतलब
[27:25]यह है खालिक दो ज उनकी जरूरियत को पूरा कर रहा है
[27:34]तो इसका मतलब यह है इस दुनिया में मुकामी बुलंदी या पस्ती
[27:42]हरगिज तुम्हारे रब की नजर में मेयार नहीं है बल्कि मेयार तुम्हारे
[27:51]आमाल की बुलंदी है मेयार तुम्हारे नफ्स की रफत है मेयार तुम्हारी
[27:56]सोच की बुलंदी है मेयार तुम्हारी फिक की बुलंदी है वो बुलंदी
[28:05]कि जो हो सकता है हजारों गिरे हुए लोगों को जीने का
[28:10]सहारा देते हजारों जिंदगी से मायूस लोगों को एक नई जिंदगी की
[28:17]उम्मीद दे दे वो बुलंदी कि जो खाक में मिल जाने के
[28:28]बावजूद परवरदिगार अपने बंदे को अता कर दे बुलंदी जो बुलंद वाला
[28:35]परवरदिगार अपने खास लोगों पर इनायत करे कितनी अजीब बात है के
[28:43]बुलंदिया य बस्तिया य नशे व फराज य उरूज [संगीत] जवाल जितनी
[28:55]भी इस तरह की चीजें हम सुन रहे हैं अपने अतरा में
[29:04]देख रहे हैं किसी चीज की कोई हद ही नहीं यानी अगर
[29:12]इंसान गिरना शुरू हो रहा है तो उसकी पस्ती की कोई हद
[29:18]नहीं है कुराने मजीद ने आवाज दी उला का कलम बल अजल
[29:25]वो बिल्कुल जानवरों जैसे हैं जिस इंसान ने अपनी इंसानियत को ना
[29:31]पहचाना जिस इंसान ने अपने मुकाम को ना पहचाना व जानवरों जैसा
[29:34]है बल अजल बल्कि उससे भी बदतर है और जब बुलंदियों की
[29:44]बात हुई बुलंदी का हकीकी मतलब कमाल है बुलंदी का हकीकी मतलब
[29:49]असली मतलब मेराज है यानी उरूज प पहुंच जाए इंसान बुलंदी पर
[30:00]पहुंच जाए जहां पहुंचने के बाद परवरदिगार उसको इंसान कामिल कहने [संगीत]
[30:07]लगे ल ला मसल आला सूर नहल में रब्बुल जजत ने इरशाद
[30:16]किया मसल आला जो है व खुदा के लिए है और य
[30:24]मसल आला और कोई नहीं जाते गिरामी औलिया किराम अंबिया किराम और
[30:31]जिसका बेहतरीन अतम अकमल मिस्दा जाते गिरामी है पैगंबर अकरम मोहम्मद मुस्तफा
[30:35]सल्लल्लाहु अ वसल्लम वह है मसल आला और किस कदर आला कि
[30:44]जिसके उलू की हद यह है जिसकी बुलंदी की हद यह है
[30:50]कि जब कहा जा रहा है तो हद मयन नहीं है काबा
[30:57]कसन और अदना या तो दो कमान का फासला था या उससे
[30:59]कम या अगर इंसान अपनी इंसानियत को पहचान ले तो उसको वह
[31:07]हकीकी बुलंदी नसीब हो सकती है जिसका कोई अंदाजा नहीं लगा सकता
[31:12]और अगर यही इंसान अपनी इंसानियत को ना पहचाने तो इतनी पस्ती
[31:20]में गिर सकता है इसकी पस्ती का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता
[31:28]मखलूक भी आम हैवान जैसा हो सकता है बल्कि उससे भी बदतर
[31:33]हो सकता है लेकिन इंसानियत यह है कि अपने आप को बुलंद
[31:40]किया जाए अपने आप को पहचाना जाए यानी इंसान जब गिर रहा
[31:46]है तो उसकी पस्ती की भी कोई इंतिहा नहीं है अगर अपने
[31:51]आप को पहचानने लगे तो इसके उरूज की कोई इंतिहा नहीं और
[31:55]अगर अपनी शना को खो दे तो इसके जवाल की कोई हद
[32:00]नहीं इसीलिए इकबाल ने कहा था खुदी को कर बुलंद इतना कि
[32:08]हर तकदीर से पहले इंसान अपने आप को इतनी बुलंदी पर ले
[32:14]जाए यह मुकाम इंसानियत की बुलंदी है इस दुनिया में किसी मुकाम
[32:21]या पोस्ट या ग्रेड की बुलंदी नहीं है य तबकात की बुलंदिया
[32:27]नहीं है ये हाई बिल्डिंग्स की बुलंदिया नहीं है जो मैक्सिमाइज फलोर
[32:38]बिल्डिंग्स की बुलंदिया नहीं है य पहाड़ों की बुलंदिया नहीं है वो
[32:42]बुलंदिया है कि इंसान उस मुकाम पर पहुंच जाए जहां पर इंसान
[32:48]की सरन विश् लिखी जा रही है ज इंसान की तकदीर लिखी
[32:54]जा रही है ज इंसान अपनी तकदीर का फैसला खुद होते हुए
[33:00]देखे उस मुकाम पर कि जब खुदा उसकी तकदीर का फैसला कर
[33:03]रहा हो तो उस बंदे से उसकी रिजा तलब कर ले खुदी
[33:08]को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से
[33:14]खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है बारेला आज तेरी बारगाह में
[33:23]दुआ ग है क्या हमें हकीकी बुलंदी सर बुलंदी और सरफरा नसीब
[33:30]फरमा रब्बुल आला मसल आला के रब अली उल आला के रब
[33:39]हमें हकीकी सर बुलंदी नसीब फरमा और क्यों ना हो हमारी कौम
[33:47]को सर बुलंदी नसीब फरमा जब हमारा रब रब्बुल अकबर है जब
[33:55]हमारा रसूल मसल आला है जब हमारा इमाम खुद अली है तो
[34:01]आखिर हमसे ज्यादा किस कौम को सर बुलंदी जेबा है तो आखिर
[34:06]हमसे ज्यादा किसे सरफराज जेबा है परवरदिगार हमें इस दुनिया और आखिरत
[34:16]में हकीकी सर बुलंदी नसीब फरमा और परवरदिगार हमें हमेशा हमेशा मुवा
[34:25]रहने की तौफीक अता फरमा और हमें जहूर हमारे इमाम आखिर के
[34:31]जहूर में ताजल फरमा और हमें इमाम के आवान अनसार में शामिल
[34:34]फरमा रबना तकब्बल मना इ अल महदी एजुकेशनल सोसाइटी पेश करता है
[34:47]बच्चों और बड़ों के लिए दिलचस्प मजूत पर मनी मुख्तलिफ उलमा कराम
[34:54]की एक नए तरबियती अंदाज के साथ जबरदस्त डिजाइन और तफरी म
[34:57]कामात पर आउटडोर लेक्चर जिसमें मीडिया की बढ़ती हुई राफा और दौरे
[35:04]हाजिर को मद्देनजर रखते हुए बच्चों की तरबियत गुफ्तगू में अखलाकी मेरात
[35:09]घरेलू जिंदगी में पेश आने वाले मसाइल और उनका हल मिल्लत तशी
[35:16]को अंदरूनी और खारिज खतरा और उनसे आगाही और इस तरह के
[35:18]मुख्तलिफ मौजू आत को जदीद तर्ज और खूबसूरती के साथ पेश किया
[35:25]गया है इसके अलावा हफ्ते ब तरबियती व फिकरी दर्स फौरन बाद
[35:28]नमाज मबन कबल जियारत इमामिया इमाम बारगाह जाफर तैयार में पाबंदी के
[35:36]साथ मुकद किए जाते हैं ताकि नई नस्ल की ना सिर्फ इल्मी
[35:38]बल्कि फिकरी सतह को भी बुलंद किया जा सके आज ही हमारी
[35:44]वेबसाइट का विजिट करें www.com [संगीत]
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