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Aqama e Ghadeer mai Hamaray Wazaif | H.I. Yaseen Majlisi
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24/07/29
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anders
Record date: 23 jun 2024
AL-Mehdi Educational Society proudly presents new Executive Refresher Course for the year 2024 under the supervision of specialist Ulema and Scholars who will deliver though provoking lectures Every Weekend.
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Transcript
[0:16]एक मर्तबा बुलंद आवाज में दरूद भेज मोहम्मद आल मोहम्मद की जात
[0:26]परहद मोहतरम मुनास बत इंतहा अहम मुनासिब मुनासिब इस कदर अहम है
[0:40]इस कदर अहम है के एक तरफ रसूल की रिसालत सवाल के
[0:49]जमरे में करार पा रही है किस वजह से कि अगर यह
[0:54]बबला ना हो किस चीज का लाग यह कौन सी ऐसी जिम्मेदारी
[1:04]है के जिसकी वजह से पूरी रिसालत रसूल रसूल अल्लाह की रिसालत
[1:08]मुर्द सवाल करार पा रही है यह कौन सी ऐसी नेमत है
[1:16]यह कौन सी ऐसी चीज है कि जिसकी वजह से रसूल की
[1:20]रिसालत को रसूल खुदा वंद मुताल कह रहा है कि रसूल फलम
[1:26]तमा बल रि सालता रस अगर तूने यह काम नहीं किया तूने
[1:34]अगर बला नहीं किया तो गोया तूने रिसालत की कोई जिम्मेदारी अदा
[1:43]ना की लिहाजा पूरी रिसालत को मोर सवाल करार दिया जा रहा
[1:47]है किस वजह से कि अगर यह बबला ना हो किस चीज
[1:52]का लाग है यह मला मुत की विलायत देखि मोहतरम खुदा मुता
[2:00]ने इस दिन के लिए इस कदर एहतमाम किया है इस कदर
[2:07]एहतमाम किया है कि इस विलायत के लान के बाद बिला फासला
[2:12]परवरदिगार मुताल इरशाद फरमा रहा है अल अकमल तु लकम आप लोग
[2:20]मेरे साथ रहे अकमल लकम दनक के आज के दिन तुम्हारा दीन
[2:31]कामिल हुआ तुम्हारा दन कमाल तक पहुचा आज के दिन अलकन ती
[2:36]और आज के दिन मैंने तुम्हारे लिए तमाम नेमतों को कामिल किया
[2:43]मोहतरम जब हम देखते हैं कि परवरदिगार मुताल इस दिन की मुनासिब
[2:50]से और इस जिम्मेदारी की मुनासिब से इस कदर एहतमाम कर रहा
[2:54]है तो यहां पर एक सवाल उठता है वह सवाल यह है
[3:00]के जिसके लिए रसूल इतना एहतमाम कर रहे हैं जिसके लिए परवरदिगार
[3:06]की जात खुद इतना एहतमाम कर रही है तो इस दिन के
[3:08]लिए और इस मुनासिब के लिए हमारी क्या जिम्मेदारी है हम ऐसा
[3:15]क्या काम करें कि जिसकी वजह से इस गदर के सुफ्र इश्क
[3:25]में शामिल हो सके हम ऐसी क्या जिम्मेदारी अंजाम दे ताकि हम
[3:29]इस गर के अया के अंदर अपनी जिम्मेदारी को अदा कर सके
[3:35]देखि मोहतरम गीर की निस्बत हमारी बहुत सी जिम्मेदारियां है बहुत सी
[3:38]जिम्मेदारियां है आप अगर रिवायत को उठाकर देखते हैं तो आप देखें
[3:45]इस दिन की मुनासिब से किस कदर रिवायत हैं इस दिन जो
[3:48]है व आप अपने रिश्तेदारों से मिलिए इस दिन आप खाना खिलाइए
[3:51]इस दिन आप गरीबों की मदद कीजिए इस दिन आप जो है
[3:55]वो सदका दीजिए इस दिन जो है वो यह काम कीजिए आप
[3:59]रिवायत अगर उठाकर देख तो शायद मैं समझता हूं कि अगर मैं
[4:03]सिर्फ और सिर्फ रिवायत के हवाले से गुफ्तगू करूं शायद एक अशरा
[4:06]में जो है वह गीर की अहमियत और अफजल पर और गीर
[4:10]के दिन की मुनासिब से जो है व मैं गुफ्तगू कर सकूं
[4:15]इस कदर रिवायत जो है व मौजूद है लेकिन इस पूरे तमाम
[4:17]तर रिवाय तों का जो एक थीम है जो न चोड़ है
[4:22]वह क्या है वह यह कि इस दिन को अहमियत दी जाए
[4:27]इस दिन कोहम यत दी जाए हकीर ने एक जगह लिखा भी
[4:35]था कि देखें गदी ईद गदर जिस तरह से आप नमाज पढ़ते
[4:43]हैं ना तो नमाज के बारे में कुरान करीम में जो आयत
[4:45]है वह है अकीम सलात अकीम सलात यानी नमाज को कायम करो
[4:51]यह नहीं कहा जा रहा है कि सिर्फ नमाज अदा करो नमाज
[4:56]पढ़ लो यह काफी नहीं है बल्कि नमाज को इकामा करो सुभान
[4:59]अल्लाह नमाज को इकामा करने का मतलब क्या यानी मुशे के अंदर
[5:05]नमाज को अया करो ताकि मुशे के अंदर फसा दत खत्म हो
[5:11]जाए ताकि मुशे के अंदर बुराइयां खत्म हो जाए ताकि मुशे के
[5:18]अंदर रजाइन उन रजाइन ले नमाज को अया करो इकामा करो बरपा
[5:22]करो क्यों ताकि मुशे के अंदर से रजत खत्म होकर फजा इल
[5:27]जो है वो जगा ले इसी तरह से जिस तरह से नमाज
[5:32]को अया किया जाए जिस तरह से नमाज को इकामा करना है
[5:37]जिस तरह से नमाज को बरपा करना है इसी तरह से गदर
[5:38]को सिर्फ मनाया नहीं जाए गदर को इकामा किया जाए क्योंकि गदर
[5:47]इकामा हुआ था मैदान गदी में रसूल खुदा ने गदर के लिए
[5:54]अजान दी थी उस अजान में रसूल खुदा ने क्या किया था
[5:55]जो आगे जा चुके थे उन्हें पीछे बुलाया जो पीछे रह गए
[6:01]थे उन्हें आगे बुलाया और गदर खूम के मैदान में एक जगह
[6:06]पर जमा करके उन्हें गदी की आजान दी गदर की अजान क्या
[6:09]है अजजा मोहतरम गदर में रसूल खुदा ने जो चीज इकामा किया
[6:15]वो विलायत अली बने अबी तालिब को इकामा किया विलायत अली को
[6:21]इकामा किया और इस तरह से इकामा किया इस तरह से इकामा
[6:23]किया कि फरमाया मन कु मौला फ अली मौला जिसका मैं मौला
[6:31]उस उसका अली मौला अब देखिए रसूल अल्लाह ने दरह कीक सिर्फ
[6:37]और सिर्फ लकलक जुबान से ये जुमला अदा नहीं किए रसूल अल्लाह
[6:41]ने सिर्फ आकर हमें इशारा नहीं किया बल्कि रसूल अल्लाह ने इससे
[6:47]पहले एक खुतबा दिया एक अजीम खुतबा एक गरीब खुतबा कि जिसके
[6:51]अंदर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वा वसल्लम ने एक दुरूद भेज मोहम्मद
[6:54]और आल मोहम्मद की जात पर रसूल अल्ला ने आकर इकरार लिया
[7:06]है क्या इकरार लिया रसूलल्लाह ने अलला बनसम अलला अनसम क्या मैं
[7:17]तुम्हारे नफ्स पर तुमसे ज्यादा हक रखता हूं या नहीं मैं तुम्हारे
[7:24]नफ्स पर तुमसे ज्यादा हक रखता हूं या नहीं देखि मोहतरम आप
[7:31]अक्सर रिवायत में और इसी तरह से आप जियारत के जुमले में
[7:32]जुमला में ये एक जुमला अदा करते हैं क्या के मेरी जान
[7:39]कुर्बान हो जाए आप पर किस पर इमाम पर रूही लकल फिदा
[7:45]जिस्मी लकल फिदा ब अबी वा उम्मी के मेरे मां-बाप आप पर
[7:54]कुर्बान मेरा सब कुछ आप आप पर कुर्बान ये क्यों हम ये
[7:55]जुमला क्यों अदा करते हैं कभी आपने गौर किया है क्यों हम
[8:01]यह कहते हैं कि हम अपनी जान को आप पर कुर्बान कर
[8:05]देना चाहते हैं हम अपनी नफ्स को आप पर कुर्बान कर देना
[8:07]चाहते हैं हम अपना सब कुछ आप पर कुर्बान कर देना चाहते
[8:10]हैं ये जुबान से हम इकरार करते हैं जियारत के जुमलो में
[8:17]यह अल्फाज अदा करते हैं क्यों इस वजह से के रसूल अल्लाह
[8:19]सल्लल्लाहु अलैहि वा वसल्लम और अम्मा का हक हम पर इस कदर
[8:26]ज्यादा है इस कदर ज्यादा है कि यह जान कोई कीमत नहीं
[8:28]रखती यह जिस्म कोई कीमत नहीं रखता यह माल कोई कीमत नहीं
[8:35]रखता उनकी अजमत की निस्बत इस कदर व अजीम है इस कदर
[8:41]व अजीम हो और सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि वह हम
[8:46]पर हक रखते हैं हम पर हक रखते हैं हमारे मां-बाप से
[8:48]ज्यादा हक रखते हैं कौन है इमाम इ इमाम का अब रहीम
[8:54]के इमाम एक रहीम बाप की मानंद हुआ करता है बा की
[9:01]मानंद रहीम बाप मेहरबान बाप अब यह इमाम की जो हम पर
[9:07]इतना हक रखता है इतना हक रखता है उसके बारे में रसूल
[9:10]अल्लाह हमसे करर ले रहे हैं मैदाने गदर में क्या अल क्या
[9:18]मैं तुम्हारे नसों पर तुमसे ज्यादा हक नहीं रखता सबने क्या जवाब
[9:26]दिया आपके जनों में होगा भला या रसूल अल्लाह यकीन रसूल अल्लाह
[9:30]आप हम पर हमारे नफ्स से ज्यादा हक रखते हैं जब हम
[9:36]इस बात का इकरार करते हैं कि रसूल अल्लाह हमारे नफ्स पर
[9:42]हमसे ज्यादा हक रखता है और हम इस बात को अपनी जुबान
[9:46]से भी इकरार करते हैं तो इसका मतलब जो है यह विलायत
[9:48]इंपॉर्टेंट उसकी इतनी ज्यादा है कि हमें अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा
[9:57]जिस चीज को तवज्जो देनी चाहिए सबसे ज्यादा जिसके लिए एहतमाम करना
[10:02]चाहिए सबसे ज्यादा जिसके लिए कोशिश करनी चाहिए सबसे ज्यादा जिसके लिए
[10:06]कुर्बानी देनी चाहिए यह विलायत है ये विलायत है जिसके लिए हमें
[10:14]कुर्बानियां देनी चाहिए जिसके लिए कोशिश करनी चाहिए जिसके लिए सही करनी
[10:18]चाहिए जिसके लिए एहतमाम करना चाहिए और जितना किया जाए कम है
[10:21]क्यों क्योंकि सबसे ज्यादा इंपोर्टेंट हमारे लिए यह विलायत है रसूलल्लाह की
[10:30]की विलायत मौला मुत्त की विलायत इस कदर इंपॉर्टेंट है कि हम
[10:37]इकरार कर रहे हैं और रसूल अल्लाह ने फिर जब यह लान
[10:39]किया इकरार लिया उसके बाद फिर जो है वो लोगों को लाग
[10:46]किया पहुंचाया वो इंपॉर्टेंट मैसेज वो इंपॉर्टेंट फरीजा जो रसूल अल्लाह के
[10:58]दोषे अतहर पर था क्या था मौला मुतकब्बीर अबन मोहतरम देखें जाहिरी
[11:04]तौर पर अगर हम देखें तो यह मौला अली अ सलाम की
[11:11]विलायत का ऐलान शायद बाज लोगों के लिए आदी हो लेकिन यह
[11:14]आदी नहीं है यह बहुत अहम है यह दर हकीकत हमारी जिंदगी
[11:23]के तमाम उमू इससे मुंस है तमाम उमर हमारे इस विलायत से
[11:33]मुंस है विलायत हमारी जिंदगी के हर शबे के अंदर एक हाकिम
[11:37]और एक सराय है उसकी विलायत के बगैर हमारी जिंदगी कुछ नहीं
[11:42]है कुछ नहीं है हमारी जिंदगी अब सवाल यह किया जाए कि
[11:49]जनाब मैं कैसे पहचानू मैं ऐसा क्या करूं कि जिसकी वजह से
[11:52]यह दिन मेरे लिए अहम हो जाए इस दिन के लिए मैं
[11:57]कोशिश करूं इस दिन के के लिए मैं जुस्तजू करूं इस दिन
[12:02]के लिए मैं एहतमाम करूं जिस तरह से रिवायत में बयान हुआ
[12:09]है बखुदा आप जितना आप इस दिन के लिए एहतमाम करें कम
[12:11]है जितना आप एहतमाम करें मैं तो यह समझता हूं कि गदर
[12:19]के लिए अगर 10 दिन पहले और 10 दिन बाद तक गदर
[12:22]के लिए अगर 10 दिन पहले और 10 दिन बाद तक एहतमाम
[12:27]किया जाए ये कम है इस कदर अहम है यह दिन इस
[12:31]कदर अहम है यह दिन और बयान किया आपके महजर में कि
[12:36]इस दिन को हमने इकामा करना है इकामा करना है अपने पड़ोसियों
[12:39]को अपने मोहल्ले वालों को अपने शहर वालों के अंदर इस कदर
[12:45]इस दिन का इला हो इस कदर इस दिन की इंपॉर्टेंस लोगों
[12:51]के दरमियान आया हो जाए कि लोगों के सामने वाज हो कि
[12:53]गदर क्या है और देखें मोहतरम बाज औकात हमारी जो एक मुता
[13:01]फाना जो है वो यह बयान करना पड़ता है कि बाज औकात
[13:07]हमारी ये रविश ये रहती है कि गदर के हया के सिलसिले
[13:11]में हम कोशिश करते हैं कि जो है वह दूसरों को जलाए
[13:14]नहीं यह रविश अहले बैत की रविश नहीं है यह रविश मासूमीन
[13:20]की रविश नहीं है गदर लाने के लिए नहीं है गीर बुलाने
[13:25]के लिए रसूल ने बुलाया है जो आगे जा चुके थे उनको
[13:31]पीछे बुलाया है जो पीछे रह गए थे उन्हें आगे बुलाया ताकि
[13:33]तुम गदी के हम संग हो जाओ गदी के साथ चलो गदी
[13:38]के हमराह हो जाओ गदी के रास्ते पर चलो गदर के रास्ते
[13:45]पर चलो लिहाज हमारी भी एक जिम्मेदारी यही है अगर कोई एक
[13:50]इंसान उस तक गदी के हवाले से कोई पैगाम नहीं पहुंचाए हम
[13:53]उस तक पहुंचाएं और इस कदर एहतमाम करें कि हमारे मोहल्ले में
[13:59]हमारे मुशे के अंदर लोगों के लिए वाज हो जाए भाई देखे
[14:04]ना मिसाल के तौर पर आपने आशूरा को बरपा किया आशूरा को
[14:07]इस कदर एहतमाम के साथ बरपा किया कि न और 10 मुहर्रम
[14:12]आपकी जो है वह छुट्टी का दिन होता है आपको पता है
[14:16]ना क्या आशूर का दिन पूरे पाकिस्तान में छुट्टे का दिन होता
[14:19]है क्यों क्यों क्योंकि आपने आशूरा को एहतमाम के साथ बरपा किया
[14:27]है इकामा किया है इकामा का मतलब यह कि आपने इस एहतमाम
[14:30]किया है इस दिन के लिए कि तमाम पाकिस्तान में रहने वाले
[14:35]लोगों को यह मालूम हुआ कि यह आशूरा का दिन जो है
[14:39]वह एक इंपोर्टेंट दिन है इस दिन जो है व इमाम हुसैन
[14:44]अल सलाम की शहादत हुई है और इस दिन जो है वह
[14:47]तयो जो है वह तमाम के तमाम और गैर तयो तमाम अफराद
[14:48]जो है वह सोग मनाते हैं मजलिस बपा करते हैं इमाम हुसैन
[14:54]अ सलाम पर गिरिया करते हैं अ मोहतरम देखि जिस तरह से
[14:59]आशूरा को हम ने अहमियत दी है इसी तरह से गदर को
[15:04]भी अहमियत देनी है इस कदर हम इसको अहमियत द इस तरह
[15:08]से इसको बरपा करें कि लोग हुकूमत और तमाम अफराद खुद मजबूर
[15:15]हो जाए कि भाई इस दिन छुट्टी होनी चाहिए क्योंकि इस दिन
[15:19]पाकिस्तान में शिने हैदर कर्रार और गैर शिया जो अली अल सलाम
[15:25]से मोहब्बत करते हैं वो तमाम इस दिन को इस कदर एहतमाम
[15:27]के साथ मनाते हैं इस कदर एहतमाम के साथ मनाते हैं कि
[15:31]इस दिन छुट्टी होनी चाहिए यह कौन करेगा यह फरीजा हम पर
[15:36]है आप देखें ना रिवायत में है कि तीन दिन तक कदीर
[15:42]को मनाया जाए तीन दिन तक जो है वो अपने रिश्तेदारों में
[15:45]जाया जाए लिबास पहना पहना जाए नया लिबास ईदी दी जाए देखें
[15:53]अजजा मोहतरम ईद उल्लाह अकबर कहा गया है ईद उल्लाह अकबर तमाम
[15:56]आयात में सबसे बड़ी ई सबसे बड़ी लिहाजा इस दिन के लिए
[16:04]मुझे एहतमाम करना है मुझे जो है वो इसके लिए कोशिश करनी
[16:06]है जो मुझसे हो सकता है जो मुझसे हो सकता है जो
[16:12]मुझसे हो सकता है जो मुझसे हो सकता है क्यों अब सवाल
[16:17]यह है कि मैं क्यों इस कदर गीर के लिए एहतमाम करूं
[16:19]मैं क्यों इस दिन को बरपा करूं क्यों मैं इस दिन को
[16:23]इकामा करूं देखि मोहतरम जिस तरह मैंने आपके हुजूर बयान किया के
[16:27]रसूल अल्लाह का हक हम पर बहुत ज्यादा है इमाम का हक
[16:33]हम पर बहुत ज्यादा है लिहाजा रसूल अल्लाह ने जब इस इकरार
[16:37]को हमसे लिया अलकम कि मैं तुम्हारे नफ्स पर तुमसे ज्यादा हक
[16:42]रखता हूं तो वहां पर हमने बला का जवाब दिया है यकीन
[16:48]दिहानी करवाइए और यह आजान और यह इकरार आज भी है अब
[16:54]मैं कैसे में इस इकरार का जवाब दूं इस इकरार का जवाब
[16:56]मेरे आमाल के जरिए से होगा सिर्फ लकलक जुबान से सिर्फ जबान
[17:02]से कह देना काफी नहीं है जबान से सिर्फ अशद अना अली
[17:07]वला कह देना काफी नहीं है बल्कि इस अशद अ वला को
[17:09]मैं अपने वजूद पर नाफिटी है तकाजा यह करती है कि मेरे
[17:21]अंदर एक इस्तरा की कैफियत हो मेरे अंदर तड़प मौजूद हो इस
[17:29]विलायत के तहक के लिए इस की हा किमत के लिए इस
[17:31]विलायत को मैं मुशे में नाफिया है हमने वादा दिया है यह
[17:53]वादा है यह अ लात एक वादा है एक मामला है कि
[17:58]मैं अपनी पूरी जिंदगी के अंदर इस विलायत को अपने वजूद पर
[18:01]हाकिम रखूंगा यानी मैं जो कुछ करूंगा इस विलायत के जेरे साया
[18:08]अंजाम दूंगा इस विलायत के जरे साया अंजाम दूंगा मैं अगर किसी
[18:10]की मदद करना चाहता हूं मैं अगर कोई नेकी अंजाम देना चाहता
[18:15]हूं मैं अगर कोई इबादत अंजाम देना चाहता हूं इस विलायत के
[18:18]जेरे साय में और अगर यह विलायत ना हो मेरी जिंदगी में
[18:23]आप तवज्जो करें अगर यह विलायत ना हो मेरी जिंदगी में तो
[18:28]यह मेरी इबादत मेरी रियाजत मेरे तमाम आमाल मेरे मुंह पर मार
[18:34]दी जाएंगे क्यों क्योंकि तुमने दीन का एक अहम तरीन जुज कि
[18:40]जो विलायत है उसको बुला दिया इस कदर इसकी अहमियत है लेकिन
[18:43]मसला कहां होता है मसला यह होता है कि हम इसे सिर्फ
[18:49]और सिर्फ मोहब्बत तक महदूद करते हैं मोहब्बत तक महदूद करते हैं
[18:57]क्या मौलाना साहब आप कैसी गुफ्तगू कर रहे हैं क्या मोहब्बत करना
[19:01]दुरुस्त नहीं है नहीं अन मोहतरम मैं हरगिज यह बात नहीं कर
[19:06]रहा मैं आपसे यह नहीं कर रहा कि मोहब्बत नहीं करना चाहिए
[19:09]बल्कि मुझे ऐसी मोहब्बत करनी चाहिए कि यह मोहब्बत मुझे इता के
[19:14]मरहले तक लेकर आए यह मोहब्बत सिर्फ और सिर्फ लकलक जुबान से
[19:20]ना हो बल्कि यह मोहब्बत मेरे फराइज को मेरे लिए मोयन कर
[19:26]दे मेरी जो इस असर में जिम्मेदारी है विलायत के जेरे साया
[19:32]मैं उसको अंजाम दूं यह मोहब्बत होनी चाहिए वरना मोहब्बत करने वाले
[19:35]बहुत सारे थे रसूल अल्लाह के जवार में मौजूद थे रसूल अल्लाह
[19:38]के बराबर में मौजूद थे रसूल अल्लाह के साय में थे रसूल
[19:42]अल्लाह का साया उन पर पड़ता था लेकिन क्या हुआ ऐसा क्या
[19:47]हुआ कि बाद में रसूल अल्लाह के मददे मुकाबिल आकर खड़े हो
[19:53]गए मला मुत के मददे मुकाबिल खड़े हो गए जो गदी में
[19:57]लान हुआ था वहां आकर बखन बखन कहा लेकिन क्या हुआ आखिर
[19:59]में उन्होंने रसूलल्लाह की आंख बंद होते ही उस गीर को बुला
[20:07]दिया तो बस मोहब्बत सिर्फ लकलक ही जुबान से ना हो गचे
[20:14]के इब्तिदा इसी मोहब्बत से है इब्तिदा इसी उल्फत से है मुझे
[20:22]आगाज करना है हां मुमकिन है बहुत सारे ऐसे बीमार हो हर
[20:27]दौर में होते हैं आप देखें के रसूलल्लाह के दौर में एक
[20:31]बाद नशीन अरब आकर उसने तराज किया एक दरूद भे मोहम्मद आल
[20:36]मोहम्मद की जात [प्रशंसा] पर बाद नशीन अरब ने आकर रसूलल्लाह पर
[20:51]तराज किया या रसूल अल्लाह आपने जो यह अली की विलायत का
[20:55]लान किया है यह दर हकीकत आपने अपनी रिश्तेदारी को निभाया यह
[21:00]आपने खुदा की तरफ से हुकम को जारी नहीं किया यह इलाही
[21:05]हुकम नहीं यह अपने आपने श् दारी को निभाया हर दर में
[21:10]ऐसे बीमार होते हैं जिनको एलर्जी होती है विलायत से भी एलर्जी
[21:13]होती है रसूल के हुकम से भी एलर्जी होती है तो रसूलल्लाह
[21:20]ने कहा कि ऐसा हरगिज नहीं है रसूला ने फरमाया समा परवरदिगार
[21:30]ने अली के विलायत को ना सिर्फ जमीन वालों पर बल्कि आसमान
[21:37]वालों पर भी वाजिब करार दिया है यही वजह है कि अतर
[21:43]रिवायत में है के ईद गदर जमीन वालों से ज्यादा आसमान वालों
[21:47]पर में मशहूर है कदीर को जमीन वालों से ज्यादा मलाइका मनाते
[21:53]हैं क्यों मलाइका इस दिन को दर्द करते हैं मसला यह है
[21:57]कि हम इस दिन को काश के उस तरह से जिस तरह
[22:00]से दर्क करना चाहिए और अया करना चाहिए उस तरह सेया करें
[22:04]क्या फरमा रहे रसूल समावा ल अ के परवरदिगार ने अली की
[22:10]विलायत को तमाम आसमान वालों और जमीन वालों पर वाजिब करार दिया
[22:16]फिर यहां आकर रसूल खुदा हर चीज के सैयद सरदार के बारे
[22:21]में बयान कर रहे हैं फरमाया के ल कुरान सल कुतुब के
[22:31]कुरान करीम तमाम आसमानी किताबों में जितने भी किताबें हैं उसका सैयद
[22:38]सरदार कुराने करीम है ल कुरान सदल कुतुब फरमाने लगे व शहर
[22:46]रमदान सैयद शहर माहे मुबारक रमजान तमाम महीनों का सैयद सरदार है
[22:56]तमाम महीनों में जो सबसे अहम महीना है वो माहे मुबारक रमजान
[23:00]फिर फरमाया के वल लैलतुल कद्र सयद लायाली शबे कद्र तमाम रातों
[23:11]में सबसे ज्यादा बा फजीलत तरीन रात और सबसे तमाम रातों का
[23:18]सैयद सरदार शबे कदर है रसूल खुदा हर एक चीज के सैयद
[23:24]सरदार के बारे में बयान कर रहे हैं फरमाने लगे ल जिबल
[23:29]सदल मला जिब्राईल अमीन तमाम मलाइका सैयद सरदार है वल जनान सदल
[23:38]मकान फिल जन्ना और जनान जन्नत में तमाम जन्नत के तमाम मकानों
[23:46]में जो सबसे ज्यादा फजीलत तरीन मकान है उसमें जनान सब मकानों
[23:51]का सैयद सरदार है अब रसूल हर एक चीज के सैयद सरदार
[23:57]के बारे में बयान कर रहे हैं कि जो जो है वो
[24:00]महीनों में जो है वो माहे मुबारक रमजान रातों में जो है
[24:02]वो शबे कद्र मलाइक में जिब्राईल अमीन मकानों में जनान हर एक
[24:12]चीज के सैयद सरदार के बारे में बयान कर रहे हैं फिर
[24:15]रसूल खुदा यहां पर तमाम आमाल के सैयद सरदार के बारे में
[24:21]बयान कर रहे हैं कि आमाल जो हम अंजाम देते हैं हम
[24:26]जो उमू अंजाम देते हैं हम जो कुछ अंजाम देते हैं उसका
[24:28]भी सयद सरदार है लि स हर इंसान जो नेकी अंजाम देता
[24:39]है उसका भी एक सैयद सरदार है उसका भी एक सैयद सरदार
[24:42]है फरमाने लगे के आमाल का सैयद सरदार क्या है मेरे रसूल
[24:48]बयान कर रहे हैं मेरे जुमले नहीं है फरमाने लगे के ी
[24:53]लीने अबी तालिब सदल आमाल मेरी मोहब्बत और अली की मोहब्बत तमाम
[25:01]आमाल का सैयद सरदार [प्रशंसा] नादरी या अल्लाहु सल्ले अला महम्मद वाह
[25:14]मेरी मोहब्बत और अली की मोहब्बत तमाम आमाल का सैयद सरदार हैन
[25:21]मोहतरम देखि रसूल अल्ला इस मोहब्बत के बारे में भी बयान कर
[25:23]रहे हैं और उस तात के बारे में भी बयान कर रहे
[25:28]हैं कि जो गदर में जिसका लान हुआ देखिए यह मोहब्बत का
[25:34]रास्ता आपको तात तक लेकर आए वरना तो मोहब्बत करने वाले इतने
[25:38]मोहब्बत करने लगे थे कि नज बिल्लाह नाजु बिल्लाह मौला मुत को
[25:44]उलय के मकाम पर लेकर गए फिर क्या फरमाया मौला मुत कियान
[25:48]के लालाल के मुझ पर दो तरह के लोग हलाक हुए एक
[25:55]जो मेरी मोहब्बत में हद से ज्यादा आगे बढ़ गया और एक
[25:59]कि जिसने मेरी मोहब्बत को ठुकराया जिसने मुझसे बुग किया दोनों हला
[26:04]मोहतरम हमें गीर के हम संग होना है कदीर के साथ चलना
[26:11]है और तात का मतलब क्या है तात का मतलब सिर्फ लकल
[26:18]जबान से मोहब्बत का इकरार कर देना काफी नहीं है य जो
[26:21]या अली में कह रहा हूं इस या अली को मुझे अपनी
[26:29]रूह से कहना है यह या अली मुझे नमाज में सफे अव्वल
[26:34]पर लेकर आए यह या अली मुझे मुशे के अंदर जिम्मेदार बनाए
[26:37]यह या अली मुझे ऐसा बनाए कि जब कोई मजलूम हो तो
[26:43]मैं इसी या अली के जरिए से मैं उस मजलूम की दादरसी
[26:50]करूं ये या अली यह या अली इस कदर मेरे वजूद पर
[26:58]इस या अली का मतलब यह है मैं इकरार कर रहा हूं
[27:03]और यह मैं मदद तलब कर रहा हूं वसीला बनाकर मौला मुक्तक
[27:09]को ऐसा नहीं हो सकता है कि मैं जुबान से मौला मुतकब्बीर
[27:19]इख्तियार करूं ऐसा नहीं हो सकता अने मतर लिहाजा गदर के सिलसिले
[27:27]में जो एक अहम तरीन अमर है जो हमारी जिम्मेदारी है वो
[27:35]यह है कि इस दिन को हम अया करें और जिस तरह
[27:40]से अया करने का हक है खुदा गवाए के हमारे मोहल्ले में
[27:42]हमारे जो है वो मुशे के अंदर और हमारे रोडो पर गदर
[27:49]के हवाले से इतना एहतमाम होना चाहिए इस कदर शोर होना चाहिए
[27:52]मैं तो य यूं कहूंगा इस कदर जो है वो शोरगुल होना
[27:56]चाहिए कि दुनिया वालों को पता चले कि हम गदरी है और
[28:02]इसमें किसी चीज की की बात की शर्म हमें महसूस नहीं करना
[28:05]चाहिए जो हम अदा कर सकते हैं जो कुछ कर सकते हैं
[28:09]आए सब मिलकर अपने पड़ोसियों का हाथ थामकर अपने अहले सुन्नत बरारा
[28:16]का हाथ थामकर दावत दिया जाए पैगाम दिया जाए गीर के हवाले
[28:19]से मोहब्बत का पैगाम दिया जाए उल्फत का पैगाम दिया जाए और
[28:22]खुदा गवाह है कि गदर एक नुक्ते इतहाद मरकज है अगर हम
[28:32]गदर को उस निगाह से जिस निगाह से अहले बैत अल सलाम
[28:34]हम तक पहुंचाना चाहते हैं उस निगाह से देखें ये गदर नुक्ता
[28:39]इतहाद है क्या किया रसूल अल्लाह ने सबको जमा किया गदर के
[28:41]मैदान में सबको जमा किया सबको हुज्जाज को जो आगे जा चुके
[28:47]थे उन्हें पीछे बुलाया और इस वहदत के लिए इस कलमे की
[28:51]तरफ जो है वो दावत दी मुझे नहीं मालूम कि मेरे पास
[28:53]कितना वक्त है एक दरूद भेज मोहम्मद और आल मोहम्मद की जात
[28:57]पर बस मैं अपनी गुफ्तगू को समेट अतर सला मोहम्मद वा मोहम्मद
[29:10]गचे के गीर के हवाले से हमारी यह गुफ्तगू नाकस है जिस
[29:18]कदर इस टॉपिक पर इस दिन के अया के हवाले से गुफ्तगू
[29:25]की जाए कम है लेकिन मोहतरम जो वजीफा हम अंजाम दे सकते
[29:32]हैं वो क्या है जो काम हम गदर के लिए कर सकते
[29:39]हैं वह क्या है सबसे पहली चीज इस दिन की मारफ को
[29:40]समझे कि यह दिन क्या है यह ईला अकबर क्या है जिसके
[29:46]लिए खुद परवरदिगार इतना एहतमाम कर रहा है रसूल खुदा एहतमाम कर
[29:52]रहे हैं मासूमीन इस कदर एहतमाम कर रहे हैं इस दिन की
[29:54]मारफ को समझे इस दिन को अया करें मुश के अंदर जिंदा
[29:59]करें देखें अगर गदी को बुलाया जाए तो सकी फा वजूद में
[30:10]आता है अगर गदी को भुला दिया जाए तो आप देखें के
[30:17]कर्बला जैसी अजीम मजलूम की दास्तान रोमा होती है अगर गदर को
[30:22]बुलाया जाए और देखि जिन्होंने गदी को बुलाया उन्होंने इमाम हुसैन अल
[30:27]सलाम को बुलाया और खुदा का शुक्र अदा करना चाहिए कि अल्हम्दुलिल्लाह
[30:32]परवरदिगार ने हमें यह तौफीक दी है और हमें इस बात पर
[30:38]फख्र है इस बात पर शुक्र है कि खुदा ने हमें गदरी
[30:40]बनाया खुदा ने हमारी ऐसी तरबियत की कि हम सुफ्र गीर में
[30:46]है लेकिन अजान मोहतरम इस सुफ के हमसे कुछ तकाज हैं इस
[30:50]तकाज को हम पूरा करें हम अपनी जॉब से अपनी जिंदगी के
[30:58]अंदर तमाम मैटेरियलिस्टिक हमारी जितनी भी दुनियावी मादी जिंदगी है उससे ज्यादा
[31:02]अहमियत इस दिन को दे और हमारे अंदर ये इस्तरा ईजाद हो
[31:09]प्यास ईजाद हो शिद्दत हमारे अंदर ईजाद हो देखिए ना मैं इसकी
[31:14]मिसाल ऐसे दूंगा के बाज औकात हमारी जिंदगी के अंदर हमारी कुछ
[31:20]चीजें हमारे लिए बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट होती है खुन अगर मेरे नौजवान
[31:24]जो दोस्त यहां पर बैठे हुए हैं इनसे अगर इनका मोबाइल छीन
[31:29]लिया जाए तो यह जो है वह मछली की तरह जो है
[31:35]वह तड़पना शुरू हो जाएंगे ऐसा है या नहीं है आजकल तो
[31:41]ऐसा ही है माशाल्लाह फबुक भी चल रहा है य भी चल
[31:43]रहा है तो ला माशा अल्लाह यह हमारी मस्टिक लाइफ का हिस्सा
[31:51]है हमें इस तरफ लेकर जाया जा रहा है बाकायदा एक मंसूबे
[31:53]के तहत एक प्रोग्राम के तहत हमें अपने आप इस मंसूबे से
[32:02]बाहर निकालना है हम अपने आप को हवाले नहीं करें जमाने के
[32:07]हमारी सरि कुछ और है हम कुछ और है हम गदरी है
[32:14]हमें इस माहौल के अंदर रहते हुए अपने आप को इस माहौल
[32:21]से बाहर निकालना है और अपने आप को गदरी बनाना है इस
[32:27]माहौल के अंदर रहते हुए अपने आप को हवाले नहीं सोशल मीडिया
[32:29]के हां सोशल मीडिया को इस्तेमाल करूं मैं किसके लिए गदर की
[32:35]तबलीग के लिए किस कदर खूबसूरत होगा कि अगर मैं सोशल मीडिया
[32:38]को गदर के तबलीग के लिए इस्तेमाल करू मैं मना नहीं कर
[32:42]रहा हूं मैं मुखालिफ नहीं हूं भाई मोबाइल का बात में नहीं
[32:45]कहते मौलाना साहब ने जो है वो मोबाइल की मुखालफत की नहीं
[32:48]करें आप इस्तेमाल लेकिन दन के हया के लिए मोबाइल से गुमराह
[32:56]ना हो जो काम दुश्मन करना चाहता है उस के बखिल आप
[32:59]करें जो काम शैतान आपसे करवाना चाहता है उसके बिल्कुल बखिल काम
[33:04]करें लिहाजा मैंने कहा कि इस्तरा की कैफियत हमारे अंदर इजाद होनी
[33:07]चाहिए इस्तरा का मतलब क्या है देखि आपसे अगर मैं मोबाइल छीन
[33:09]लू तो आप रह नहीं सकेंगे आपके अंदर तड़प ईजाद हो गई
[33:15]कि जनाब मुझे मोबाइल चाहिए हर दो मिनट बाद मोबाइल मोबाइल मोबाइल
[33:18]बस यह देख रहे हैं ना आप अपने अंदर इस इस्तरा को
[33:22]महसूस कर रहे नौजवान बस गदर की निस्बत हमारे अंदर यह इस्तरा
[33:29]होनी चाहिए इससे बढ़कर इस्तरा होनी चाहिए इससे बढ़कर इस्तरा होनी चाहिए
[33:33]देखि ना मोबाइल इस्तेमाल करने के बाद आप एक लिज्जत महसूस करते
[33:36]हैं मजा आता है मोबाइल इस्तेमाल करने लिए टाइम पास होता है
[33:42]लेकिन खुदा की कसम अगर कोई गदी को समझ ले और गदी
[33:46]के इश्क में मुब्तला हो जाए वह ऐसा मजा पाता है ऐसा
[33:48]मजा पाता है कि उसका इश्क फिर सलमानी इश्क बन जाता है
[33:53]फिर अबू जरी इश्क बन जाता है गदर को अगर इस एंगल
[33:56]से देखें सलमान की दीद से देखें अबूजर की दीद से देखें
[34:02]लिहाजा परवरदिगार से दुआ करता हूं कि परवरदिगार हमारे अंदर इस तरार
[34:06]की कैफियत इस तपिश की कैफियत को ईजाद करें और इस दिन
[34:11]को हया करने की हमें तौफीक इनायत करे एक दुरूद भेजे मोहम्मद
[34:17]ल मोहम्मद की जत पर
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