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Azadari Ham se He Ya Ham Azadari se Hain | H.I Hadi Wilayati
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23/11/16
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Lectures
Record date: 16 July 2023 - عزاداری ہم سے ہے یا ہم عزاداری سے ہیں AL-Mehdi Educational Society proudly presents new Executive Refresher Course for the year 2023 under the supervision of specialist Ulema and Scholars who will deliver though provoking lectures Every Weekend. These video lectures are presented by aLmehdi educational society, Karachi for our youth. For more details visit: 📡 www.almehdies.com 🖥 www.facebook.com/aLmehdies313 🎥 www.youtube.com/almehdies 🎥 www.shiatv.net/user/Al_Mahdi_Edu
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Transcript
[0:12]मान रहीम अल्हम्दुलिल्लाह रब्बिल आलमीन नद वस्तान नस्त फिर तवले वन सल्ली
[0:27]वन सलिम अला हबीब नजीब हील हाफिज सिरही व मुबल रिसाला बशीर
[0:35]रहमत ही व नजरे नमते सैयदना व नबीना व मौलाना अबील कासम
[0:43][संगीत] मोहम्मद वाला आल अयी अरीन अजबी हुदा मदल मासूमीन मुकन अल्जीना
[1:04]बला रा अला सल्ला नवला बल्लाह अम्मा बाद काल अल्लाह तबारक ताला
[1:22]बिल्ला मतान रजी बिस्मिल्लाह रहमान रहीम इन कुतु ला सवात पढ़िए मोहम्मद
[1:34]आले मोहम्मद परह माहे मुहर्रम उल हराम का आगाज होने वाला है
[1:46]और एक दफा फिर परवरदिगार मुताल की जानिब से हमें अजाए सैयद
[1:53]शोहदा अ सलातो सलाम की सूरत में और औलाद फातिमा के गम
[1:58]की सूरत में एक नेमत है कि जो नसीब होने वाली है
[1:59]इदा कलाम में मैं आपसे दरख्वास्त करूंगा कि वोह तमाम तर मरहन
[2:06]मोमिनीन और मोमिना के जो किसी ना किसी अंदाज में फर्श अजा
[2:09]की खिदमत कर रहे थे फर्श अजा की नौकरी कर रहे थे
[2:15]उन सबको याद करते हुए जुमला मरहन के लिए एक मर्तबा सूर
[2:17]मुबारक अलहम्द और तीन दफा सूर मुबारका खलास की तिलावत फरमा दीजिए
[2:28]बमला सूर मुबारक आल इमरान की 3 आयत को आपके सामने सरनामा
[2:55]कलाम के तौर पर पेश किया है और चकि इस्तकबाल माहे मुहर्रम
[3:00]का प्रोग्राम है और दर्स का उनवान भी उसी तबार से है
[3:05]तो इसी हवाले से चंद नुका के जो आप सब पहले से
[3:10]जानते हैं सिर्फ तकरार करना उसका मकसूद है ताकि यादा आवरी हो
[3:14]जाए और हम बेहतर अंदाज में माहे मुहर्रम उल हराम में दाखिल
[3:20]हो सके सबसे पहली बात जो काबिले तवज्जो है वह यह है
[3:24]कि माहे मुहर्रम उल हराम में जो सैयद शोहदा का गम है
[3:30]जो सगवारी है जो दारी है यह तबार नहीं है क्या मतलब
[3:35]मतलब यह है कि मिसाल के तौर पर आपको मालूम है कि
[3:40]4 फरवरी को कश्मीर डे मनाया जाता है मिसाल के तौर पर
[3:43]पहली मई को यम मजदूर मनाया जाता है किसी दिन फादर्स डे
[3:48]मनाया जाता है किसी दिन मदर्स डे मनाया जाता है इस दिन
[3:52]का इस उनवान के साथ कोई ताल्लुक और राबता नहीं है यानी
[3:54]क्यों 4 फरवरी को ही यो में कश्मीर बनाया जाए पांच को
[3:59]ना मनाया जाए तीन को ना मनाया जनवरी में ना मनाया जाए
[4:01]मार्च में ना मनाया जाए इस दिन की कोई ऐसी खुसूसियत नहीं
[4:05]है कि इस उनवान के साथ इसी दिन को मनाया जाए लेकिन
[4:11]चूंकि बिलख कोई ना कोई दिन ऐसा है कि जिस दिन हमें
[4:15]इस उनवान से किसी दिन को मनाना है तो हम पूरे साल
[4:16]में से किसी भी दिन का इंतखाब करके और उस दिन पर
[4:20]य उनवान लगा देते हैं यह उनवान कौन लगाता है इंसान लगाते
[4:24]हैं भा हम इस दिन इस उनवान से मनाएंगे हालाकि उस दिन
[4:28]का इस उनवान के साथ कोई हकीकी ताल्लुक और राबता नहीं है
[4:33]लोगों ने तबार कर लिया जिस तरह से नाम तबार किया जाता
[4:37]है जो बच्चा पैदा हुआ है इस बच्चे का नाम क्या रखा
[4:41]जाए मिसाल के तौर पर इस बच्चे का नाम हसन रखा जाए
[4:44]क्यों हसन क्यों रखा जाए हुसैन क्यों ना रखा जाए अली क्यों
[4:47]ना रखा जाए क्योंकि बिलख हमने इसका कोई ना कोई नाम रखना
[4:50]है तो घर वालों को जो नाम पसंद होता है उसका ऐतबार
[4:56]कर लेते हैं यानी इस बच्चे के और इस नाम के दरमियान
[4:59]कोई ताल्लुक राबता नहीं है ऐसा नहीं है कि इस बच्चे में
[5:04]कोई ऐसी खुसूसियत पाई जाती है कि उसके लिए यह नाम रखा
[5:08]जाए नहीं चूंकि हमने कोई ना कोई नाम रखना रखना है इस
[5:10]बच्चे का तो हम तबार कर लेते हैं कि इस बच्चे का
[5:15]नाम मिसाल के तौर पर हसन लेकिन माहे मुहर्रम उल हराम भी
[5:22]आशूरा भी तासु आ भी नौ मुहर्रम भी 10 मुहर्रम भी मोहर्रम
[5:24]का चांद भी क्या इसी तरह से है कि हमने चूंकि इमाम
[5:31]हुसैन का गम मनाना है तो किसी ना किसी दिन का इंतखाब
[5:34]करना है तो हमने कहा चलो पहली से 10 मुहर्रम कल सुबह
[5:37]मिसाल के तौर पर कोई प्रॉब्लम आ जाए कोई वाकया पेश आ
[5:41]जाए तो हम इसको शिफ्ट कर दें भाई हम आशूरा का दिन
[5:44]10 मुहर्रम के बजाय हम रबीउल अव्वल में मनाएंगे ऐसा हो सकता
[5:47]है इसके लिए हमें देखना पड़ेगा कि इस दिन का सगवारी के
[5:53]साथ इस दिन का अजादारी के साथ इस दिन का सैयद शोहदा
[5:58]पर गिरि के साथ क्या ताल्लुक और राबता है आया यह राबता
[6:00]हकीकी है या तबार है तो जो रिवायत हमारे पास मौजूद है
[6:09]जो जियारा के जुमले हमारे पास मौजूद हैं जो आइमा अल सलातो
[6:15]सलाम के फरामीर हमारे पास मौजूद है वो यह बताते हैं कि
[6:17]नहीं अगर तुम में से कोई भी हुसैन इब्ने अली का गम
[6:22]ना मनाए हुसैन इब्ने अली की सगवारी ना करे हुसैन इब्ने अली
[6:27]की अजादारी ना करे हुसैन इब्ने अली पर गिरिया ना करे यह
[6:29]जहान है कि जो मुहर्रम के इन 10 दिनों में हुसैन इब्ने
[6:34]अली पर गिरिया कर रहा है यानी मैंने और आपने मिलकर डिसाइड
[6:40]नहीं करना कि हमने आशूरा के दिन हुसैन इब्ने अली को रोना
[6:43]है बल्कि दुनिया रो रही है आलम रो रहा है पत्थर रो
[6:47]रहे हैं चरि परिन गिरिया कर रहे हैं जमादा तो नबादा तो
[6:50]हैवान गिरिया कर रहे हैं मैंने और आपने इस आलम की हमर
[6:57]करनी है जो जुमला रिवायत ने हमारे सामने ने बयान किया वो
[7:02]क्या है व बकाल जमी उल खलाक आपके लिए तमाम तर परवरदिगार
[7:09]मुताल ने जिस जिस मखलूक को खल्क किया है वह सब का
[7:11]सब आपके लिए गिरिया फरमाता है बस मैं और आप गिरि को
[7:16]आगाज नहीं कर रहे गिरि को शुरू नहीं कर रहे अजादारी को
[7:21]शुरू नहीं कर रहे सगवारी का आगाज नहीं कर रहे बल्कि मैं
[7:27]और आप इस आलम की हमर कर रहे हैं सब वैसे ही
[7:28]हुसैन इब्ने अली को रो रहे हैं मैं और आप रो कर
[7:32]के इनके साथ शामिल हो रहे हैं व बकाल जमीला रिवायत का
[7:37]जुमला जो कुछ आसमान और जमीन में है वह सब का सब
[7:41]गिरिया करता है रिवायत है कि जब मुहर्रम का चांद नजर आता
[7:46]है परवरदिगार मुताल फरिश्तों को हुकम देता है मैं और आप अजा
[7:50]खाने सजाते हैं या नहीं सजाते मैं और आप जिस तरह से
[7:54]आप देख रहे हैं कि हर मस्जिद इमाम बारगाह में मरम्मत का
[7:55]काम हो रहा है अजादारी के लिए तैयारियां की जा रही है
[7:59]मोहर्रम की की आमद की तैयारियां की जा रही है अजा खाने
[8:03]सजाए जा रहे हैं अभी 29 जल हज्जा आएगी अजा खाने सजाए
[8:04]जाएंगे घरों में अजा खाने सजाए जाएंगे इमाम बारगाह को दोबारा से
[8:10]मुरत मुनज्जा लेकिन यह सब काम हम किसकी पैरवी में कर रहे
[8:14]हैं आपको य जानकर हैरानगोइथॉन्ग फरमाते हैं जब माहे मुहर्रम उल हराम
[8:38]का आगाज होता है तो परवरदिगार फरिश्तों को हुक्म देता है कि
[8:42]हुसैन इब्ने अली का वह लिबास कि जो सैयद शोहदा ने अपने
[8:48]आखिरी वक्त में अपने तन पर रखा था उस लिबास को आसमान
[8:53]पर आवेज किया जाए सबसे पहले फरिश्ते हुसैन इब्ने अली का वो
[8:57]खून आलू कुर्ता आसमान पर आवेज करते मैं और आप सिया परचम
[9:02]बाद में लगाते हैं मैं और आप अजा खाने बाद में सजाते
[9:07]हैं पहले परवरदिगार मोहर्रम का एहतमाम करता है पस यह कोई आसान
[9:10]मरहला नहीं है कि जिससे हम बहुत आसानी से गुजर जाए नहीं
[9:15]इस मुहर्रम को समझने की जरूरत है मुहर्रम में कौन से राज
[9:17]रुमू पोशीदा है कि परवरदिगार मुताल इसका एहतमाम कर रहा है कौन
[9:23]से ऐसे राज र मूस पोशीदा है कि व बकाल जमीला की
[9:28]म त है कि जहां पर सारा का सारा आलम हुसैन इब्ने
[9:33]अली के लिए गिरिया फरमा रहा है क्या है ऐसा कौन सा
[9:37]राज है कौन सा रमज है कि जो पोशीदा है हुसैन इब्न
[9:38]अली की शहादत इसको समझने की जरूरत है बस अजने गिरामी कद्र
[9:45]मैं और आप कोशिश करें कि मुहर्रम उल हराम में दाखिल होने
[9:51]से पहले मुहर्रम उल हराम को समझे हुसैन इब्ने अली पर गिरिया
[9:53]करने से पहले हुसैन इब्ने अली को समझे हुसैन इब्ने अली पर
[9:58]आंसू बहाने से पहले हुसैन इब्ने अली को समझे क्यों क्योंकि यह
[10:00]कोई आम सगवारी और आम अजादारी की कैफियत नहीं है इसकी दलील
[10:07]क्या है इसकी दलील यह है कि आम सगवारी और आम अजादारी
[10:12]वक्त के साथ-साथ मांद पड़ती रहती है किसी के यहां किसी की
[10:19]वालिदा का इंतकाल हो जाए तो आप जब उसके पास ताजि अत
[10:24]के लिए जाएंगे तो जब इंतकाल हुआ है उसी घंटे हालत मुख्तलिफ
[10:27]होगी दो चार घंटे के बाद हालत मुख्तलिफ होगी तद फीन के
[10:33]बाद हालत मुख्तलिफ होगी सोयम के बाद हालत मुख्तलिफ होगी चलम के
[10:36]दिन और मजीद सब्रो करार आ जाएगा आप जब कई सालों के
[10:41]बाद बरसी के दिन जाएंगे तो अब ऐसा लगेगा जैसे इंतकाल ही
[10:43]नहीं हुआ आम सगवारी और अजादारी की तबीयत का और उसकी नेचर
[10:49]का तकाजा यह है कि वक्त के गुजरने के साथ-साथ वह अजादारी
[10:54]मांद पड़ती रहती है पहले घंटे में इंसान बहुत रोना आ रहा
[10:58]होता है मां पर पर लेकिन स्वयं के दिन हालत कुछ कदर
[11:02]बेहतर होती है पहले दिन लिबास बदलने की भी का ध्यान नहीं
[11:07]होता इंसान की तवज्जो नहीं होती कि जाकर के लिबास तब्दील करूं
[11:09]लेकिन स्वयम के दिन कुछ बेहतर लिबास पहन कर के आता है
[11:12]चैलम के दिन आप देखें कि नौकरी पर भी जा रहा होता
[11:16]है स्वयं के बाद अपनी जॉब पर भी जाना शुरू कर देता
[11:17]है अपने घर के कामों को भी अंजाम देना शुरू कर देता
[11:20]है चहल के बाद शादियों में भी जाने लगता है और बरसी
[11:23]के दिन तो कभी-कभी याद दिलाना पड़ता है घर आता है तो
[11:25]कभी बहन कभी जौजा याद दिलाती है कि भाई आज अम्मा की
[11:28]बरसी है आज अब्बा की बरसी है यह वही शख्स है कि
[11:31]जो अम्मा के मरने पर ड़ मार मार करके रो रहा था
[11:34]लेकिन आज बरसी के दिन भूल गया क्यों क्योंकि वक्त के गुजरने
[11:36]के साथ-साथ यह सोग मान पड़ता चला जाएगा परवरदिगार मुताल ने इस
[11:41]जहान को खलक किस तरह से किया है और यह अल्लाह ताला
[11:45]की नेमतों में से एक नेमत है इसको लमा बयान फरमाते हैं
[11:47]कि भूलना भूल जाना यह खुदा की नेमतों में से एक नेमत
[11:53]है मैं और आप इसको तसव्वुर नहीं कर पाता अगर इंसान ना
[11:57]भूल पाए तो मां के मरने के बाद कोई जिंदा ना रह
[11:58]सके बच्चे के मरने के बाद कोई जिंदा ना रह सके यह
[12:03]परवरदिगार की नेमत है कि परवरदिगार आहिस्ता आहिस्ता उस याद पर गर्द
[12:06]डालता रहता है कुछ अरसे के बाद उस पर गर्द पड़ जाती
[12:09]है वह याद फरामोश हो जाती है मेहव हो जाती है यह
[12:13]आम सगवारी का तकाजा है आम सगवारी आप देखिए इसी तरह से
[12:17]होती है वक्त के गुजरने के साथ-साथ मां पड़ती रहती है किसी
[12:22]का जवान बच्चा भी चला जाए जनाजे के दिन मां की हालत
[12:24]बहुत अजीब होती है लेकिन कुछ दिनों के बाद आहिस्ता आहिस्ता सब्र
[12:29]करर आ ही जाता है कुछ दिनों के बाद मां की हालत
[12:30]दोबारा पहले जैसी होने लगती है लेकिन यह सिर्फ और सिर्फ अजाए
[12:37]सैयद शोहदा अल सलातो वस्सलाम अजाए हुसैन इब्ने अली अल सलातो सलाम
[12:41]सवात पढ़िए मोहम्मद और आले मोहम्मद पर सिर्फ इस अजादारी की खुसूसियत
[12:52]है कि हर साल इस अजादारी में ना सिर्फ ये कि कमी
[12:54]नहीं होती बल्कि हर साल इस अजादारी में एक कदम इजाफा होता
[13:00]है ये सिर्फ और सिर्फ इस अजादारी की खुसूसियत है बस क्या
[13:03]है इसमें ऐसा क्या रमज है क्या राज है आमा अ सलातो
[13:07]सलाम की निस्बत आप यह नहीं कह सकते इमाम सज्जाद की निस्बत
[13:11]कि इमाम सज्जाद को सब्र नहीं आ रहा था इमाम सज्जाद अल
[13:15]सलातो सलाम रोए जा रहे थे अपनी जिंदगी के 35 बरस रोते
[13:20]रहे इमाम बाकर वसीयत कर रहे हैं मिना के मैदान में मेरे
[13:24]जद के लिए मजलिस का एहतमाम करना इमाम सादिक अल सलातो सलाम
[13:27]कह रहे हैं कि रहम अल्लाह अबन परवरदिगार मुताल उस बंदे पर
[13:33]रहमत नाजिल करे कि जो हमारे जद पर गिरिया फरमाता है इमाम
[13:35]काजम को देखिए गिरिया फरमा रहे हैं इमाम रजा कह रहे जब
[13:40]किसी चीज पर रोना आए हमारे जद हुसैन पर रो लिया करो
[13:45]यह क्या है इमाम जमाना फरमा रहे हैं कि मेरे आका मेरे
[13:50]मौला मैं आपके लिए जो है वह आंसुओं के बजाय खून बहाता
[13:52]हूं यह क्या है एक आम इंसान को बाप के मरने के
[13:58]बाद सब्र आ जाता है इनको सब्र क्यों नहीं आ क्या हम
[14:01]यह कह सकते हैं आम इंसान से भी ज्यादा बेसरी की कैफियत
[14:07]में मुतला है य तो व जबात मुकद्दसा है कि जो सद
[14:16]शदा सलातो सलाम मकतल में जब वह मलून खंजर चला रहा था
[14:18]उस वक्त य फरमा रहे थे नला किया मु मैं तो तेरी
[14:25]रजा पर राजी हूं मैं तो तेरे अमर के सामने तस्लीम रावी
[14:29]कहता है कि जैसे-जैसे असरे आशूर करीब आ रही थी हुसैन के
[14:35]चेहरे की नूरानिया में इजाफा हो रहा था हत्ता रिवायत ने यह
[14:40]जुमला तक लिखा एक शख्स कहता है कि जब सैयद शोहदा उस
[14:46]कत्ल गाह में मौजूद थे और वह मलून सैद शोहदा के गुलू
[14:48]अतहर पर खंजर चला रहा था वह शख्स कहता है कि हुसैन
[14:55]इब्ने अली के चेहरे की नूरानिया इतनी ज्यादा थी कि मैं उस
[14:57]चेहरे की नूरानिया में इतना मह हो गया कि मैं उनसे उनके
[15:02]कत्ल से गाफिल हो गया यानी मेरा ध्यान और मेरी तवज्जो चलते
[15:07]हुए खंजर के बजाय उसकी नूरानी में इतनी ज्यादा हो गई कि
[15:09]मुझे पता नहीं चला कि कब उस मल ने सद शोहदा की
[15:12]गर्दन को जुदा कर दिया रिनम यह उस मकाम पर है यह
[15:22]अपना सब कुछ खुदा की राह में लुटाने के लिए तैयार है
[15:24]फिर क्या है कि जोमा सला सलाम बारहा ताकीद कर रहे हैं
[15:30]कि जो कुछ भी हो जाए अगर एक हाथ कटवा कर के
[15:33]भी जाना पड़े तो हुसैन की जियारत के लिए जाओ अगर बच्चे
[15:36]कुर्बान करके भी हुसैन का जिक्र करना पड़े तो हुसैन का जिक्र
[15:38]करो क्या वो रमज और राज पोशीदा है नाम हुसैन इब्ने अली
[15:44]इब्ने अबी तालिब में कि मैं और आप आमा अल सलातो सलाम
[15:49]की जानिब से वसीयत की गई है नसीहत की गई है ताकीद
[15:51]की गई है कि जितनी कुर्बानियां देनी पड़े दो लेकिन इस जिक्र
[15:56]को खामोश मत होने देना क्या है ऐसा इस जिक्र में यह
[16:03]समझने की जरूरत है अगर हम इस बात को समझ लेंगे तो
[16:05]इस बात के समझने के बाद खुद बखुदा हमें अजादारी समझ में
[16:09]आना शुरू हो जाएगी और फिर हमें पता चल जाएगा कि हमें
[16:14]अजादारी करनी किस तरह से किस तरह से हुसैन इब्न अली का
[16:16]नाम लेना है वो जो राज वो जो रमज शहादत हुसैन में
[16:22]नाम हुसैन में जिक्र हुसैन में पोशीदा है वो यह है कि
[16:29]जिक्र हुसैन के जरिए से लोगों की रूहों की निजात का सामान
[16:32]किया गया जिस बात को आइमा अल सलातो सलाम ने हाईलाइट किया
[16:47]है कर्बला के वाक में वो क्या है मजलूम त हुसैन इब्ने
[16:50]अली इसीलिए आप देखिए कि जब इमाम जमाना अल सलातो सलाम जुहूर
[16:57]फरमाएंगे सवात पढ़िए तो काबे की दीवार से टेक लगा कर के
[17:06]जब अपना तारुफ करवाएंगे तो क्या कहेंगे अला अलम इ जदल हुसैन
[17:11]कतना कौन जमाने का इमाम इमाम महदी जिससे मुतालिक तमाम तर फिरको
[17:19]का इत्तेफाक है कि उन्होंने तशरीफ लाना है इलाफ किस बात में
[17:22]है बाज कहते हैं कि विलादत हो गई है बाज कहते नहीं
[17:24]विलादत होगी बाज कहते हैं गै बत में बाज कहते हैं पैदा
[17:29]नहीं हुआ इसमें इलाफ लेकिन वुजूद इमाम महदी में उम्मते मुस्लिमा के
[17:33]दरमियान किसी किस्म का कोई इख्तिलाफ नहीं पाया जाता वह इमाम महदी
[17:40]जब आएंगे तो आने के बाद अपना तारुफ किस तरह से करवाएंगे
[17:43]ऐ दुनिया वालों जान लो मेरे जद हुसैन थे जिनको प्यासा कत्ल
[17:50]कर दिया गया नाम है हुसैन इ अली यानी जिस चीज को
[17:52]आइमा मुस्तकिल हाईलाइट कर रहे हैं इमाम सज्जाद की जिंदगी में आप
[17:58]जा कर के देखिए क्या है यह इमाम सज्जाद जो बार-बार अंजाम
[18:01]दे रहे हैं पानी देख रहे हैं तो रो रहे हैं बाजार
[18:05]में जा रहे हैं तो गिरिया फरमा रहे हैं कोई शादी पर
[18:07]बुला रहा है तो गिरिया कर रहे हैं किसी गोस फंद को
[18:10]जिबाह होते हुए देख रहे हैं तो गिरिया फरमा रहे हैं वजू
[18:11]के लिए पानी आ रहा है तो गिरिया फरमा रहे हैं कोई
[18:14]पूछ रहा है कि क्यों गिरिया फरमा रहे हैं कह रहे हैं
[18:18]कि मेरे 18 यूसुफ कर्बला के मैदान में कत्ल कर दिए गए
[18:21]यह क्या है इस मजलूम अत को क्यों इतना हाईलाइट किया जा
[18:26]रहा हैल सलातो सलाम की जानिब से इमाम कह इने शबीब जब
[18:30]कभी किसी चीज पर रोना आए अपनी बात पर मत रोना मेरे
[18:34]जद हुसैन पर गिरिया करना क्यों क्योंकि उसे उस तरह से कत्ल
[18:36]कर दिया गया जिस तरह किसी गोस फंद को कत्ल किया जाता
[18:40]यानी इस मजलूम त हुसैन इब्ने अली को बहुत ज्यादा हाईलाइट किया
[18:46]जा रहा है और खुद सैयद शोहदा अ सलातो सलाम भी अपनी
[18:50]मजलूम को कर्बला के मैदान में हाईलाइट करना चाहते हैं क्या नहीं
[18:55]मालूम था कि यह इतने शकील कल्ब है कि अली असगर को
[19:00]को पानी नहीं देंगे लेकिन सद शोहदा इस वाक को कर्बला की
[19:02]तारीख में हाईलाइट करना चाहते थे कि मैंने अपने हाथ पर अपने
[19:07]छ माह के बच्चे को उठा कर के पानी मांगा इन्होंने पानी
[19:11]नहीं दिया तारीख ने लिखा कि हुसैन इब्ने अली ने कुछ नहीं
[19:16]मांगा कर्बला के मैदान में किसी से सिवाय पानी के सिर्फ और
[19:20]सिर्फ आखिर वक्त तक कहा कि मैं प्यासा हूं मुझे पानी दो
[19:25]इस मजलूम को क्यों हाईलाइट कर रहे हैं खुद सद आमा सलातो
[19:31]सलाम हत्ता इमाम जमाना वजह यह है कि इस मजलूम अत के
[19:38]पैगाम में इतनी सलाहियत और काबिलियत पाई जाती है कि दुनिया के
[19:41]हर इंसान को ना सिर्फ मोमिन ना सिर्फ मुसलमान बल्कि दुनिया के
[19:49]हर उस इंसान को कि जिसके दिल में जर्रा बराबर भी इंसानियत
[19:52]बाकी है उसको इस मजलूम त के तस्कर के जरिए से अट्रैक्ट
[19:57]किया जा सकता है यह वो सलाहियत और काबिलियत इस जिक्र में
[20:01]है जो किसी जिक्र में नहीं और इसी वजह से आमा सलातो
[20:06]सलाम मुस्तकिल इस जिक्र को जिंदा रखने की ताकी या इमाम बाकर
[20:13]वसीयत करके जा रहे हैं कि मेरे माल में से मेरे विरासत
[20:14]में से एक हिस्सा अलग किया जाए और उससे मिना के मैदान
[20:18]में हुसैन इने अली का तस्करा क्यों क्योंकि इस जिक्र के अंदर
[20:25]इस सलाहियत है क्योंकि जब भी आप किसी को बताएंगे कि किसी
[20:28]को प्यासा मार दिया गया तो सामने वाला यही कहेगा कि जितना
[20:33]भी इख्तिलाफ था जितनी भी दुश्मनी थी जितनी भी लड़ाई थी जितना
[20:36]भी झगड़ा था लेकिन प्यासा नहीं मारना चाहिए यह वह हाईलाइट हिस्सा
[20:43]है कर्बला का कि जिसको आमा सलातो सलाम हाईलाइट करना चाहते कि
[20:50]मजलूम त का पैगाम इसीलिए क्या कहा गया कि मजलिस की असल
[20:58]क्या है मसाइल आप देखें के लमा कराम इस जुमले को बारहा
[21:01]इस्तेमाल करते हैं खासकर मरहूम अल्लामा तालिब जोरी अल रहमा तकरार करते
[21:08]थे कि बस फजल के आखिर में कहते थे कि बस आपकी
[21:09]जहमत तमाम यानी क्या यानी आप जो मैंने अभी तक जो कुछ
[21:14]पढ़ा व मैं आपको जहमत दे रहा था असल मजलिस का जो
[21:17]हिस्सा है व अब शुरू हो रहा है व मसाब का हिस्सा
[21:20]अमा सला सलाम ने क्या कहा आओ आकर के मरसिया पढ़ो हमारे
[21:25]जत का ये नहीं कहा किसी को आकर के हुसैन इब्न अली
[21:30]के नाम पर आकर के फरमान सुनाओ इमाम हुसैन का कि अखलाकी
[21:33]कोई हदीस सुनाओ कुछ सुनाओ इमाम हुसैन का नहीं आओ हमारे जद
[21:38]के मसाइल पढ़ो बताओ एक दफा बता दिया मौला कि आपके जद
[21:39]प्यासे कत्ल हो गए हर साल मुहर्रम में 10 दिन बार-बार बताएं
[21:44]कि प्यासे मारे गए प्यासे मारे गए प्यासे मारे गए क्यों ये
[21:47]जो ऐतराज किया जाता है वो यही है भ आपने एक दफा
[21:51]बता दिया प्यासे मारे गए हमने कबूल कर लिया हम को मना
[21:54]कर रहे हैं कि प्यासे नहीं मारे गए फिर आप हर साल
[21:56]10 दिन मातम कर रहे हैं गली कचों में चौराहों पे निकल
[21:58]रहे हैं के रसूल अल्लाह के नवासे को प्यासा मार दिया बे
[22:01]कफन बे कब्र रह गया क्या है ये हमने जब कबूल कर
[22:05]लिया तो बार-बार तकरार करने की क्या जरूरत है इसलिए बार-बार तकरार
[22:09]करने की जरूरत है क्योंकि इस पैगाम में इंसानियत का पैगाम पोशीदा
[22:13]है कि अगर किसी की किसी के साथ जितनी भी दुश्मनी है
[22:18]उसके साथ लड़े उसके साथ जंग करे लेकिन उस पर पानी बंद
[22:25]नहीं कर सकता जितनी भी दुश्मनी है उसके लाशे की बेहुरमति नहीं
[22:28]कर सकता जितनी भी दुश्मनी है उसके छ माह के बच्चे को
[22:33]कत्ल नहीं कर सकता जितनी भी दुश्मनी है उसके खवातीन और मस्तूरा
[22:35]की बहुमत नहीं कर सकता यह इंसान की इंसानियत चीख चख कर
[22:40]और चिल्ला चिल्ला करके बताती है कि इंसान की इंसानियत का तकाजा
[22:42]है और आमा सला सलाम ने इसी बात को हाईलाइट किया क्यों
[22:48]क्योंकि यह इंसानियत का पैगाम है कि जो हुसैन इब्ने अली कर्बला
[22:51]के मैदान में देना चाहते हैं और फमा सलातो सलाम उस पैगाम
[22:55]को जिंदा रखना चाहते मजलूम त का पैगाम पस अजादारी सैयद शोहदा
[23:02]सगवारी यह गम की कैफियत यह आंसू बहाना यह मातम करना क्या
[23:05]है इस मजलूम अत के पैगाम को दुनिया तक पहुंचाना है दुनिया
[23:09]वालों क्यों मार दिया हुसैन इब्न अली को प्यासा वह कौन सा
[23:16]निजाम था कि जिसका नतीजा यह निकला कि रसूल का नवासा कर्बला
[23:23]के मैदान में भूखा और प्यासा कत्ल कर दिया जाए बेगर कफन
[23:26]उसका जनाजा पढ़ा रहे वो किस निजाम का नतीजा था वह किस
[23:31]सिस्टम का नतीजा था यह सवाल है कि जो मुहर्रम में हमारी
[23:34]जिम्मेदारी है कि लोगों के अजन में इजाद करें बस मुझे और
[23:40]आपको बाज दूसरी बातें थी जिसको आपके सामने बयान करना चाहता था
[23:43]लेकिन इस वक्त दामन वक्त में गुंजाइश नहीं है बस मुझे और
[23:51]आपको अजने गिरामी कद्र इस बात पर तवज्जो मुझ तक और आप
[24:01]तक पहुंची है यह मेरी और आपकी मिलकियत नहीं है यह मेरे
[24:04]और आपके पास अमानत है बस इसके साथ ऐसा बर्ताव किया जाए
[24:12]जैसा अमानत के साथ किया जाता है इंसान की मिलकियत होती है
[24:15]जब इंसान कोई घर खरीदता है तो कमरा तोड़ देता है कमरा
[24:20]बड़ा कर देता है फला कर देता है उस उसकी सारी साख
[24:22]तब्दील कर देता है लेकिन जब कोई घर किराए पर लेता है
[24:26]तो उसको इजाजत नहीं है कि किसी दीवार को तोड़े उसको इजाजत
[24:30]नहीं है कि इसके नक्शे को उसकी साख को तब्दील करे क्यों
[24:32]क्योंकि तुम्हारा है ही नहीं तुम्हें सिर्फ रहने के लिए दिया है
[24:38]जैसा दिया है वैसा ही वापस लिया जाएगा अजादारी मेरी और आपकी
[24:44]मिल्कियत नहीं है यह फातिमा जहरा सलाम उल्ला अलहा की मिल्कियत है
[24:47]मैं और आप सिर्फ और सिर्फ इसके अमीन है अमानतदीने उसमें उस
[24:58]तरह की खराब ईजाद करें उसकी साख को तब्दील करें जैसी दी
[25:03]गई है वैसी ही वापस पलटा नहीं है इस वक्त आप देखें
[25:12]कि वाक तवज्जो ज्यादा तवज्जो फात और शुभत अजादारी में शामिल ना
[25:30]होने पाए इस अजादारी की असल यह है असल कि इसमें गरीब
[25:32]और अमीर का कोई फर्क नहीं होना चाहिए यह अजादारी आज इसलिए
[25:40]महफूज है क्योंकि इसमें फैक्ट्री का मालिक और उस फैक्ट्री का मुलाजिम
[25:46]एक साथ एक फर्ज पर बैठते हैं लेकिन आप देखें कि आहिस्ता
[25:51]आहिस्ता इस अजादारी में वह तहरी फें आ रही है कि वो
[25:56]साजिश के के जो दूसरे अह काम इस्लामी के खिलाफ की गई
[26:02]अजादारी के खिलाफ की जा रही है पहले आप इश्तेहार मजलिस का
[26:12]देखते थे तो सबसे बड़ा नाम हुसैन इब्ने अली का लिखा होता
[26:17]था उसके बाद सोस खवा का नाम लिखा होता था सलाम खवा
[26:20]का नाम लिखा होता था खतीब का नाम लिखा होता था नोहा
[26:22]पढ़ने वाले का नाम लिखा होता अब सबसे बड़ा नाम ट्रस्ट के
[26:30]चेयरमैन का लिखा है उससे बड़ा नाम खुसूसी तावुन करने वाले का
[26:36]लिखा है उससे बड़ा नाम पैसे देने वाले का लिखा है उससे
[26:38]बड़ा नाम तशी आत करने वाले का लिखा है क्या है हमारी
[26:44]अजादारी किस तरफ जा रही है मैं और आप इस मजलिस हुसैन
[26:53]को किस तरफ लेकर के जा रहे हैं क्या सुपुर्द कर रहे
[26:55]हैं अपनी अगली नस्लों के क्याय यह वही अमानत है जो हमारे
[26:59]आबा अजदाद ने हमारे हवाले की थी क्या यह वही अमानत है
[27:07]अगर हम इस अमानत में खयानत करके आगे हवाले कर रहे हैं
[27:12]तो जो इस अमानत की मालिका है वह हमसे जरूर सवाल करेगी
[27:15]और जब वह सवाल करेगी तो वाक मैं और आप जवाब नहीं
[27:23]दे पाएंगे इस वक्त आप देखें कि अजादारी के नाम पर क्या
[27:25]दुनियादारी का बाजार है कि जो गर्म हुआ एक मुकाबला है ऐसा
[27:30]लग रहा है कि एक मुकाबला चल रहा है कि किसकी मजलिस
[27:35]सबसे ज्यादा बड़ी होगी इस वक्त जंग चल रही है कि किस
[27:42]मजलिस को यह अवार्ड मिल जाए कि वह सबसे बड़ी मजलिस बड़ी
[27:44]मजलिस लोगों से होती है बड़ी मजलिस इश्तेहार से होती है बड़ी
[27:51]मजलिस खतीब से होती है बड़ी मजलिस मुंतज से होती है बड़ी
[27:56]मजलिस फातिमा जहरा की शिरकत से होती है तीन लोग बैठे हो
[28:04]खतीब पढ़ने वाला हुसैन का नाम ले और तीन लोगों की आंखों
[28:08]में आंसू आ जाए अगर इन आंसुओं को फातिमा जहरा कबूल कर
[28:12]ले यह सबसे बड़ी मजलिस क्यों मैं और आप इजाजत देते हैं
[28:18]कि इस अजादारी के अंदर इस तेजी के साथ दुनियादारी बढ़ती चली
[28:29]जाए जाती निमा जाती दिखावा बढ़ता चला जाए हर बंदा इस तद
[28:34]में कि किसी तरह उसका नाम मजलिस के इश्तहार पर आ जाए
[28:39]क्यों क्या जिसने देखना है वह नहीं देख रहा जिससे अजर के
[28:44]तालिब हो उसको नहीं मालूम कि तुमने क्या कंट्रीब्यूट किया है मजलिस
[28:49]में वाक बुजुर्गा यहां पर मौजूद है वह इस बात की गवाही
[28:55]देंगे कि क्या सादा मजलिस हुआ करती थी कि सा के साथ
[28:59]खतीब आक के जिक्र हुसैन किया करता था बाज मुका मात पर
[29:03]मुझे आज भी याद है कि मजलिस की इंपॉर्टेंस होती थी खतीब
[29:08]की इंपॉर्टेंस नहीं होती थी मजलिस में जाना कोई भी पढ़ेगा हत्ता
[29:11]मालूम नहीं होता था बाज मु कामात पर खतीब के बैठने तक
[29:14]के कौन पढ़ेगा मजलिस एक एक चीज पर हमें त बाज चीज
[29:19]ऐसी है जो मैं आपके सामने यहां पर नहीं बयान कर सकता
[29:21]क्योंकि बिलार रिकॉर्डिंग भी हो रही है लेकिन हमें वाक तवज्जो कहीं
[29:28]ऐसा ना हो मैं बहुत ही एहतियात के साथ बाज बातें बयान
[29:34]करना चाहता हूं कहीं ऐसा ना हो कि मरकज मजलिस के बड़े
[29:40]होने के नतीजे में इलाकाई अजा खाने वीरान हो जाएं कहीं ऐसा
[29:47]ना हो कि मैं और आप सब अपने अपने इलाकों को छोड़
[29:51]कर के जाएं दूसरी जगहों पर बड़ी-बड़ी मजलिस में शिरकत करने के
[29:53]लिए और मोहल्ले के इमाम बारगाह और अजा खाने और मस्जिदें वीरान
[29:58]हो जा जाए जो बुजुर्गों ने हमारे सिलसिला बनाया था वह वाक
[30:06]बहुत सोच समझ कर के बनाया था एक दफा एक साहब से
[30:12]गुफ्तगू हो रही थी तो व इस बात की तरफ इशारा कर
[30:15]रहे थे कि जब पाकिस्तान बनने के बाद कराची की मरजी मजलिस
[30:20]के लिए वक्त तय करने की बात हुई कि वक्त क्या रखा
[30:26]जाए तो कहा बुजुर्गों ने इस बात पर ख्याल रखा कि मरकज
[30:28]मजलिस का वक्त मगरिब की नमाज के बाद का ना हो मगरिब
[30:31]की नमाज से पहले का वक्त हो क्यों ताकि सब उस मजलिस
[30:35]में शिरकत करने के बाद फिर अपने अपने इलाकों में जाएं और
[30:36]इलाकों के अजा खानों को रौनक बक्शे इलाकाई अजादारी जिंदा रहे अजा
[30:46]खाने आबाद रहे अजा खाने जिंदा रहे इमाम बारगाह आबाद रहे हर
[30:49]इलाके मोहल्ले के अजा खाने में रौनक रहे तेजी के साथ जो
[30:55]अजादारी का कल्चर तब्दील हो रहा है जो नजरो नियाज का कल्चर
[30:57]तब्दील हो रहा है नजरो नियाज तबर्रुक की हैसियत को खत्म करता
[31:04]चला जा रहा है पहले तबर्रुक होता था बचा कर के घर
[31:08]ले जाते थे कि घर वाले अगर मजलिस में नहीं आए तो
[31:12]दो लुक मेंे वह भी खा ले शायद उनको भी इसकी बरकत
[31:14]और फजत नसीब हो जाए अब उसका तबक उसकी बरकत खत्म होती
[31:20]चली जा रही है पहले क्या मिलता था आप देखिए कि कोई
[31:25]बहुत ही मामूली सी चीज दुनियावी तबार से मिल जाया करती थी
[31:31]मजलिस के बाद बुजुर्गों को शायद याद हो और इस बात की
[31:36]ताई फरमाए कि क्या ममरे किसी मुकाम पर किसी मुकाम पर कोई
[31:39]मूंग फलियां कुछ इस तरह की चीजें कागज पर रख करके दे
[31:43]दी जाती थी और खाने वाला उसको खा कर के घर बचा
[31:49]कर के भी ले जाता था कि घर वाले भी उसको खाए
[31:49]क्योंकि तबर्रुक है हुसैन बन अली के फर्ज से मिला है आज
[31:54]तबर्रुक की हैसियत खत्म हो रही है फला मुकाम पर क्या है
[31:59]और फला मुकाम पर क्या है जहां अच्छी होगी वहां पर जाएंगे
[32:02]इस अजादारी की तहफ्फुज की जरूरत है क्योंकि हम अगर इस अजादारी
[32:09]को बचाएंगे तो यह अजादारी मुझे और आपको बचाएगी और आज तक
[32:11]हमें और आपको अजादारी ने ही बचाया है मैंने और आपने अजादारी
[32:15]के अलावा और किया किया है अपने आप को बचाने के लिए
[32:19]तो अजादारी की बरकत है कि मेरे और आपके बच्चे अहले बैत
[32:20]के मोहिब हो गए ये तो अजादारी की बरकत है कि हमारी
[32:24]नस्ले हुसैन का नाम लेने वाली हो गई यह तो अजादारी की
[32:27]बरकत है कि हमारे बच्चे खुदा के मुनकर नहीं हुए जाकर के
[32:30]देखिए दूसरे मशर में जहां पर अजादारी नहीं है वहां पर इल्हा
[32:33]का क्या आलम है वहां पर कितनी तेजी के साथ लोग खुदा
[32:37]के मुनकर हो रहे हैं किस तेजी के साथ मुल इदर हैं
[32:38]ये तो सैयद शोहदा के तजक का नतीजा है कि अगर 11
[32:42]महीने में यहां वहां चले भी जाते हैं तो हुसैन इब्ने अली
[32:47]का नाम दोबारा खुदा के दरवाजे पर ले आता है हुसैन इब्ने
[32:49]अली का नाम दोबारा दीन की तरफ ले आता है लेकिन अगर
[32:54]इस अजादारी में इसी तेजी के साथ तहरी फात होती रही इसी
[32:57]तेजी के के साथ इसकी नेचर को इसकी माहियवंशी जिम्मेदारी है नख
[33:28]की जिम्मेदारी है सबसे पहले मेरी जिम्मेदारी और उसके बाद आप सबकी
[33:31]जिम्मेदारी है कि हम इस अजादारी का तहफ्फुज करें इसकी हुरमत को
[33:40]बाकी रखें वाक मैं समझता हूं कि हमारे आबा अजदाद हमारे वालदैन
[33:43]शायद बहुत ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन इस मामले में हमसे
[33:46]बहुत आगे थे शायद दुनियावी तबार से आप कहे कि कोई मैट्रिक
[33:52]किया हुआ था कोई एंटर किया हुआ था आज हम बहुत ज्यादा
[33:55]पढ़ लिख गए हैं बहुत ज्यादा हमने तालीम हासिल कर ली लेकिन
[34:01]तकद्दुस और हुरमत अजा के तबार से व हमसे बहुत आगे थे
[34:04]उनको यकीन था कि जब फर्श बचता है तो फातिमा जहरा तशरीफ
[34:09]लाते मुझे अभी भी याद है कि हमारे घर में जब खवातीन
[34:15]की मजलिस होती थी तो हम चूंकि खवातीन की मजलिस थी तो
[34:20]हम मर्द इंतजा मात सारे करके घर से बाहर चले जाया करते
[34:21]थे तो हमारी दादी मरहमा फरमाया करती थी कि नहीं फर्श नहीं
[34:25]बिछाओ फर्श आखिर में मैं खुद बिछा लू अगर एक दफ फर्श
[34:26]बिच गया तो बीब तशरीफ ले आएंगी मजलिस में अभी तो एक
[34:30]घंटे की देर है यह उनका अकीदा था कि फातिमा तशरीफ लाती
[34:37]है जब यह अकीदा था तो फिर दुनियावी दिखावा नहीं था फिर
[34:42]यह नहीं था कि कौन आया मजलिस में और कौन नहीं आया
[34:45]फिर हुसैन इब्ने अली के नाम की अहमियत थी फिर फातिमा की
[34:52]आमद की अहमियत ी मजलिस के तबर्रुक को तबर्रुक समझा जाता था
[34:55]आज आप देखिए फर्श अजा की हुरमत मजलिस की हुरमत आहिस्ता आहिस्ता
[35:00]हमारे मुश में कम होती चली जा रही पहले अशरा अव्वल के
[35:05]अंदर क्या एहतमाम हुआ करता था किस तरह से लोग अपने घरों
[35:13]में हुसैन इने अली की सगवारी का एहतमाम किया करते थे उस
[35:15]एहतमाम ने मुझे मुझे और आपको अजादारी आइंदा आने वाली नस्ले किस
[35:24]तरह से अजादारी उस एहतमाम ने मुझे और आपको अजादारी कि किस
[35:27]तरह से घर में कोई अच्छी गजा नहीं बनाई जाती थी बहुत
[35:32]मुश्किल से चाय बना ली जाती थी सुबह उठ कर के अगर
[35:36]जरूरी है तो इसके अलावा कोई खाने का एहतमाम नहीं किया जाता
[35:40]था जो नजरो नयाज में आया वही खाया जाता था आशूरा के
[35:41]दिन घर में तारी की कर दी जाती थी अंधेरा कर दिया
[35:46]जाता था लोग अपने बिस्तरों पर नहीं सोते थे जमीन पर सोया
[35:51]करते थे वह सब था कि जिसने मुझे और आपको अजादारी की
[35:55]नई शादी होती थी तो वो अपने जेवरात उतार दिया करते रंगीन
[36:00]लिबास बांध करके रख दिए जाते थे सियाह लिबास निकाल लिए जाते
[36:06]थे सियाह लिबास किस तरह से बनाए जाते थे कि रंगीन लिबास
[36:08]को रंग करके सियाह लिबास बनाया जाता था नया सियाह लिबास नहीं
[36:13]खरीदा जाता था य सारी चीजें आप सबको मालूम है लेकिन इस
[36:18]सब ने उस अजादारी की फिजा को और उस मानवीय को और
[36:19]उस रूहानियत को महफूज किया हुआ था और उसने हमारी हिफाजत की
[36:25]हुई थी हमारे दीन की हिफाजत की हुई ी आज वाक अफसोस
[36:29]होता है जब हम कराची के मुख्तलिफ राहों पर सफर करते हैं
[36:35]तो बड़े-बड़े बोर्ड्स दिखाई देते हैं के बड़े-बड़े ब्रांड्स मोहर्रम के लिए
[36:40]खुसूसी तौर पर जो है वह लिबास फरोख कर रहे हैं क्या
[36:48]फेस्टिवल है क्या है मुहर्रम क्या मैं और आप वाक सगवारी और
[36:52]गम की फिजा में है या मैं और आप खुदा नख्वा स्ता
[36:58]ड्रामा कर रहे हैं एहतियात बरतने की जरूरत है क्योंकि दुनिया तो
[37:07]किसी ना किसी तरह गुजर जाएगी लेकिन कयामत के दिन मेरा और
[37:13]आपका सबका सरोकार फातिमा जहरा सलाम उल्ला अलहा से पढ़ना है और
[37:17]उस दिन अगर हजरत ने यह सवाल कर लिया कि क्या मेरे
[37:25]बच्चे ने इसलिए अपने बच्चों को कुर्बा किया था कि तुम दिखावा
[37:27]कर सको मैं और आप उस दिन क्या जवाब देंगे अगर किसी
[37:33]के पास जवाब है तो करे लेकिन अगर जवाब नहीं है तो
[37:42]खुदारा एहतियात बरते ऐसा ना हो कि कयामत के दिन फातिमा जहरा
[37:49]नाराज हो जाए उस दिन अज कोई सहारा नहीं होगा सिवाय उस
[37:52]बीवी के बात यहां तक पहुंच गई है सिर्फ एक रिवायत आपकी
[38:00]खिदमत में पेश करता हूं मेरा इरादा नहीं था इस रिवायत को
[38:04]पेश करने का लेकिन खुद बखुदा बात यहां तक आ गई कयामत
[38:09]का दिन होगा लोगों पर बहुत सख्त हो जाएंगे हालात बहुत सख्त
[38:13]हो जाएंगे किसी की कोई शफात का एहतमाम नहीं हो रहा होगा
[38:18]हर एक बहुत मुश्किल में होगा हिसाबो किताब उस वक्त रसूल अल्लाह
[38:25]अमीर मोमिनीन से फरमाएंगे अली जाओ फातिमा को बुला कर के लाओ
[38:33]ताकि उम्मत की शफात का कोई इंतजाम हो सके अमीर मोमिनीन तशरीफ
[38:41]ले जाएंगे फातिमा जहरा तशरीफ लाएंगे साथ खदीजा कुबरा तशरीफ लाएंगे फातिमा
[38:48]बिनते असद तशरीफ लाएंगे जानते हैं कि उस रोज खतीजा कुबरा के
[38:58]हाथ में और फातिमा बिनते असद के हाथ में क्या होगा रिवायत
[39:03]ने कहा कि उस दिन एक छोटे बच्चे का लाशा होगा कि
[39:10]जो खदीजा कुबरा और फातिमा बिनते असद के हाथों पर किसका लाशा
[39:14]मोहसिन का जनाजा और उस दिन शायद खदीजा कुबरा और फातिमा बिनते
[39:20]असद खुदा की बारगाह में शिकायत करें शायद खदीजा ये कहे परवरदिगार
[39:26]क्या मैंने अपना सब कुछ तेरे रसूल के लिए नहीं लुटा दिया
[39:31]क्या मेरा हक यह बनता था कि मेरी फातिमा के शिकम में
[39:35]इस बच्चे को कत्ल कर दिया जाए शायद फातिमा बिनते असद उस
[39:41]दिन खुदा की बारगाह में सवाल करेंगी परवरदिगार क्या मैंने तेरे नबी
[39:45]की हिफाजत नहीं की थी क्या मेरा हक यह बनता था कि
[39:49]यह उम्मत इस तरह से मेरे पोते को इस दुनिया में आने
[39:52]से पहले कत्ल कर दे लेकिन सवाल यहां पर यह है कि
[39:58]जब मोहसिन का जनाजा फातिमा बिनते असद और खदीजा कुबरा के हाथों
[40:03]में होगा तो फातिमा के हाथों में क्या होगा एक और रिवायत
[40:07]ने बताया कि फातिमा के हाथों में क्या होगा कहा कि जब
[40:10]अली सवाल करेंगे फातिमा इस उम्मत की शफात के लिए आ तो
[40:15]रही हो लेकिन क्या लेकर के आ रही हो फातिमा जहरा फरमाएंगे
[40:19]इस उम्मत की शफात के लिए काफी है अल यदान मकत बतान
[40:25]दो कटे हुए हाथ मेरे अब्बास के दो कटे हुए हाथ कयामत
[40:27]के दिन फातिमा जहरा इन दो कटे हुए बाजुओं को लेकर के
[40:33]आएंगी परवरदिगार इन दो बाजुओं के सदके मेरे शियों की शफात अलाला
[40:43]बला इस इबादत को अपनी बारगाह में कबूल फरमा जो अमानत हमारे
[40:50]बुजुर्गों ने हमारे सुपुर्द किया परवरदिगार उस अमानत की हिफाजत करने की
[40:55]तौफीक अता फरमा अजादारी शोहदा को बेहतरीन अंदाज में मुनक करने की
[40:58]तौफीक अता फरमा हुसैन इब्ने अली की मोहब्बत को हुसैन इब्ने अली
[41:04]की अजादारी को फातिमा फातिमा के बच्चों की मोहब्बत को हमारी आइंदा
[41:10]आने वाली नस्लों में कायम और दायम फरमा परवरदिगार जो मोमिनीन दिलों
[41:12]में हाजत लि आए परवरदिगार यह तेरे नबी के नवासे पर रोने
[41:17]के लिए आ जाते हैं हर एक अपनी किसी ना किसी मुश्किल
[41:19]में गिरफ्तार है लेकिन जब फर्शे अजा पर आता है अपनी मुश्किल
[41:23]भूल जाती है हुसैन इब्ने अली की मुश्किल याद रहती है अपनी
[41:25]परेशानी भूल जाती है हुसैन के गम में आंसू बहाता है परवरदिगार
[41:29]तुझे वास्ता मोहम्मद और आले मोहम्मद का तमाम तर महिने अहले बैत
[41:32]की तमाम तर हवाइज को मुस्तजाब फरमा आमी परवरदिगार जो इस वक्त
[41:37]दुनिया में पैगाम हुसैनी पहुंचाने में मसरूफ है परवरदिगार उन सबकी जान
[41:41]माल इज्जत और आबरू की हिफाजत फरमा जो कोई किसी भी तरह
[41:45]से फर्श अजा की खिदमत कर रहा है दाम दिरहम सुखन कदम
[41:48]है उन सबकी जान माल इज्जत और आबरू की हिफाजत फरमा परवरदिगार
[41:51]तुझे वास्ता मोहम्मद और आले मोहम्मद का लमाए कराम मराजी मकाम मजम
[41:55]रहबरी का साया दराज फ परवरदिगार हमें हमारे बच्चों को इमाम जमाना
[42:01]के आवान अंसार में से करार दे परवरदिगार तुझे वास्ता मोहम्मद आले
[42:04]मोहम्मद का कल्ब हजरत को हमसे राजी और खुशनूर फरमा हजरत के
[42:10]जुहूर में उनकी खुशियों में जल्दी फरमा रहमत यारान बज नबी अमीन
[42:15]रीन इला मला सनबी या आमन स वसम तस्लीमा
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