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Sulah Imam Hassan Ki Noorani Haqeeqat | H.I Hadi Wilayati
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محاضرات
Record date: 24 Mar 2024 - صلح امام حسن کی نورانی حقیقت AL-Mehdi Educational Society proudly presents new Executive Refresher Course for the year 2024 under the supervision of specialist Ulema and Scholars who will deliver though provoking lectures Every Weekend. These video lectures are presented by aLmehdi educational society, Karachi for our youth. For more details visit: 📡 www.almehdies.com 🖥 www.facebook.com/aLmehdies313 🎥 www.youtube.com/aLmehdies 🎥 www.shiatv.net/user/Al_Mahdi_Edu
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Transcript
[0:16]ला हला ला कुवता इल्ला बिल्लाह अली अजम बला मताम बिस्मिल्ला रहीम
[0:34]अल हमदुलिल्ला रब्बिल आलमीन न नस्त फर नवलो न सली न सलिम
[0:52]अला हबीब नजीब ही फल फफ सही व मुब लाते बशीर रहमत
[1:00]नजर सदना नबीना मौलाना अलस में [संगीत] मोहम्मद आ म अल मास
[1:28]मुक लालाला बा फ काला तबार ताला बिला मनता रम बिस्मिल्ला रहमान
[2:02]याना आमन लना कफर फला य इला मुता मुतला बा मला मा
[2:26]जन म स मोहम्मद अ सहद परवरदिगार मुताल का शुक्र अदा करते
[2:40]हैं इस अजीम नेमत पर कि उसने हमें एक मर्तबा फिर अपने
[2:46]ही लगाए हुए दस्तरखान पर बैठने की तौफीक अता फरमाई ऐसी जियाफत
[2:51]इलाही कि जिसका मुकाय जिसका मुकाबला दुनिया की किसी मेहमा से नहीं
[3:02]किया जा सकता और इसकी वजह यह है कि दुनिया के तमाम
[3:03]तर मेजबान उसकी मखलूक है और वह खालिक है और जो दुनिया
[3:11]की हर शय का खालिक है जो इनल्लाह अला कुली कदीर है
[3:16]वोह के आसमानो जमीन जिसके लिए है वह के जो अगर चाहे
[3:22]तो एक लमहे में सब कुछ खल्क कर दे वह जो चाहे
[3:22]तो एक लमहे में सब कुछ खत्म कर दे वो पा पाकीजा
[3:27]परवरदिगार वो करीम और लतीफ पर परवरदिगार हमें अपनी मेहमान पर बुला
[3:35]रहा है मेजबान बनकर दावत दे रहा है कि है तुम में
[3:37]से जो आए और इस दस्तरखान पर बैठकर अपनी मगफिरत का सामान
[3:43]लेकर के जा सके आपके सामने जिस उनवान का इंतखाब किया गया
[3:52]है वह उनवान सुलह इमाम हसन अल सलातो वसलाम से मुतालिक है
[4:05]कुराने मजीद की सूर मुबारक अनफा की दो आयतें आयत नंबर 15
[4:11]और 16 मैंने आपके सामने तिलावत करने का शरफ हासिल किया परवरदिगार
[4:15]मुताल इरशाद फरमा रहा है याना आमन ईमान वालों वह लोग के
[4:23]जो ईमान लेकर के आ गए हो इलन कफर जब रा कु
[4:31]फार से आमना सामना हो जब तुम्हारा दुश्मन खुदा से आमना सामना
[4:37]हो जब तुम जंग के मैदान में दूब दू हो जाओ अल्लाह
[4:41]के दुश्मन के साथ लकी तुमना क फरन फलाद बार तो फिर
[4:51]पीठ ना करना फिर पुष्ट ना करना फिर भाग मत जाना यली
[5:00]और जिसने पुस्त की मैदाने जंग से और फरार तियार करने की
[5:06]कोशिश की और भागने की कोशिश की कुराने मजीद दो इतना बयान
[5:12]कर रहा है दो एक्सेप्शन बयान कर रहा है कि जिसने भी
[5:14]भागने की कोशिश की इन दो के इलावा बकिया सबको परवरदिगार क
[5:21]फ मला वो गजब इलाही में गिरफ्तार हो गया व मावा जहन्नम
[5:28]उसका ठना जहन्नम हो गया व बसल मसीर और ये कितना बुरा
[5:35]ठिकाना है लेकिन कुरान मजीद कहता है कि दो वजू हात ऐसी
[5:42]है दो सबब ऐसे हैं कि जिनकी वजह से तुम मैदान जंग
[5:49]में कुफ फार को पुष्ट कर सकते हो और इन दोनों वजू
[5:53]हात की जड़ को अगर आप जा कर के देखें उसके ऋषे
[5:57]को अगर आप जाकर के देखें देखें कि दोनों वजू हात फटती
[5:59]कहां से तो आपको यह बात समझ में आएगी कि इस्लाम यह
[6:03]कहता है अपनी जान बचाने के लिए पुष्ट नहीं कर सकते लेकिन
[6:09]अगर इस्लाम का बचाना इस बात में मकू हो के पुश की
[6:13]जाए तो जिस इस्लाम को बचाने के लिए आगे बढ़ रहे थे
[6:14]उसी इस्लाम को बचाने के लिए पुष्ट करना भी जरूरी है क्योंकि
[6:20]हद और मकसद तो लड़ाई नहीं हद और मकसद जंग नहीं है
[6:27]हद और मकसद कता नहीं है हद और मकसद दब होना नहीं
[6:33]है बल्कि हद मकसद दीन का फायदा है जब तक दीन का
[6:37]फायदा दूब दू होने में है जंग में है लड़ाई में है
[6:39]किता में है उस वक्त तक आगे बढ़ना सवाब का काम है
[6:44]और जब दीन का फायदा इसमें हो जाए कि कब पुष्ट करनी
[6:49]है कब दोबारा मैदान जंग से पीछे हटना है तो दीन के
[6:54]फायदे की खातिर जहां आगे बढ़ना इबादत था वहां पीछे हटना भी
[6:57]इबादत अच्छा अब सवा यहां पर य पेश आता है कि ये
[7:02]तो फिर परवरदिगार मुताल ने बड़ा ही एक खुला रास्ता सबके लिए
[7:07]फराम कर दिया कि जो चाहे व जब भी चाहे कहे दीन
[7:12]का फायदा था इसलिए मैं पीछे हट गया हा बहुत से भागने
[7:14]वालों को यहां पर आसानी हो जाएगी बहाने मिल जाएंगे कि हमने
[7:20]तो दीन का फायदा समझा इसलिए हम भाग निकले और बहुत से
[7:25]भागने वाले ऐसे हैं जो वैसे ही 1400 साल से किसी बहाने
[7:29]की तलाश में है तो अब कुरान मजीद इनके इस रास्ते को
[7:34]बंद करने के लिए क्या कर रहा है कुरान मजीद कह रहा
[7:35]है नहीं तुम्हारी बात नहीं मानी [संगीत] जाएगी आगे बढ़ने के मामले
[7:41]में भी और पीछे हटने के मामले में भी बल्कि रसूल की
[7:47]बात मानी जाएगी जहां रसूल दीन का फायदा देख रहा होगा और
[7:50]रसूल आगे बढ़ने का हुकम देगा वहां पीछे हटना गुनाह है और
[7:55]जहां रसूल पीछे हटने का हुकम दे रहा होगा वहां आगे बढ़ना
[7:58]गुनाह है या तुम जितना समझते रहो कि दीन का फायदा है
[8:02]तुम्हारे समझने से कुछ होने वाला नहीं है या रसूल यह समझे
[8:06]कि पीछे हटने में दीन का फायदा है तो पीछे हटना सवाब
[8:11]है या वारिस रसूल ये समझे कि पीछे हटना फायदा है तो
[8:13]पीछे हटना सवाब और फायदे का काम ये इख्तियार इसीलिए आप देखिए
[8:23]कि इस वक्त भी ये एक बहस है मराज के दरमियान फुकाहा
[8:26]के दरमियान के जिहाद इब्तिदा यानी एक दफा है जिहाद दिफाई जिहाद
[8:33]दिफाई क्या है कि किसी ने हमला कर दिया दुश्मन ने काफिर
[8:40]ने हमला कर दिया जब हमला कर दिया तो दिफाई से पूछने
[8:45]की मुश्त से पूछने की इजाजत क्योंकि अगर आप मर्जे से पूछेंगे
[8:48]मुश्त से पूछेंगे जब तक वह आपको कत्ल कर चुका होगा इसलिए
[8:53]जिहाद दिफाई में जरूरी नहीं है कि आप इस्तता करें मर्जे से
[8:58]पूछे मुस्तैद से पूछे फकी से पूछे नहीं अगर किसी ने हमला
[9:02]किया तमाम मुसलमानों पर वाजिब है कि अपना और दूसरे मुसलमानों की
[9:05]जान माल इज्जत आबरू की हिफाजत फरमा जरूरी है लाजिम है यह
[9:13]जो सवाल बारहा किया जाता है कि फलस्तीन के मजलूम की निस्बत
[9:18]हमारी क्या जिम्मेदारी बनती है तो उसका जवाब यही है कि जिसकी
[9:23]जिस तरह से हो सकता है जिम्मेदारी है कि वो फलस्तीन के
[9:31]मजलूम की करे क्यों क्योंकि जिहाद दिफाई करना भी और जिहाद दिफाई
[9:34]में मदद करना भी हर मुसलमान पर फर्ज करर दिया गया लेकिन
[9:39]एक और सवाल यहां पर य कि जिहाद इब्तिदा यानी क्या मर्जे
[9:45]हमले का हुकम दे सकता है किसी सर जमीन पर तो यहां
[9:51]पर अक्सर मरा अक्सर मराज इस बात के कायल है कि नहीं
[9:56]सिवाय चंद एक के जिसमें हजरत आयतुल्लाह शामिल और दूसरे चंद मराजी
[10:02]जो यह कहते हैं कि नहीं जिहाद इब्तिदा का हुकम भी दे
[10:06]सकता है लेकिन बकिया कहते हैं कि जिहाद इब्तिदा का हुकम नहीं
[10:09]दे सकता क्यों क्योंकि यह मख सूस है इमाम मासूम के साथ
[10:14]क्योंकि दन का फायदा जिस तरह से इमाम मासूम की निगाह देखती
[10:19]है इस तरह से एक आम मुस्तैद और फकी की निगाह नहीं
[10:22]देख सकती पस इस्लाम यह कहता हुआ नजर आता है कि आगे
[10:28]बढ़ने का हुकम भी दन की खातिर है पीछे हटने का हुकम
[10:31]भी दीन की खातिर है और फैसला कौन करेगा रसूल करेगा या
[10:37]वारिस रसूल करे तुम अपने लिए बहाना मत बनाओ भागने का कि
[10:43]मैंने दीन का फायदा देखा नहीं जब तुम भाग रहे थे तब
[10:45]रसूल क्या कर रहा था तुम्हारा काम मेयार नहीं है रसूल का
[10:50]काम मेयार है अगर रसूल लड़ रहा था और तुम भाग रहे
[10:54]थे तो तुम गुनाह पर थे और अगर रसूल सुलह कर रहा
[10:59]था या वारिस रसूल सुलह कर रहा था और तुम आगे बढ़
[11:00]कर के लड़ने की कोशिश कर रहे थे तब भी तुम गुनाह
[11:04]कर रहे थे यानी रसूल की बात चलेगी और वारिस रसूल की
[11:09]बात चलेगी इसी वजह से आप देखिए कि मुसलमानों को बहुत गिरा
[11:16]गुजरा सुलह हुदबे हुदे बिया बहुत गिरा थी मुसलमानों पर क्यों क्योंकि
[11:23]इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि मुसलमान जंग की तैयारी
[11:28]करके मदीना से निकले हो और उसके बाद जंग किए बगैर वापस
[11:32]पलट जाए और जंग से ज्यादा जो जज्बा उन्हें उभार रहा था
[11:37]वह क्या था कि हम मक्का जाएंगे दोबारा अपने शहर में जाएंगे
[11:43]दोबारा अपने घरों को देखेंगे दोबारा बैतुल्लाह की जियारत करेंगे और ऐसे
[11:47]में रसूल अल्लाह ने सुलह कर सुलह हुदबे बिया के मुकाम पर
[11:55]रसूल अल्लाह ने हुकम दिया कि अब हम यहीं से सर मुंढवा
[11:57]करके वापस मदीना चले जाएंगे और बाद में किसी वक्त जो है
[12:05]व मक्का आएंगे जियारत के लिए उमरा के लिए हज के लिए
[12:08]और फिर फत मक्का के मौके पर उमरा के लिए तशरीफ ला
[12:12]जब शराय रखने की बारी आई सुल हुद बिया में तो एक
[12:17]एक शर्त ऐसी थी कि अगर मैं और आप भी व मौजूद
[12:21]होते तो कहते या रसूल अल्लाह क्या कर रहे हैं अगर का
[12:30]कोई मुसलमान काफिरों के पास चले जाएगा तो काफिर उसको वापस नहीं
[12:36]पलटा लेकिन अगर काफिरों का कोई शख्स मदीना आ जाएगा तो मुसलमानों
[12:38]की जिम्मेदारी है उसे वापस भेजे कितनी गैर मुनस फाना जाहिरी तौर
[12:46]पर शर्त है यानी अगर वापस पलना है तो शर्त य होनी
[12:48]चाहिए कि दोनों वापस पलंगे और अगर यह हो कि नहीं पटाया
[12:52]जाना तो शर्त य होनी चाहिए कि दोनों नहीं पलटा मुसलमानों की
[12:57]जिम्मेदारी है कि वो काफिर को वापस भेजे और कुफर की जिम्मेदारी
[13:00]नहीं है कि वो मुसलमान को वापस भेजे इस तरह की शराय
[13:11]रसूल अल्लाह ने कबूल कर ली मुसलमानों की चीख निकल आई बहुत
[13:19]से असब ने वहां पर रसूलल्लाह से गला शिकवा किया रसूला क्या
[13:22]कर रहे हैं यह आप क्या कर रहे हैं लेकिन वो नहीं
[13:28]जानते थे कि जहां उनकी निगाहों की हुदूगिरो से परवरदिगार से जुड़ा
[14:03]हुआ है इसलिए कुरान मजीद ने अजीबो गरीब फार्मूला दियास यह मत
[14:13]देखो मोहम्मद क्या दे रहे है नहीं जो दे वो ले लो
[14:17]क्यों क्योंकि मुमकिन है कि तुम्हें समझ में ना आ रहा हो
[14:21]लेकिन मोहम्मद की निगाह उस मुकाम को देखती है कि जहां तुम्हारी
[14:24]निगाहों की हु दूद नहीं है रसूल और वारिस रसूल उस मकाम
[14:30]को देख रहा होता है कि जहां तुम नहीं देख पा रहे
[14:34]होते तुम जाहिरी तौर पर यह समझ रहे होते हो कि शिकस्त
[14:35]हो गई लेकिन तुम्हें नहीं पता होता कि देर पा मुद्दत में
[14:41]यही सुला फतह का परवाना बन कर के दोबारा तुम्हारी तरफ पलट
[14:43]कर के आए तुम नहीं देख पा रहे हो क्यों क्योंकि तुम
[14:48]गैब को नहीं देख सकते तुम सिर्फ शहादत को देख सकते हो
[14:52]तुम सिर्फ शहादत को देख सकते हो तुम गैब को नहीं देख
[14:56]सकते ये नबी हमारा गैब को देख सकता है इसीलिए कुरान मजीद
[15:01]ने जो सूर बकरा के आगाज में मोमिनो की निशानिया बयान की
[15:03]उसम से एक निशानी क्या है अना यह गैब पर ईमान रखते
[15:11]हैं य अपने देखे के मुकाबले में रसूल अल्लाह के अनदेखे को
[15:14]फौत देते हैं यह अपनी आंखों के मुकाबले में रसूल अल्लाह पर
[15:20]नाजिल होने वाली वही को फौत देते हैं बहुत मशहूर मारूफ कक
[15:29]है ना किसी ने आक के कहा कि ये ऊंट मेरा है
[15:31]रसूल अल्लाह के ऊंट की तरफ इशारा करके कहा कि ये ऊंट
[15:37]मेरा है रसूल अल्लाह ने कहा है कोई जो गवाही दे कि
[15:41]यह ऊंट मेरा है सब मुसलमानों ने कहा या रसूलल्लाह हमने नहीं
[15:44]देखा कि आपका है एक सहाबी खड़ा हुआ और खड़े हो करर
[15:51]के कहा या रसूल अल्लाह मैं गवाही देता हूं रसूल ने कहा
[15:55]तुमने भी नहीं देखा तुमने कैसे गवाही दी कहा या रसूल अल्लाह
[16:00]जब आपके कहने पर अनदेखे खुदा पर ईमान ला सकते हैं तो
[16:02]क्या अन देखे ऊंट की गवाही नहीं दे सकते यह ईमान रसूल
[16:10]पर यह ईमान अपने रहबर रहनुमा पर यह ईमान है जो इंसान
[16:15]को सलमान बजर मकदा बना देता बसने गरा बहुत सखत मुसलमानों लेकिन
[16:25]जब यही सुल फत मक्का का पेश खमा साबित हुई और फत
[16:32]मक्का का परवाना बन कर के दोबारा मुसलमानों के पास आई तो
[16:34]कई सालों के बाद पता चला कि रसूल अल्लाह के उस काम
[16:38]की हिकमत क्या थी जो उस वक्त मुसलमानों को समझ में आ
[16:45]यही काम बेने ही फर्जंद रसूल खुदा इमाम हसन मुज्तबा अल सलातो
[16:52]सलाम ने अंजाम दिया स अहम्मद महम्मद क्या काम अंजाम दिया इमाम
[17:01]हसन मुस्तबादा कम है और यह जो आवान अनसार मौजूद है यह
[17:15]आवान अनसार भी वह सलाहियत और काबिलियत नहीं रखते कि य आखिर
[17:18]वक्त तक दीन खुदा के लिए परचम खुदा के लिए खड़े रह
[17:21]सके इमाम सलाम इरशाद फरमाते हैं लाही मा सलम खुदा की कसम
[17:32]में तस्लीम ना करता मैं सुला ना करता इला अनी लम अनसार
[17:42]लेकिन चूंकि मेरे पास नासिर नहीं थे मददगार नहीं थे वलव ज
[17:51]तो अनसार अगर मेरे पास अंसार होते ल कात री मैं रोज
[18:00]इनके साथ जंग करता क्यों क्योंकि अल्लाह का नुमाइंदा कभी शैतान के
[18:04]नुमाइंदे के साथ हाथ नहीं मिला सकता अल्लाह का नुमाइंदा कभी शैतान
[18:11]के नुमाइंदे के साथ सुलह नहीं कर सकता लेकिन सिर्फ उन दो
[18:14]इस्तस की सूरत में कि जो कुराने मजीद बयान करता है वो
[18:19]क्या जब जंग की कुदरत को हासिल करने के लिए हो या
[18:23]अपने लश्कर से जा मिलने के लिए हो जब इमाम यह समझे
[18:27]कि अब यह जरूरत है कि हाथ मिलाए जाए सुला की जाए
[18:32]दो कदम पीछे हटा जाए ताकि दोबारा ताकत को जमा करके पूरी
[18:35]ताकत और कुवत के साथ हमलावर होके शैतानी परचम को सरग और
[18:42]इलाही परचम को सर बुलंद किया जाए तो ऐसे मौके पर इमाम
[18:47]की तस के मुताबिक पीछे हटना भी वही सवाब रखता है कि
[18:49]जो आगे बढ़कर किता करना रखता है चाहे तुम्हारी समझ में आ
[18:55]रही हो या ना आ रही क्यों इसलिए क्योंकि तुम वो नहीं
[18:58]देख जो इमाम देख रहा होता पस कुरान मजीद कहता है कि
[19:08]दो इला मुत यानी दोबारा से पीछे हटे ताकि दोबारा से पलट
[19:15]करके मजीद ताकत और कुवत के साथ हमलावर हो इमाम ने देखा
[19:19]कि नहीं अभी अनसार नहीं अनसार की जरूरत है अनसार नहीं है
[19:25]अच्छा यहां पर य बात काबिल तव काबिल गर है सुन्नते इलाही
[19:27]य है कि कभी कोई काम अंसार के बगैर नहीं होगा वरना
[19:34]अगर मोज से काम होना होता तो पहला नबी मोज से इस्लाम
[19:41]का परचम दुनिया पर लहरा देता किसी और नबी की जरूरत ना
[19:44]पड़ती मोज से नहीं होगा काम अगर कौम मुन हरि हो जाए
[19:51]अगर लोग साथ ना दे तो अमीरुल मोमिनीन जैसा इमाम भी 25
[19:56]साल अपने हक से दरगुजार करने पर मजबूर हो जाएगा बहुत सख्त
[20:03]है इमाम के लिए लेकिन क्या कर अंसार अगर ना हो मददगार
[20:11]अगर ना हो क्योंकि सुन्नत कानून इलाही ये है कि अंसार की
[20:15]मदद से ये काम अंजाम पाएगा इसीलिए कुरान मजीद हजरत ईसा की
[20:21]जबान इस बात को बयान करता है कि हजरत ईसा ने कहा
[20:22]मनसारी ला कौन है कि जो मेरी मदद करे अल्लाह के रास्ते
[20:27]में तो जवाब क्या मिला हला हम अल्लाह की मददगार यानी हमेशा
[20:34]नबी को इमाम को वली खुदा को अनसार की जरूरत होती है
[20:40]मदद गारों की जरूरत होती मददगार ना हो तो मजबूर हो जाता
[20:45]है कि ऐसे फैसले करें कि जिसको व खुद भी पसंद नहीं
[20:48]करता जिस तर इमाम की रिवायत में आपने देखा इमाम ने कहा
[20:49]कि अंसार ना होने की वजह से मैंने सुला लेकिन एक बुनियादी
[20:59]तरीन फर्क कि जो हमारी जिंदगी में और इमाम की जिंदगी में
[21:05]पाया जाता है वह क्या कि हमारी जिंदगी में अगर कोई मददगार
[21:10]ना हो तो ना उम्मीदी आ जाती है लेकिन इमाम अंसार ना
[21:15]होने की सूरत में भी कभी ना उम्मीद नहीं होता रास्ता जरूर
[21:18]बदल लेता है लेकिन अल्लाह की तरफ हिदायत का सफर जारी रखता
[21:23]है बुनियादी इसलिए आप देखिए कि क्या कुछ नहीं हुआ चारदा मासूमीन
[21:31]की तारीख में लेकिन कहीं आपको एक जुमला किसी इमाम का यह
[21:34]नहीं मिलेगा कि क्या हो गया अब क्या होगा क्यों इसलिए क्योंकि
[21:39]ना उम्मीदी वहां आती है कि जहां इंसान खुदा को भूल जाता
[21:42]है लेकिन चूके इन जबात मुकद्दसा के मतम नजर हमेशा जाते खुदा
[21:49]रहती है तो अब ये जबात मुकद्दसा वो जबात मुकद्दसा है कि
[21:52]अंसार ना होने से पीछे जरूर हट जाते हैं रास्ता जरूर बदल
[21:57]लेते हैं लेकिन कभी ना नहीं आती क्यों क्योंकि अंसार नहीं है
[22:01]लेकिन अंसार का परवरदिगार तो है मददगार नहीं है लेकिन मददगार का
[22:10]खुदा तो हमारे साथ है इसलिए किसी भी वक्त ना उम्मीदी इसलिए
[22:14]इमाम ने जब सुला की तो कोई ना उमीद की कैफियत नहीं
[22:18]थी क्या होगा इमाम को मालूम था कि मैंने तुलानी रास्ता लिया
[22:20]है लेकिन यह रास्ता भी वही पहुंचता है कि जहां सीधा रास्ता
[22:25]पहुंचता रास्ता दूसरा रास्ता तु लानी जरूर है पुर खतर जरूर है
[22:32]इस रास्ते पर अंधेरा कुछ ज्यादा है लेकिन पहुंचेगा वही कि जहां
[22:35]सीधा रास्ता क्योंकि इमाम कभी भी किसी बुन बस्त में नहीं फसता
[22:43]क्योंकि बुन बस्त में वो फसता है जिसका खुदा पर ईमान नहीं
[22:48]होता जिसका खुदा पर ईमान होता है उसकी जिंदगी में कभी बंद
[22:51]गली का तसव्वुर नहीं होता क्योंकि उसे मालूम होता है कि जो
[22:57]मूसा को नील के दरमियान से रास्ता दे सकता था वो अब
[22:59]भी मेरे लिए इस मरहले पर रास्ता निकाल सकता है उसे पता
[23:03]होता है कि जो इब्राहीम को आग से निजात दे सकता है
[23:07]वो हमें भी इस मुश्किल से इसलिए कभी ना उम्मीद नहीं होती
[23:09]इसलिए आप देखिए के औलिया इलाही की सिफात जो कुरान बयान करता
[23:16]है उसमें से एक बारिस तरीन और वाज तरीन सिफत क्या है
[23:20]ला इन पर ना खौफ होता है ना हुजन होता है क्यों
[23:24]खौफ हुजन क्यों नहीं होता इसलिए खौफ हुजन नहीं होता क्योंकि हमेशा
[23:30]मालूम है कि जो मालिक कुल है वो हमारे साथ है जब
[23:33]मालिक कुल साथ है तो फिर खौफ हुजन किस बात का जब
[23:37]इंसान को मालूम हो कि एक बहुत ही मदद करने वाला पावरफुल
[23:43]शख्सियत साथ है तो फिर खौफ हुजर नहीं होता अगर आप कहीं
[23:44]जा रहे हो मिसाल के तौर पर पुलिस की मोबाइल साथ चल
[23:47]रही हो तो दूसरों से खौफ हुजन नहीं हो सकता हो सकता
[23:51]है कि उसी मोबाइल से खौफ हुजन हो क्योंकि आजकल हालात ऐसे
[23:54]हैं लेकिन दूसरों से खौफ हुजन नहीं होता क्यों क्योंकि पता है
[23:59]कि एक ताकतवर कुवत है कि जो साथ चल रही है जब
[24:03]दुनिया की एक आदी ताकतवर कुवत साथ हो जब बच्चे के साथ
[24:07]बाप हो तो बच्चा खौफ हुजन महसूस नहीं करता क्योंकि देखता है
[24:13]कि कोई बड़ा मेरे साथ है जब बच्चे से उम्र में कुछ
[24:15]साल बड़ा बाप साथ हो तो बच्चा गम हुजन का एहसास नहीं
[24:20]करता तो वो अल्लाह कि जिसके अकबर होने की गवाही दिन में
[24:24]कई दफा देते हो जब वो साथ है तो फिर खौफ हुजन
[24:26]क्यों आ जाता है सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह क्यों आ जाता है
[24:32]या अगर खौफ हुजन आ रहा है इसका मतलब कि कहीं वहां
[24:37]मसला है वो जो अल्लाह अकबर है वो वाक अल्लाह अकबर नहीं
[24:41]लमा बयान करते हैं कि जो वाजिब करार दिया गया कि आप
[24:45]अपने हाथों को कानों तक उठाए तकबीर एहराम कहते वक्त कहते हैं
[24:51]कि शायद इसकी हिकम में से एक हिकमत य है कि परवरदिगार
[24:53]जब तेरे सामने आया हूं अपनी सारी दुनिया को अपने पीछे छोड़
[24:59]कर के आया हूं सब कुछ पीछे डाल दिया अब मैं हूं
[25:02]और तेरी जात ऐसी नमाज अगर इंसान पढ़े ऐसी नमाज अगर इंसान
[25:10]पढ़े तो फिर वह मकाम आता है कि एक शख्स दौड़ता हुआ
[25:16]आया दर सैयदा पर और दस्तक दी और कहने लगा जहरा फातिमा
[25:19]जल्दी से मस्जिद चलिए कहा क्या हो गया ऐसा महसूस होता है
[25:26]जैसे अली की रूह कब्ज होने वाली है क क्यों क्या हो
[25:30]हो गया क सजदे में है और इस तरह से तड़प रहे
[25:33]हैं जैसे अभी इंतकाल कर जाएंगे एक दफा मुस्कुरा कर के कहा
[25:36]तुमने आज अली की यह हालत देखी है फातिमा हर रात अल्लाह
[25:42]की बारगाह में अली की यह हालत देखती है कहां से आती
[25:47]है यह ताकत यह कुवत जब इंसान अकबर के सामने सर झुकाता
[25:52]है तो दुनिया की बड़ी तमाम तर चीजों को अपने पैरों तले
[25:56]रोता हुआ आगे बढ़ता है फिर उसके लिए ना दर खैबर को
[26:03]उखाड़ना मुश्किल काम होता है और ना उसके लिए हाथों में रस्सी
[26:06]बंधवा मुश्किल काम होता है क्योंकि वो दरे खैबर को भी उसी
[26:11]अकबर के लिए उखाड़ रहा होता है हाथों में रस्सी भी उसी
[26:13]अकबर के लिए बनवा रहा होता है उसके लिए मुश्किल नहीं होता
[26:19]इमाम ने जब देखा इमाम हसन ने के अंसार मौजूद नहीं है
[26:24]तो अब तुलानी रास्ते का इंतखाब किया एक ऐसा रास्ता तुलानी था
[26:29]निस्बत लेकिन उस रास्ते के नतीजे में पहुंचना वही था कि जहां
[26:35]यह जंग का रास्ता पहुंचता है इमाम ने सुला की और सुला
[26:42]में इमाम अल सलाम ने ऐसी शराय को रखा कि जिन शराय
[26:46]के जरिए से दोबारा हाकिम पलट करके आए आले मोहम्मद के पास
[26:54]और ये जो लोग यह दाना दे रहे हैं या के जहन
[27:00]में यह गुमान ईजाद हो रहा है कि अली और अली के
[27:02]बेटे हमेशा हुकूमत के लिए जंग करते रहते हैं नौजुबिल्लाह कुछ अरसा
[27:10]गैर इलाही कुतों और ताकतों की हुकूमत में जिंदगी गुजार करके देखें
[27:18]ताकि इन्हें पता चले कि रोशनी की अजमत क्या होती है रोशनी
[27:21]का उस वक्त तक पता नहीं चलता जब तक अंधेरा नहीं होता
[27:25]अंधेरा है जो रोशनी की अजमत का पता दे देता है दर्द
[27:30]है कि जो सुकून की लता फत के एहसास को बताता है
[27:35]जब तक अंधेरा नहीं देखते उस वक्त तक रोशनी का पता नहीं
[27:40]चलता कि रोशनी कितनी बड़ी अजमत इसीलिए शायद पाकिस्तान के अलावा दुनिया
[27:44]के दूसरे मुल्कों के लोगों के लिए बिजली की उतनी अहमियत ना
[27:47]हो जितनी पाकिस्तान वालों के लिए क्यों क्योंकि जाती है तो पता
[27:51]चलता है कि जब आती है तो क्या होता है जब लोग
[27:58]नूर से जब लोग नूर से मुन हरि हो जाए जब नूर
[28:00]के दुश्मन हो जाएं तो अल्लाह के तरीको में से एक तरीका
[28:04]ये है कि अल्लाह नूर को बुझा देता है कुछ अरसे के
[28:07]लिए नूर को [संगीत] मदहमपट्टी री चीखें निकल आई थी और अली
[28:31]के दरवाजे पर आ गए थे दोबारा तुम्हारी चीखें निकल आएंगी और
[28:33]दोबारा अली के बेटों के दरवाजे पर आना पड़ेगा पहले भी तुमने
[28:38]अपने तई कोशिश की थी हुकूमत बनाने की अपने तई कोशिश की
[28:42]थी इमामत के इलाही मनसब को अपनी मर्जी से किसी और के
[28:48]सुपुर्द करने की क्या हुआ 25 साल बाद आना पड़ा तुम्हें मुश्किल
[28:54]कुशा के दरवाजे पर चार पाच साल में दोबारा तुम समझ रहे
[28:56]हो कि तुम कुछ कर सकते हो करके देख लो देख लो
[29:00][संगीत] करके अगर दोबारा पलट कर के ना आना पड़े मुश्किल कुशा
[29:08]के बेटों के दरवाजे पर तो कहना और हुआ कब हुआ कर्बला
[29:15]में सद शोहदा की शहादत के बाद चीख निकल आई मुसलमानों की
[29:19]कैसे जान छुड़ाई जाए लेकिन चकि वक्त पर वली खुदा का साथ
[29:26]नहीं दिया तो अब जान छुड़ाए ना छुटे एक काफिला मदीना से
[29:37]असब का बड़े अकाबर का जोमा का सद शोहदा की शहादत के
[29:43]बाद मदीना के लोगों ने डेलिगेशन तश्न दिया और उस डेलिगेशन को
[29:46]भेजा शाम कि जाओ और यजद से पूछो यह क्या हुआ है
[29:51]क्यों रसूल अल्लाह के नवासे को इस तरह मार दिया गया बाज
[29:56]पुस के लिए एक डेलिगेशन बना कर के शाम भेजा गया व
[29:58]लिगेशन जब वापस आया तो उसको मस्जिद में बिठाया गया सब लोग
[30:02]जमा हो गए बताओ क्या देख कर के आए क्या हुआ क्या
[30:06]बातचीत हुई क्या जवाब मिला उन्होंने कहा देखो भाई हमें माफ करो
[30:09]हम ज्यादा नहीं बता सकते क्योंकि यहां पर भी हुकूमत के कारिंदे
[30:12]मौजूद है हमें अपनी जान अजीज है अपना माल अज है लेकिन
[30:16]इतना समझ लो कि जब तक हम शाम में थे रातों को
[30:21]नींद नहीं आती थी क्योंकि डर लगता था कि अभी अजाबे खुदा
[30:25]आएगा या तभी अजाब खुदा आएगा हमारा जो खलीफा है जो रसूलल्लाह
[30:31]के मेंबर पर बैठा है वो रसूल अल्लाह के मेंबर पर बैठ
[30:33]कर के गुनाह ने कबीरा अंजाम देता है कब कौम इस नहज
[30:39]तक आ पहुंचती है जब वक्त पर अल्लाह के वली का साथ
[30:43]नहीं देती सद शोहदा बत मांग रहे थे बत करो आओ मेरे
[30:52]साथ चलो जान देनी पड़ेगी लेकिन इस्लाम जिंदा हो जाएगा बच्चे देने
[30:55]पड़ेंगे लेकिन इस्लाम जिंदा हो जाएगा लेकिन यह जिगर फमा के बच्चों
[30:58]के अलावा किसम है कि इस्लाम के लिए अपने बच्चे कुर्बान कर
[31:03]सिर्फ फातिमा के बच्चों का कमाल है कि फातिमा के बच्चों ने
[31:08]तूल तारीख में अपना खून दे दिया और शायर के दो मिसरे
[31:16]वाक अजीब है ये दो मिसरे के शायर कहता है कि सबकी
[31:22]कबर हैं मजारे हैं मदीने में मगर बे वतन सिर्फ अली है
[31:28]या अली के बेटे इस्लाम के लिए कुर्बानी बेवत नहीं मांगती है
[31:31]यह बेवत नहीं हर एक के बस की बात नहीं ये या
[31:33]अली दे सकते हैं या अली के बेटे ये कुर्बानी दे सकते
[31:36]हैं वही दे सकता है कि जिसकी रगों में अली और फातिमा
[31:42]का खून हो जब इस्लाम पर वक्त आया तो वो असब जो
[31:44]बैतुल माल से पैसे ले रहे थे हजारों हजारों लाखों लाखों उनका
[31:49]हदियाना बैतुल माल से जो अपने बदरी होने पर अलग वूल करते
[31:55]थे अपने अहदी होने पर अलग वसूल करते थे मक्का के जमाने
[31:59]में इस्लाम लाने पर अलग उसूल करते थे जायदाद के मालिक बन
[32:04]गए थे कोई नहीं निकला इस्लाम की हिफाजत के लिए अगर निकला
[32:07]तो फातिमा का बच्चा अपने बच्चों को लेकर के निकला लेकिन अगर
[32:13]वली खुदा का साथ नहीं दोगे मुनासिब वक्त पर तो क्या होगा
[32:17]फिर आगे बढ़ करर के ज्यादा कुर्बानी भी देनी पड़ेगी और नतीजा
[32:23]भी हासिल वक्त पर अगर नहीं उठो वक्त पर अगर कयाम नहीं
[32:31]करोगे फिर कोई फायदा नहीं अब्दुल्ला इने उमर खलीफा दवम का बेटा
[32:38]सद शदा ने बहुत समझाया देखो तुम्हारा एक मकाम है माशे के
[32:43]अंदर तुम खलीफा दम के बेटे हो तुम आवाज उठाओ खुतबा मिना
[32:48]जो दिया एक साल पहले कर्बला से सन 59 हिजरी के जिल
[32:49]हज्जा में मिना के मैदान में क्योंकि 61 हिजरी की इब्तिदा में
[32:54]कर्बला का वाकया पेश आया मुहर्रम में 60 हिजरी का हज इमाम
[33:00]हुसैन ने नहीं किया चले गए थे हज को उमरे से तब्दील
[33:04]करके एक साल पहले का जो हज था 59 हिजरी का उसमें
[33:05]इमाम हुसैन ने मिना के मैदान में सबको जमा किया था सारे
[33:09]असब को असब के बच्चों को ताबीन को रियाने कुरान को हाफिजा
[33:15]कुरान को जमा को अकाबदो तुम्हारी इज्जत इस्लाम की वजह से है
[33:20]आज जो तुम्हें दो लोग खड़े होकर के सलाम करते हैं ये
[33:22]इस्लाम की वजह से आज जो तुम्हारे पास जायदाद हैं बागत हैं
[33:26]पैसा है ये सब इस्लाम की वजह से अब जब इस्लाम पर
[33:30]मुश्किल वक्त आया है उठो आवाज उठाओ यह खिलाफत में बनी उम
[33:35]में आगे जाते हुए देख रहा हूं मैं देख रहा हूं कि
[33:39]यजीद जैसे फास फजिर के हाथ में जा रही है मत जाने
[33:40]दो अभी कयाम करो उठो आवाज उठाओ वरना रसूल अल्लाह के मेंबर
[33:45]पर गुनाह ने कबीरा होंगे नहीं मानी किसी ने हुसैन की बात
[33:49]फिर सैद शोहदा जब मदीना से निकले नसीहत की जब मक्का से
[33:55]निकले नसीहत की बार-बार मुख्तलिफ लोगों से कहा कि देख साथ चलो
[33:58]देखो आवाज उठाओ देखो इस तहरीक में शामिल हो जाओ खत लिख
[34:04]है क्यों क्योंकि वली खुदा के साथ कयाम करोगे तो नतीजे तक
[34:08]पहुंचो नहीं कयाम किया कर्बला के वाक के बाद जब हज्जाज बिन
[34:14]यूसुफ की हुकूमत आई कहा कि जाओ अब्दुल्ला इने उमर को गिरफ्तार
[34:19]करके लेकर के आओ गिरफ्तार करके लाया गया इसने क्या किया हजाज
[34:26]ने कहा काम करो के लोगों को कत्ल करना इस मलून के
[34:30]लिए शकी कल्ब के लिए कोई बात नहीं थी इसने कहा कुछ
[34:31]लोगों को मारो और उनके सरों को जो शहर के दाखिली दरवाजे
[34:35]हैं जो रास्ते हैं उस पर लटका दो यह जो अब्दुल्ला इब्ने
[34:41]उमर आया और इसने देखा कि हर दरख्त पर सर लटका हुआ
[34:45]है दरवाजे पर सर लटका हुआ है रास्तों में सर लटके हुए
[34:47]हैं खौफ जदा हो गया डर गया दरबार में आया रात का
[34:53]वक्त था हज्जाज से कहो मैं हज्जाज की बैत करना चाहता हूं
[34:56]हज्जाज ने कहा मैं सो रहा हूं अभी बत नहीं कर सकता
[35:00]अभी बत नहीं ले सकता सुबह कहा कि नहीं मैं रात ही
[35:05]को बत करू इतना डर गया था कि वो जिसने बत लेनी
[35:08]थी वह कह रहा था कि सुबह बत लूंगा यह कह रहा
[35:12]था रात ही को बत दूंगा हजाज ने अपने बेडरूम में बुलाया
[35:14]उसे अपने कमरे में जहा आराम कर रहा था वहां बुलाया क
[35:17]क्या हो गया क्यों तुम्हें जल्दी है अब आप देखिए जब इंसान
[35:21]वली खुदा का साथ नहीं देता तो किस पस्ती में जाकर के
[35:26]गिरता है किस घाटी में जाकर के गिरता है क मैंने रसूल
[35:31]अल्ला से सुना है म माता लया माम जमानी माता मत जालिया
[35:36]जो मर गया और अपने जमाने के इमाम को नहीं पहचाना वह
[35:38]जाहिल की मौत मरा मुझे खौफ यह है कि सुबह से पहले
[35:42]मुझे मौत आ जाएगी तो मैं तेरी बत के बगैर मर जाऊंगा
[35:46]तो जाहि की मौत मर जाऊ इसलिए मैं रातो रात तेरी बत
[35:52]करना चाहता हूं हज्जाज ने कहा कि हाथ नहीं दे सकता सो
[35:56]रहा हू अपने पैरों से से चादर हटाई और कहा मेरे पैर
[36:02]पर बैत कर ले जो हुसैन के हाथों पर बैत से इंकार
[36:05]करता है उसे हज्जाज जैसे के पैरों पर बैत करनी पड़ती है
[36:12]अगर इंसान वली खुदा का मुनासिब वक्त पर साथ ना दे फिर
[36:18]इंसान उस घाटी और उस पस्ती में गिर जाता है कि फिर
[36:22]बहुत मुश्किल होता है उठना व से इमाम ने जो शराय रख
[36:28]सुला की वो क्या थी जिससे दोबारा हाकिम पलट करके इसीलिए इमाम
[36:30]ने सुला को मुतलू इसलिए क्योंकि अगर सुला कोतल रखा जाता तो
[36:45]अब ये ये इसके बाद अपने बच्चे को बनाता वो उसके बाद
[36:48]अपने बच्चे कोम ने कहा नहीं बनी उम में नहीं जाएगी हम
[36:52]सिर्फ तुम्हारे साथ सुला कर रहे हैं जब तक तुम जिंदा हो
[36:53]तब तक सुला है और तुम अपने बाद किसी को खलीफा नहीं
[36:58]बना तो यह जो बाज मुका मात पर बस मैं गुफ्तगू को
[37:04]तमाम कर रहा हूं मुझे मालूम है कि आप सब रोजे से
[37:08]हैं और थकावट का एहसास भी यकीनन होगा और आज आराम का
[37:12]दिन भी है ज्यादा मुजाहि होना नहीं चाहता य जो टीवी पर
[37:14]आजकल आप देखते हैं कि सुल इमाम हसन की निस्बत जब इमाम
[37:17]ने सुलह कर ली तो आप कौन होते हैं जंग करने वाले
[37:20]यह सवाल अक्सर टीवी पर आप देखते हैं कि माहे मुबारक के
[37:25]रमजान में भी 15 रमजान आएगी तो ये सारे सवाल शुरू हो
[37:31]जाएंगे मसला बुनियादी तौर पर यह है कि जिससे हसन ने सुला
[37:36]की थी उसी के बेटे से हुसैन ने जंग की थी अगर
[37:40]हसन की सुला की वजह से सुला कर रहे हो तो हसन
[37:44]के भाई हुसैन के जंग की वजह से लाने बरात भी करना
[37:48]पड़ेगा पिक एंड चूज नहीं है इस्लाम तुम एक चीज इंतखाब कर
[37:53]लो दूसरे को छोड़ दो नहीं ऐसा नहीं बस दो जवाब में
[37:59]दे कर के यहां पर बात को तमाम करना चाहता हूं एक
[38:03]अगर हसन के सुला करने का मतलब यह है कि जिससे हसन
[38:07]ने सुला की वह रज अल्लाह हो जाए तो रसूल अल्लाह ने
[38:13]सुल हुबला की थी आज के बाद से सारे कुफ फार को
[38:14]रज अल्ला कह कर के पुकारा कर एक बात यह हो गई
[38:22]दूसरी बात यह है कि सुला का मतलब क्या होता है सुला
[38:26]का मतलब ये होता है कि हम जंग बंदी कर रहे हैं
[38:31]और जंग बंदी हमेशा मोयना मुद्दत तक की जाती है और उसकी
[38:37]मुद्दत हसन मुस्तबादा मेंे में मोयन की थी और वो मुद्दत क्या
[38:40]थी कि जब ये मर जाएगा ये अपने बाद किसी को खलीफा
[38:45]नहीं बनाएगा जब उसने सुलह को तोड़ दिया तो कौन सी सुला
[38:50]बाकी रह गई सुला उस वक्त तक बाकी है जब तक दोनों
[38:51]तरफ सुला की शराय पर अमल करते रहे ना उसने अमीरुल मोमिनीन
[38:56]पर सब शतम बंद करवाया ना उसने वो माल कि जिसका वादा
[39:01]किया था कि बनी हाशिम को देगा दिया ना उसने अपने बाद
[39:06]किसी को खलीफा ना बनाने का वादा किया था उसको पूरा किया
[39:08]ना उसने सुला की दूसरी शर्तों पर अमल किया तो जब जिसकी
[39:13]हिमायत में तुम मैदान में आए हो जब उसने खुद सुला की
[39:16]शर्तों पर अमल नहीं किया तो तुम किस मुंह से 1400 साल
[39:19]के बाद आकर के सुला की बात करते हो सुला उसी वक्त
[39:25]खत्म हो गई थी जब सुला की शर्तों को पाबल किया और
[39:29]सुला करने का मतलब कभी ये नहीं होता कि सामने वाले को
[39:33]हक पर तस्लीम कर लिया जाए सामने वाले कोला कहना शुरू कर
[39:38]दिया सुला का मतलब य होता है कि तुम दुश्मन खुदा हो
[39:40]लेकिन हम दन खुदा के फायदे के लिए कुछ अरसे के लिए
[39:44]तुमसे जंग बंद कर रहे हैं ताकि दोबारा ताकत कुवत को समेट
[39:50]करके आए और फिर तुम्हारा इस तरह से कला कमा करे तुम
[39:53]दोबारा काम सुबह की जिंदगी में नहीं हो सका लेकिन सद शदा
[40:02]ने काम करके दिखाया अंसार 72 भी अगर मसर आ जाए तो
[40:09]वली खुदा कयाम कर लेता है लेकिन अंसार फिर अंसार हो जैसे
[40:13]अंसार हुसैन के पास थे जैसे 72 मयस्सर आ गए हुसैन ने
[40:17]परचम बुलंद किया और अगर यही 72 हसन कोसर आ जाते तो
[40:22]यकीनन हसन भी वही काम करते जो हुसैन कर और जब परचम
[40:28]बुलंद किया और आए तो अब लोगों को समझ में आया कि
[40:34]उस सुलह के नतीजे में 20 साल में हसन हुसैन ने किया
[40:38]क्या था 20 साल में काम ये किया था कि 72 ऐसे
[40:40]तैयार किए थे जो इस तरह से डट जाए बातिल के मुकाबले
[40:45]पे कि फिर हमेशा के लिए ना यजद ना यजीद का बाप
[40:51]दुनिया में बाकी रह सके सिर्फ हुसैन का परचम है जो लहराता
[40:54]हैन सुले इमाम हसन की हकीकत समझनी है तो कर्बला के आईने
[41:00]में आ कर के देखो य जो कर्बला में 72 नजर आ
[41:05]रहे हैं ये सुल हसन से लेकर कर्बला के 20 सालों के
[41:11]दरमियान तरबियत याफ्ता वो अफराद है जो वली खुदा के लिए अपना
[41:13]सब कुछ देने के लिए तयार और अगर ऐसे 72 में मसर
[41:18]आ जाए वली खुदा कयाम करता है और जब कयाम करता है
[41:25]तो फिर कला कमा करके रख देता है दुश्मन का नाम और
[41:30]ब करता फिर वली खुदा का और उसके मददगार का नाम कयामत
[41:34]तक बाकी रह जाता है और जो मुकाबले पर आता है ना
[41:39]उसका नाम लेवा कोई होता है ना उसका तस्करा करने वाला कोई
[41:42]होता है बल्कि कयामत तक वो ली [संगीत] ब यानी ये जो
[41:49]हुसैन ने यजद के चेहरे से लगाब उल्टा है इसकी रिशा जा
[41:54]कर के देखे तो सु हसन में नजर आएगा यानी अगर सु
[41:59]हस ना होती तो लोगों के सामने इन बाप बेटों का किरदार
[42:01]वाज ना होता और अगर इन बाप बेटों का किरदार वाज ना
[42:05]होता तो कर्बला का मार्का पेश ना आता यानी कर्बला में जो
[42:08]नकाब उल्टा है इसका आगाज सुमाम हसन से हुआ आप देखिए आज
[42:17]भी हर वो श जो यजद को गालिया देता है और उसके
[42:23]बाप को रज अल्ला कहता है उसके पास इस बात का जवाब
[42:27]नहीं है जब फास था तो खलीफा बनाया क्यों चा जितना बात
[42:35]को घुमाना फिराना चाहे यू करना चाहे नाहे लेकिन हर अले अकल
[42:42]अकल शर आराम से इस बात को समझ लेता कि बनाने वाला
[42:49]उसका इंतखाब सही नहीं था लेकिन क्या करे हाथ पैर बधे है
[42:57]इंतखाब को तो बुरा भला कह देता है इंतखाब करने वाले को
[43:00]कुछ नहीं कह सकता लेकिन ये मजबूरियां उस मकतब में होती है
[43:04]कि जहां पर मोहम्मद और आले मोहम्मद का दामन नहीं खुदा का
[43:12]जितना शुक्र अदा करें कम है तो खुदा ने हमें ऐसे मकतब
[43:17]का करार दिया है कि जो मकतब मेयार का मकतब है अगर
[43:20]अबू बकर का बेटा भी अली के साथ आ जाए तो हम
[43:24]उसको भी रज अल्ला कहने के लिए तैयार है अगर किसी इमाम
[43:28]मासूम का बेटा भी मुकाबले पर चले जाए तो हम उसको भी
[43:33]लाल्ला कहने के लिए तैयार है ये जिगरा सिवाय हमारे अलावा किसी
[43:35]और के पास नहीं है क्यों क्योंकि हम मेयार किताबे है हम
[43:39]स्टैंडर्ड किताब है आखरी बात और बा बाज लोग भी कहते हु
[43:51]नजर आते है चकि ये मा मु रमजान है और ये टीवी
[43:55]ने वो हशर कर दिया है हमारा सारी बातें बा करना बहुत
[43:59]जरूरी और लाजिम हो जाता है हमारा मेयार क्या है कमाले अदब
[44:07]एतराम हम ना किसी की हीन के काल है ना हम किसी
[44:11]के मुकत को गालिया देने के काल है ना किसी के मुकत
[44:16]को बुरा भला कहने के है हम ब कमाल अदब अपना मेयार
[44:21]पेश करते है हमारा मेयार है इस मेयार के मुकाबले पर हमारा
[44:32]अपना रिश्तेदार भी आ खड़ा हो जाएगा तो हम उसको नला कहेंगे
[44:35]अगर हमारे दुश्मन का बच्चा अली के साथ हो जाएगा उसको ला
[44:42]हम अपना मेयार फ चज नहीं करते हमें रला मेयार दे कर
[44:50]ग हमने ह का एकर बनाया है हम देखते अलीहा खड़े है
[44:55]अली खड़े है व कोई ना भी हो तब भी हम अली
[44:59]के पीछे जाकर खड़े होते हैं उसके मुकाबले पर खड़े होने वालो
[45:04]की दाढ़िया कितनी ही लंबी क्यों ना हो उनके चेहरों पर कितना
[45:05]ही सजदे का निशान क्यों ना हो वो कितने ही असब की
[45:09]औलाद क्यों ना हो वो कितने ही हाफिज कुरान क्यों ना हो
[45:14]वो कितने ही कारिया कुरान क्यों ना हो वो कितने ही नमाज
[45:16]शब में खड़े होने वाले क्यों ना हो हम उनको छोड़कर अकेले
[45:21]अली अबी तालिब के पीछे खड़े होने को अपना महसूस करते क्योंकि
[45:24]हम मेयार और स्टैंडर्ड के मानने वाले लोग हम मेयार के पीछे
[45:30]हम अली को मेयार समझते है अली के पीछे हमारा अपना रिश्तेदार
[45:35]भी अगर अली के मुखालिफ आ जाए तो हम उसको नहीं मानते
[45:40]और अगर हमारे दुश्मन का रिश्तेदार भी अली के हक में आ
[45:42]जाए तो हम उसका हाथ चूमने के लिए उसकी पेशानी का बोसा
[45:47]देने के लिए तयार हमारा मेयार मोहबत अली और और ये मेयार
[45:50]हमारा अपना बनाया हुआ नहीं है मेयार रसूलल्लाह का दिया हुआ हम
[45:57]1400 साल से कट गए मिट गए जिदान में डाले गए कितनी
[46:02]दफा हमारी नस्लो को खत्म करने की कोशिश की गई लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह
[46:05]हम अपने मेयार पर पाबंद थे पाय बंद है और पाय बंद
[46:12]रहेंगे परवरदिगार मुताल से दुआ करते परवरदिगार मोहब्बत अले बैत को हमारी
[46:15]आ आने वाली नस्लो में कायम
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