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Shia Proof from Saheeh Bukhari | Imam Ali is the first Imam | Haqiqat e Ghadeer | Youth Vibe
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#Ghadeer #HaqiqateGhadeer #Media_Sabeel #YouthVibe #sahihbukhari #maulaali #abubakar
Shia Proof from Saheeh Bukhari | Imam Ali is the first Imam | Haqiqat e Ghadeer | Youth Vibe
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Transcript
[0:03]रसूल के जानशीन का जिक्र कुरान मजीद में क्यों नहीं आया यानी
[0:08]मुसलमान अली से नफरत करते थे बहुत सारे नजरिया अहले सुन्नत के
[0:10]हैं इसमें बहुत सारे नजरिया जो है वो अहले तश्य के हैं
[0:14]देखि सबसे पहली बात तो यह कि बुखारी ने बहुत सी चीजों
[0:18]को नकल नहीं किया है या तो बुखारी ने सीरे से नकली
[0:21]नहीं किया है या तो फिर बाद में उसे हफ कर दिया
[0:22]गया उसे डिलीट कर दिया गया हर हाजिर की जिम्मेदारी है कि
[0:25]वह गायब तक पहुंचाए हर बाप की जिम्मेदारी है कि वह अपने
[0:30]बेटे तक पहुंचाए मौलाना साहब सलाम वालेकुम वालेकुम अलाम मौलाना साहब ईद
[0:36]गदर का दिन नजदीक है और जैसे-जैसे यह दिन नजदीक आता जाता
[0:40]है वैसे-वैसे हमारे जहन में सोशल मीडिया के ऊपर भी यह सवालात
[0:43]और शुभत आने लगते हैं बहुत सारे नजरिया अहले सुन्नत के हैं
[0:45]इसमें बहुत सारे नजरिया जो है वह अहले तश्य के हैं आज
[0:50]हम इन्हीं सारे शुभत और इन्हीं सारे सवालात के ऊपर बहस करेंगे
[0:55]बात करेंगे आपसे और जानने की कोशिश करेंगे इन सारे सवालात के
[0:58]जवाबाइकिरण पेचीदा हो तो क्या आप आमादा हैं इंशाल्लाह इसके हवाले से
[1:03]जी बिलकुल मौलाना साहब पहले आप मुख्तसर सा अपना तारुफ करा दें
[1:06]हमारे नाजरीन के लिए और पहले सवाल को मतरा करते हैं अजु
[1:10]बिल्लाह मिन शैतान रजी बिस्मिल्लाह रहमान रहीम मेरा नाम सैयद मोहम्मद जाफर
[1:13]जैदी है हिंदुस्तान से मेरा ताल्लुक है हौज इल्म कम में मैंने
[1:16]तालीम हासिल की है और अल मुस्तफा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से मैंने सीरत
[1:19]पैगंबर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वालि वसल्लम के हवाले से पीएचडी अपनी मुकम्मल
[1:23]की है आइए चलते हैं अब अपने पहले सवाल की जानिब मैं
[1:26]जिस जिस का मौला हूं अली उस उसके मौला है तो ये
[1:30]जो लफ्ज़ मौला है इसके माना क्या है अहले सुन्नत जैसा इसमें
[1:35]कहते हैं कि मौला के माना दोस्त के हैं पड़ोसी के हैं
[1:36]गुलाम के हैं और वो ज्यादातर जो है अपनी अहा दीस में
[1:41]अपनी अदीस की किताबों में और अपने मकाला में और जो बयान
[1:46]करते हैं वो यही कहते हैं कि मौला का माना जो है
[1:47]वो दोस्त के हैं आप इस सिलसिले में क्या कहते हैं आपकी
[1:51]क्या नजरिया है आप क्या इसमें बयान देते हैं जी अब क्या
[1:57]बोले आपसे अगर आप खुद आया बल्ले के लबो लहजे को देखें
[1:58]तो आपको समझ में आएगा जब ये हुक्म नाजिल हुआ आय बल्ली
[2:02]नाजिल हुई किस तरह से लबो लहजा पैग खुदा ने इख्तियार किया
[2:05]पैगंबर के हवाले से कि अगर आपने यह पैगाम नहीं पहुंचाया जो
[2:09]गदर खूम में पहुंचाना है तो गोया कि आपने रिसालत का कोई
[2:13]काम अंजाम नहीं दिया अगर हम मान ले कि ये पैगाम दोस्ती
[2:14]का पैगाम है और वो ऐलान दोस्ती है तो यानी एक दोस्ती
[2:18]के पैगाम को ना पहुंचाने पे पैगंबर की तमाम वो 23 साला
[2:20]जहमत जो कात हो जाती है क्या ये समझ में आता है
[2:23]जहन में इसके बाद अगर आप और आगे बढ़े तो खुदा का
[2:26]इरशाद है पैगंबर को खिताब करके कहता है कि खुदा तुम्हें जो
[2:29]है वो दुश्मनों के शर से महफूज रखेगा तो अगर ये सिर्फ
[2:30]दोस्ती का पैगाम होता तो फिर कौन सा खतरा जो है वो
[2:35]पैगंबर को या इस्लाम को लाहिर हो रहा था यकीनन ये पैगाम
[2:38]एक अहम पैगाम है वो पैगाम क्या था जानशीन का पैगाम विलायत
[2:41]का पैगाम कि अब पैगंबर के बाद इस इस्लामी मुशे का हाकिम
[2:46]कौन होगा इसके अलावा भी अगर आप देखें तो जब पैगंबर ने
[2:48]मन कुंतो मौला का इरशाद फरमाया क्या फरमाया अलला बकम क्या तुम्हारे
[2:53]नफ्स पे तुमसे ज्यादा इख्तियार मैं नहीं रखता हूं कालू बला सब
[2:56]ने कहा क्यों नहीं खुदा और उसका रसूल हम पे इख्तियार रखता
[3:00]है ज्यादा हमसे ज्यादा है उसके बाद पैगंबर ने जुमला फरमाया मन
[3:02]कुंतो मौला हो फजल मौला यानी क्या यानी जिस तरह से मैं
[3:07]तुम्हारे नफ्स पर तुमसे ज्यादा इख्तियार रखता था उसी तरह से अब
[3:09]से अली भी तुम पर तुम्हारे नफ्स से ज्यादा इख्तियार रखते हैं
[3:14]यानी वई हाकिम के माना में है तीसरी बात ये कि आप
[3:17]देखें गदी खूम में जब पैगंबर ने हाजियों के उस कारवाह को
[3:19]रोका था तो चिलचिलाती दोपहर थी आफताब की तमाज थी गर्मी इतनी
[3:24]शदीद हो रही थी असब ने जो है रिदा के एक सिरो
[3:27]को पैरों के नीचे डाल रखा था और एक सिरा सर के
[3:30]ऊपर रखे हुए थे ताकि आफताब की तमाज से कुछ हद तक
[3:31]बचा जा सके उसके बाद पैगंबर तीन दिन तक वो कारवा को
[3:33]वहां रोकते हैं कहते हैं कि सबको कहते हैं कि जाके अली
[3:37]को मुबारकबाद दो तो सिर्फ एक दोस्ती के लिए पैगंबर इतना एहतमाम
[3:39]कर रहे हैं अकल में बात नहीं आती है चौथी बात जो
[3:42]है कि जब ये ऐलान विलायत हो जाता है तो खलीफा दवम
[3:45]जो है इमाम अली अल सलाम के पास आते हैं और क्या
[3:48]किस तरीके से मुबारकबाद देते हैं वो इबारत क्या है बन बख
[3:50]लय बना अबी तालिब मुबारक हो मुबारक हो आपको अबू तालिब के
[3:55]बेटे क्या उसके बाद क्या कह असता मौलाया व मौला कु मुस्लिम
[3:59]व मुस्लिमा यह बात कही है खलीफा दुम जी जी बिल्कुल अहमद
[4:01]बिन हंबल की किताब मुसन में उठा के देख ले वहां पे
[4:04]बात मौजूद है अच्छा मैं यहां पे एक पॉइंट की तरफ इशारा
[4:07]करना चाहूंगा कि अस् पहता के लफ्ज प मैं थोड़ी तवज्जो दिलाना
[4:09]चाहता हूं कि असबा यानी हो गया या बन गया ठीक है
[4:13]और जब भी असबा होता यानी पहले चीज नहीं थी और अब
[4:16]हो गई है या अब वो बन गई है मिसाल के तौर
[4:19]पर कुरान मजीद ने वर्ड को यूज किया है जब काबील ने
[4:20]जनाबे हाबी को कत्ल किया तो वहां पर क्या लफ्ज परवरदिगार ने
[4:25]इस्तेमाल किया फत यानी काबील ने जनाबे हाबी को कत्ल किया तो
[4:28]वो घाटा उठाने वालों में में से बन गया काबिल घाटा उठाने
[4:31]वालों में से नहीं था कत्ल के बाद वो अब घाटा उठाने
[4:35]वालों में से बन गया है आप आए इते साम ले लीजिए
[4:36]वाबला जमिया उसके बाद परवरदिगार क्या कहता है कि याद करो उस
[4:42]दिन को के जब तुम आपस में दुश्मन थेस तुम ब नेमत
[4:47]ही खवाना यानी पहले तुम दुश्मन थे और अब भाई भाई बन
[4:51]गए तो अब मैं यहां पर कहूंगा अगर हम मौला के माना
[4:51]दोस्ती कर ले दोस्त ले ले पड़ोसी ले ले अब ये बनना
[4:55]तो फिर माना नहीं रखता है ना इस वाक गदर से पहले
[4:59]मौला अली अमारे यासीर के दोस्त नहीं थे अबूजर के दोस्त नहीं
[5:01]थे सलमान के दोस्त नहीं थे ओवैसे करनी के दोस्त नहीं थे
[5:05]हुजर इब्ने अदी के दोस्त नहीं थे ना जाने कितने ऐसे सहाबा
[5:08]थे जिनके मौला अली दोस्त थे तो फिर ये बनना मेयार नहीं
[5:10]रखता है एक और बात आखरी बात ये कहूंगा कि ठीक है
[5:13]लुगत में मौला के लिए कई माना वज किए गए हैं जैसा
[5:17]कि आपने शुरू में ही कहा था लेकिन जब भी मौला का
[5:21]लफ्ज बगैर किसी करीने और सियाक के यूज होता है तो उसके
[5:23]माना हाकिम मौला के ही समझा जाता है और यही माना जो
[5:27]है वो समझा था उस वक्त भी सहाबा ने और इन तमाम
[5:30]बातों के अगर अभी भी आप मेरे दलाल से सेटिस्फाइड नहीं है
[5:33]तो मैं इंशाल्लाह एक क्लिप आपको ढूंढ के दूंगा तो आप अपने
[5:36]इस प्रोग्राम में लगाइए जर के बारे में अल्लाह के नबी ने
[5:40]फरमाया मन कुतो मौलाली मौला जिसका मैं मौला हूं अली उसका मौला
[5:52]है और य मौला से मुराद दोस्त नहीं है यह हम दोस्त
[5:55]का तर्जुमा करते हैं आका सरदार सदार अली उसके सरदार मलाना साहब
[6:03]एक सवाल यहां पर पैदा होता है इब्ने तैमिया ने एक बड़ा
[6:06]शुब इजाद किया है यहां पर वह कहते हैं कि अगर यह
[6:10]हदीस इतनी ही मोत और यह वाकया इतना ही अहम है तो
[6:16]फिर अहले सुन्नत के बड़े उलमा ने जैसे कि साहिबे बुखारी और
[6:18]साहिबे मुस्लिम ने इसको क्यों अपनी किताबों में अपनी किताबों में और
[6:21]अपने तस्नीफ में उन्होंने जिक्र नहीं किया देखें सबसे पहली बात तो
[6:29]यह कि बुखारी ने बहुत सी चीजों को नकल नहीं किया है
[6:33]और यह खुद उनका भी तरा है बुखारी जिस जमाने में थे
[6:35]बनी अब्बास की खिलाफत का जमाना था तो उन्होंने बहुत एहतियात से
[6:39]काम लिया कि ऐसी कोई बातें जिक्र ना करें अपनी किताब में
[6:41]कि जिससे खुलफा के माथे पर बल पड़ जाए या उन्हें नाराहट
[6:45]उन्हें नाराजगी का सबब बन जाए तो ऐसी दलीलों से ऐसी बातों
[6:49]से परहेज करते थे इसके अलावा अगर हम मान लेते हैं कि
[6:50]बुखारी ने ये दलील नहीं नकल नहीं की ये हदीस नकल नहीं
[6:53]की तो बुखारी में तो महद वियत के भी हवाले से कोई
[6:57]दलील कोई हदीस मौजूद नहीं है या तो बुखारी ने सीरे से
[6:58]नकली नहीं किया है या तो फिर बाद में उसे हस्फुल कर
[7:02]दिया गया जबकि मेदवित के बारे में 26 से ज्यादा सहाबा ने
[7:07]हदीस नकल की है जिन्हें सही माना है तो हम ये नहीं
[7:08]कह सकते कि जो चीज बुखारी में नहीं है वो गोया कि
[7:10]सही नहीं है अच्छा दूसरी दूसरा जवाब ये है कि अगर बुखारी
[7:14]में ये चीज मौजूद नहीं है लेकिन अहले सुन्नत की दूसरी किताबों
[7:16]में तो मौजूद है जैसे मुस्लिम अपनी सही में इस हदीस को
[7:19]नकल करते हैं और इस वाक गदी में वो हदीस सकलैन बयान
[7:23]करते हैं इसी तरह से निसा ने अपनी किताब सुनन कुबरा में
[7:24]इस हदीस को नकल किया है इसके अलावा वो एक किताब भी
[7:27]लिखते हैं खसा अली के नाम से वहां पे भी इस हदीस
[7:30]को नकल कर करते हैं इब्ने माजा अपनी सुनन में बरा बिन
[7:31]आजब से इस हदीस को नकल करते हैं अहमद बिन हंबल ने
[7:35]जैसे कि मैंने पहले भी बताया था अपनी मुसन में जो है
[7:38]इस हदीस को नकल करते हैं तिर्म जीी अपनी सुनन में इस
[7:41]हदीस को नकल करते हैं इसके अलावा न एक तवील फेहरिस्त थे
[7:43]उलमा अहले सुन्नत की कि जिन्होंने हदीस गदी को नकल किया है
[7:50]चलिए ठीक है कि सही बुखारी और सही मुस्लिम में यह वाकया
[7:52]जिक्र नहीं हुआ इसका आपने जवाब दिया लेकिन कुरान मजीद में तो
[7:56]हर चीज का जिक्र मौजूद है कुरान में रसूल का भी जिक्र
[7:58]मौजूद है तो रस ल के जानशीन का जिक्र कुरान मजीद में
[8:04]क्यों नहीं आया आपके इस सवाल का जवाब जो है अबू बसीर
[8:06]की जबानी देना चाहता हूं अबू बसीर ने दकन यही सवाल जो
[8:11]है इमाम जाफर सादिक अलैहि सलाम से पूछा था कि मौला यह
[8:15]बताइए कि लोग कहते हैं कि अगर इमाम अली बरहक जानशीन है
[8:16]तो उनका जिक्र उनका नाम कुरान मजीद में क्यों नहीं जिक्र हुआ
[8:20]तो इमाम जाफर सादिक अलैहि सलाम फरमाते हैं नमाज का जिक्र तो
[8:22]कुरान में है लेकिन क्या उसकी रकात का जिक्र भी कुरान में
[8:26]है कुरान एक ऐसी किताब है कि जो सिर्फ उसूल बयान करती
[8:30]है लेकिन उसकी फ शुरुआत उसकी जुजिया उसके मसाद बयान करने का
[8:33]काम पैगंबर का है कि पैगंबर किसी भी चीज की जुजिया को
[8:37]बयान करेंगे उसके मसादी को बयान करेंगे दूसरा जवाब मेरा ये है
[8:39]कि ठीक है अगर कुरान में हजरत अली अलैहि सलाम का नाम
[8:43]आ जाता तो क्या इसकी गारंटी तो क्या गारंटी मौजूद थी कि
[8:48]वो नाम जो है बाज वो अफराद कि जो मुनाफिक थे कि
[8:49]जो इस्लाम के दुश्मन थे जिन्होंने बजहर इस्लाम कबूल किया हुआ था
[8:54]वो इमाम अली अलैहि सलाम का नाम कुरान से हस्प ना करते
[8:55]कुरान में तहरीक ना करते क्योंकि उन्हें इमाम अली अलैहि सलाम से
[8:59]बद्रो खैबर हुन इन का कीना मौजूद था बुज थे इमाम हुसैन
[9:03]अल सलाम ने जब कर्बला के मैदान में पूछा था कि मुझे
[9:04]क्यों कत्ल कर रहे हो तो उन्होंने क्या जवाब दिया था सिपाहे
[9:07]उमर साद ने मुसलमानों ने क्या जवाब दिया था सिपाह उरे साथ
[9:09]में बुजन लेबक यानी आपके बाबा का बगज था हम यानी मुसलमान
[9:13]अली से नफरत करते थे बिल्कुल तारीख में है हम दुआए नुदबा
[9:18]में पढ़ते हैं कि आप जो है वो बद्र खैबर और हुनैन
[9:19]का बुज रखते थे अली से बाज मुसलमान कुरान को तहरीर से
[9:23]बचाने के लिए भी हो सकता है कि परवरदिगार ने इमाम अली
[9:27]अलैहि सलाम का नाम नहीं रखा है और तीसरी सबसे बड़ी बात
[9:28]अगर नाम बयान भी कर देते तो क्या गारंटी थी कि मुसलमान
[9:32]उसकी मुखालिफत नहीं करते क्या कुरान में ये जिक्र नहीं हुआ है
[9:34]कि सुलेमान अपने बाप जो है दाऊद की मीराज पाएंगे क्या कुरान
[9:38]में जनाबे जकरिया की वो दुआ जिक्र नहीं हुई कि जिसमें जनाबे
[9:40]जकरिया फरमाते हैं कि परवरदिगार मुझे एक औलाद अता कर कि जो
[9:45]मेरा वारिस बने और आले याकूब का वारिस बने लेकिन क्या इसके
[9:48]बावजूद भी अबू बकर ने जनाबे सिद्दीका को उनके बाप की मीरास
[9:53]दी न से सरी मौजूद सरी हुक्म मौजूद है लेकिन मुखालिफत हुई
[9:58]दूसरी मिसाल आपको देता हूं मैं आए जकात जब कुरान में नाजिल
[9:59]हुई तो वो आठ कैटेगरी कि जहां पे जकात खर्च होनी है
[10:04]परवरदिगार ने मुश किए है वो आठ कैटेगरी को उनमें से एक
[10:05]कैटेगरी जिसके जानिब कुरान ने शरा किया मफते कुलूब यानी वो अफराद
[10:10]कि जिनके दिलों को इस्लाम की तरफ खींचना है तो उनके लिए
[10:12]भी जकात यूज की जा सकती है जकात में से कुछ पैसा
[10:15]देख के ताकि उनके दिल इस्लाम की तरफ नरम पड़ सके और
[10:19]पैगंबर की सीरत यही रही और पैगंबर ने आखिरी दम तक अपने
[10:24]आख रेहलत के आखिरी वक्त तक भी इसी चीज को जारी रखा
[10:26]लेकिन जब पैगंबर के बाद खलीफा अव्वल जो है मसनद खिलाफत में
[10:30]बैठ कते हैं और कुछ वाइट कॉलर अफराद आते हैं पैग खलीफा
[10:32]अव्वल के पास और कहते हैं कि हमें पैगंबर के जमाने में
[10:36]इस तरह से जकात मिलती थी खलीफा अव्वल ने कहा बिल्कुल आप
[10:39]सही कह रहे हैं मैं लिख के देता हूं उन्होंने लिखा कि
[10:40]हां इनको भी जकात मिलनी चाहिए मल्ल फते कुलूब के हवाले से
[10:44]ये लेके सनद जाते हैं उमर के पास के इसको साइन कर
[10:48]दें उमर जैसे ही वो दस्तावेज देखते हैं खलीफा अव्वल को तो
[10:49]उसको फाड़ देते हैं और कहते हैं कि नहीं अब खुदा ने
[10:52]जो है इस्लाम को इज्जत और शरफ अता किया अब हमें तुम्हारी
[10:56]जरूरत नहीं है और हम इस मलफ कुलूब को हटा देंगे ये
[10:57]नसे शरीक के मुखालिफत में हुई और यह लोग फिर खलीफा अव्वल
[11:01]के पास आते हैं और कहते हैं कि यह बताओ खलीफा कौन
[11:05]है तुम हो कि उमर है खलीफा अव्वल कहते हैं कि खुदा
[11:10]ने चाहा है कि उमर हो इस तरह से खलीफ अव्वल ने
[11:11]खलीफ सानी के काम की ताई की और कुरान की मुखालिफत की
[11:14]आखरी जवाब सही है कि कुरान मजीद में इमाम अली अल सलाम
[11:17]का नाम नहीं आया लेकिन परवरदिगार ने बहुत से मकामा पर ऐसी
[11:19]आयत इस्तेमाल की है जिसके जानिब पूरी उम्मते मुस्लिमा का इत्तेफाक है
[11:24]कि यह आयत इमाम अली अल सलाम की शान में नाजिल हुई
[11:30]है जैसे आए विलायत इमा वला रस तमाम उलमा इस्लाम का इस
[11:35]बात पर इत्तेफाक है कि हालत रुकू में किसने जकात दी है
[11:37]इमाम अली अल सलाम आम अला रस नक बेशक तुम्हारा वली खुदा
[11:47]है उसका रसूल है और वह है कि जो लीम है और
[11:48]सबने इस बात पर इत्तेफाक किया लीम से मुराद यहां पर इमाम
[11:52]अली अल सलाम है आ मुबा जिसम अन फसना अक में सबने
[11:56]इस बात पर इत्तेफाक अन फसना की जगह पर पैगंबर किसको लेकर
[11:58]गए थे इमाम अल सलाम को आए शब हिजरत व मनास मय
[12:02]शरी यानी कुछ लोग लोगों में कुछ लोग ऐसे होते हैं कि
[12:06]जो अल्लाह की राह के लिए अपना नफ्स बेश देते हैं ये
[12:09]कौन लोग हैं और परवरदिगार उनकी मर्जी को खरीद लेता है सबका
[12:11]इत्तेफाक है कि शबे हिजरत ये आयत इमाम अली अलैहि सलाम के
[12:14]लिए नाजिल हुई है सब बातों की एक बात यह है कि
[12:18]अगर कोई समझना चाहता है आकिल है तो उसके लिए इशारा काफी
[12:20]है और कुरान में ऐसे इशारे भरे पड़े हैं लेकिन अगर कोई
[12:24]नहीं समझना चाहता है तो किसी शायर ने बहुत लतीफ बात कही
[12:29]थी कि नादान को पलटोला दन रहेगा या नादान नून अलिफ दाल
[12:31]अलिफ नून अगर इसको आप पलट के भी लिखें तो भी नादानी
[12:34]बनेगा इतना भी समझा दे पलट दे उलट दे लेकिन वो हमेशा
[12:38]नादान ही रहेगा एक इंपॉर्टेंट सवाल आपसे आखिर में ये करूंगा कि
[12:41]चले ये ठीक है कुरानी बातें हो गई और अकली दलील भी
[12:45]आपने दे दी ये सारी चीजें ठीक है लेकिन इतना पुराना वाकया
[12:50]यह हो चुका है 1400 साल इस वाकए को गुजर चुके हैं
[12:52]आम जिंदगी में इस वाक का क्या ताल्लुक है हमसे क्या रबत
[12:56]है इस वाक का देखें गदी एक निजाम इलाही यह वो निजाम
[13:01]था कि जो परवरदिगार ने अपने बंदों की मस्लत के लिए उनकी
[13:05]बेहतरी के लिए उन्हें कमाल तक पहुंचाने के लिए मोजन किया था
[13:07]कि इस तरह से एक निजाम बनेगा कि जिसमें ना जुल्म ना
[13:11]तशदूद ना रंजिशें होंगी ना कीना ना बुज सब आपस में मिलके
[13:16]रहेंगे और एक ऐसे माशे को ऐसे समाज को तश्वी देंगे कि
[13:18]जो सब मिलके खुदा की परस्तिश कर रहे हैं रसूल का नाम
[13:21]ले रहे हैं वो हदीस मुझे याद आती है यहां पे अगर
[13:24]तमाम के तमाम लोग अली की विलायत प जमा हो जाते तो
[13:28]परवरदिगार जहन्नम को खल्क ना करता क्योंकि जरूरत ही मैं महसूस नहीं
[13:30]होती जहन्नम किस लिए खल्क हो रही क्योंकि फिर लड़ाई है क्योंकि
[13:35]फिर फसाद है फिर कीना है फिर जुल्म है अगर गदी नाफिया
[13:36]गदी उसके असली रास्ते से बहका नहीं जाता जानशीन को उसके असली
[13:42]रास्ते से हटाया नहीं जाता तो आज जो है जितनी भी परेशानी
[13:44]उम्मते मुस्लिमा को लायक है वो कुछ भी नहीं होती और यहां
[13:48]पे मैं ये बात कहूंगा कि वो तमाम अफराद कि जिनके जिन
[13:51]तक गदर पहुंची है जैसे कि खुतबा गदर में खुद रसूल अकरम
[13:53]सल्लल्लाहु अ वसल्लम ने फरमाया फबा ववा वदा यानी इस पैगाम गदी
[14:00]को पहुंचाना हर हाजिर की जिम्मेदारी है कि वह गायब तक पहुंचाए
[14:03]हर बाप की जिम्मेदारी है कि वह अपने बेटे तक पहुंचाए तो
[14:07]वो अफराद कि जो गदी देख रहे हैं गदी सुन रहे हैं
[14:08]गदी मना रहे हैं जश्न मनाए बिल्कुल लेकिन गदी और पैगाम गदी
[14:14]को महक करने के लिए बेलौस और अंतक मेहनत करते रहे पैगाम
[14:19]गदी को हर एक तक पहुंचाए हर एक मुसलमान तक हर एक
[14:20]इंसान तक पैगाम गदी को पहुंचाए यह हमारी जिम्मेदारी है जिसे पैगंबर
[14:26]ने गदी खूम के मैदान में तायन फरमाई थी मैं अपनी बात
[14:28]को रहबर मोअज्जम एक कोट से खत्म करूंगा कि जहां आप फरमाते
[14:32]हैं गदी को भुलाना कर्बला का सबब हुआ यानी अगर लोग गदी
[14:35]ना भुलाते तो शायद कर्बला मुह कक भी ना होती [संगीत]
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