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[Majlis] Shabe Qadr Aur Imam Ali a.s | H.I Abid Rizvi
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Record date: 31 Mar 2024 - شب قدر اور امام علی
AL-Mehdi Educational Society proudly presents new Executive Refresher Course for the year 2024 under the supervision of specialist Ulema and Scholars who will deliver though provoking lectures Every Weekend.
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Transcript
[0:16]अजु बिल्ला मिन शैतान रजी बिस्मिल्ला हिर रहमान रहीम अल्हम्दुलिल्लाह व कफा
[0:30]व सलामन अला इबाद लजीन स्तफा वलाला आदा मुल अकिया अम्मा बाद
[0:45]फकत काल अल्लाह ताला फी किताब अकमल वल आला बिस्मिल्लाह रहमान रहीम
[0:56]इना अंजलना फी ललल कदर वमा अदरा कमा तुल कद्र लैलतुल कद्र
[1:03]खैर मिन अलफ शहर सवात पढ़े मोहम्मद लह अजीजा मोहतरम कुराने मजीद
[1:24]का मशहूर मारूफ सूरा सूर कद्र कि जिसकी इब्तिदा तीन आयतों को
[1:38]मैंने सरनामा कलाम करार दिया है कि जैसा कि आपको मालूम है
[1:48]उनवान है इमाम अली और शबे कद्र या शबे कद्र और इमाम
[1:51]अली इन्ना अंजलना हो फी लैलतुल कदर हमने कुरान को शबे कद्र
[2:08]में नाजिल किया वदरा कमा लैलतुल कद्र और तुम्हें क्या मालूम कि
[2:15]लैलतुल कद्र क्या है इसके दो तर्जुमे किए गए एक तो यही
[2:20]कि जो उमन किया जाता है कि तुम्हें क्या मालूम कि शबे
[2:24]कद्र क्या है और दूसरा तर्जुमा के शबे कद्र वही है कि
[2:31]जिसको तुमने दर्क किया लैलतुल कद्र खैर मिन अल्फ शहर शबे कद्र
[2:41]हजार महीनों से बेहतर है जैसा कि दुआ में भी मौजूद है
[2:48]व जलता फ है लल तलदार भी इसी तरीके से हमने इसको
[3:01]क्या करार दिया हजार महीनों से बेहतर करार दिया है और खुद
[3:05]महीना शरफ वाला अजमत वाला यह सारी चीजें आपके सामने मौजूद है
[3:12]अजमत व शरफ फल शहर यानी तमाम महीनों में इसको फजीलत और
[3:21]बरतरी हासिल है लेकिन मैं एक कुरान की आयत पढ़ूं आपके सामने
[3:24]सिर्फ इशारा कर रहा हूं सवाल आपके जहन में खुद ईजाद हो
[3:29]जाएगा कुरान की आयत आवाज देती महीनों के हवाले से कि इना
[3:35]इत शहरे इलाही नाशर शहरा किताब हरन फ किता बला जब से
[3:46]परवरदिगार आलम ने खलक समावा जब से परवरदिगार आलम ने जमीन और
[3:52]आसमान को खल्क किया है महीनों की तादाद 12 है मनहा अर
[4:01]रम उनमें से चार महीने हराम हैं मोहतरम महीने हैं कि जो
[4:11]बा एहतराम महीने हैं कि जिनमें खून रेजी हराम है जिसमें ताल
[4:18]हराम है जिसमें तलवार न्याम से निकालना हराम है वह कौन से
[4:21]महीने माहे रमजान माहे रमजान तो नहीं है फिर कौन से महीने
[4:31]जी कैदा जिलहिज्जा और मुहर्रम एक महीना इससे हट के है और
[4:41]वह भी माहे रमजान नहीं है इन दो चीजों को आपस में
[4:45]किस तरह से जम किया जाएगा यह सवाल मैं इजाद कर रहा
[4:51]हूं जवाब आप खुद ढूंढिए मुमकिन है तकरीर में कोई निकल आए
[4:53]तो आप खुद ही देख लीजिएगा मैं बताऊंगा नहीं कि इसका सवाल
[4:58]का जवाब क्या है कुछ तहकीक आपके लिए भी होनी इना शल्ला
[5:05]किता बला यल समावा जब से परवरदिगार आलम ने जमीन और आसमान
[5:12]को खलक किया है महीनों की तादाद 12 है मनहा अरबा और
[5:20]उनमें से चार महीने मोहतरम है उनमें से चार महीने हराम है
[5:28]तीन मुसलसल महीने हैं माहे जिलहिज्जा माहे कैदा माहे जिलहिज्जा और माहे
[5:33]मुहर्रम और तीनों महीनों को माहए हराम कहा जाता है माहए मुहर्रम
[5:37]कहा जाता है यह तीनों महीने मुसलसल क्यों परवरदिगार आलम ने हज
[5:43]की खातिर के एक इंसान जब अपने घर से हज के लिए
[5:50]निकलता है तो वह महीना जो हज से पहले है और वह
[5:55]महीना जिसमें हज है और वो महीना जो हज के बाद है
[5:56]तीनों महीनों को मोहतरम करार दिया किसकी खातिर हज के एहतराम की
[6:02]खातिर कि जब मेरा बंदा मेरे घर के जियारत के लिए और
[6:09]तवाफे काबा के लिए अपने घर से निकले तो बिल्कुल आसूदा खातिर
[6:14]होकर के निकले यानी उसका सफर जिस महीने में शुरू हो रहा
[6:20]है वह भी अम्न का सफर हो जिस महीने में वह हज
[6:25]कर रहा है व महीना भी अम्न का महीना हो और जिस
[6:29]महीने में वह वा बस पलटे का वो महीना भी अम्न का
[6:35]महीना हो यानी परवरदिगार आलम ने माहे हज की खातिर और फजीलत
[6:38]हज की खातिर और इसके एहतराम की खातिर तीन मुसलसल महीनों को
[6:45]हराम करार दिया है ताकि जब कोई इंसान घर से निकले तो
[6:47]बिल्कुल आसूदा खातिर होक के निकले उसे कोई परेशानी लाहट ना हो
[6:52]उसे कुछ लुटने का खतरा ना हो उसे कत्ल हो जाने का
[6:57]कतरा ना हो मेरा बंदा जब मेरे घर के लिए आए तो
[7:01]हमने उसकी खातिर तीन महीनों को हराम करार दे दिया कौन से
[7:04]महीने कैदा बच्चों के लिए तकरार कर रहा हूं कैदा जिलहिज्जा और
[7:12]मुहर्रम और इसके अलावा एक महीना और है कि जो माहा हराम
[7:17]में शामिल है वह कौन सा महीना है माहे रमजान नहीं है
[7:20]बल्कि कौन सा है माहे रजब अजब हम पूरे माहे रमजान में
[7:29]दुआ कर रहे हैं अम आया यह बात गलत है या यह
[7:37]कुरान की आयत गलत है हो ही नहीं सकता और जबक कुरान
[7:42]की आयत ने इस तरफ भी इशारा किया है फजीलत माहे रमजान
[7:47]सबके लिए वाकिफ है खुदान कस्ता मैं कोई शुभ इजाद नहीं करना
[7:50]चाह रहा मैं सिर्फ एक मुकदमा बनाना चाह रहा हूं शबे कद्र
[7:56]के लिए तवज्जो कीजिएगा तो वो तीन महीने तो हज की खातिर
[7:59]परवरदिगार आलम ने मुसलसल हराम करार दिए हैं क्यों हराम करार दिए
[8:05]हैं ताकि जो उसका जाहिरी सफर है जो अपने घर से निकल
[8:06]रहा है काबे के लिए बैतुल्लाह के लिए और तवाफ करके जब
[8:11]वापस अपने घर आएगा तो तीनों महीनों में उसको अमन मिल जाए
[8:17]लेकिन परवरदिगार आलम ने इससे हट कर के रजब के महीने को
[8:21]रजब उल मुरजा के महीने को को भी हराम करार दिया क्यों
[8:25]इसमें कौन सा सफर है क इसमें भी सफर है तवज्जो चाहता
[8:33]हूं हज के महीनों में माहए हज में इंसान जो सफर कर
[8:36]रहा है वह सफर जाहिरी है कि जहां पर इंसान अपने घर
[8:43]को छोड़ता है अपने वतन को तर्क करता है अपने कबीले को
[8:45]तर्क करता है और बैतुल्लाह का सफर करता है और बैतुल्लाह का
[8:51]सफर करने के बाद वापस अपने घर आता है इसलिए परवरदिगार ने
[8:56]इन तीन महीनों को हराम करार दिया माहे रजब में कौन सा
[8:58]महीना ऐसा है माहे रजब में कौन सा सफर इस तरीके से
[9:03]है क माहे रजब में सफर सफर जाहिरी नहीं है यानी इंसान
[9:10]को अपना घर नहीं छोड़ना बल्कि माहे रजब में सफर सफर बातन
[9:13]है और यह सफर मुसलसल है माहे रजब के बाद माहे शाबान
[9:19]और माहे शाबान के बाद माहे रमजान और यह वो सफर है
[9:24]कि जहां पर इंसान को अपना घर नहीं छोड़ना है बल्कि अपने
[9:29]आप को छोड़ना है अपने आप को छोड़ना है अपने आप को
[9:35]छोड़ना है यानी क्या अब यह ना हो कि मैं क्या चाहता
[9:36]हूं और वहां जब इंसान हज के लिए सफर करता है तो
[9:41]अपना घर छोड़ता है बैतुल्लाह की तरफ जाता है यहां जब इंसान
[9:47]अपने आप को छोड़ता है तो बैतुल्लाह की तरफ नहीं बल्कि अल्लाह
[9:50]की तरफ सफर करता है और जब वहां पर हज करता है
[9:54]और हज करके जब वापस आता है तो अपने घर की तरफ
[9:58]पलट आता है लेकिन जब इंसान अपने नफ से सफर शुरू करता
[10:03]है खुदा की तरफ तो यहां वापस आना मुमकिन नहीं है बल्कि
[10:09]वापस आना ही नहीं चाहेगा कौन है और जब इंसान खुदा की
[10:11]तरफ सफर करता है तो इसी को कमाल कहते हैं इसी को
[10:16]मारफ कहते हैं इसी को लिका इलाही कहते हैं जो भी आप
[10:23]ताबीर इस्तेमाल करें और यह सफर माहे रजब से शुरू होता है
[10:26]माहे रजब में दाखिल होने वा ला मेरे अजीजो माहे रजब का
[10:33]आना और है माहे रजब में वारिद होना और है इसी तरीके
[10:39]से माहे रमजान का आना और है माहे रमजान में दाखिल होना
[10:42]और है मेरे अजीजो माहे रमजान तो सबके लिए आया है कौन
[10:48]सा ऐसा मुल्क है दुनिया में कि जहां पर माहे रमजान नहीं
[10:52]है और पैगंबर अकरम हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वालि वसल्लम इरशाद
[11:04]फरमाते हैं किला लोगों तुम्हारी तरफ अल्लाह का महीना आ रहा है
[11:11]यह मुझे बात बाद में कहनी थी लेकिन लफ शहला से इस्तफा
[11:16]करने की वजह से अभी कह रहा हूं कलाला तुम्हारी तरफ अल्लाह
[11:23]का महीना आ रहा है बिल बरकत रहमते ल मफरा बरकतों के
[11:32]साथ रहमतों के साथ मग फिरतो के साथ कमलाला यह वह महीना
[11:37]है कि जिसमें तुम्हें मद किया गया है जिसमें तुम अल्लाह के
[11:40]मेहमान करार पाए हो और यह वह महीना है कि जिसमें परवरदिगार
[11:45]ने तुम्ह मुकर्रम बनाया है मुकर्रम बनाया यानी क्या अनस नबादा मकबूल
[11:57]मुस्तजाब यानी यह व महीना है हमने तुम्हें इसमें मुकर्रम बनाया है
[12:02]इसके माना क्या है यानी इस महीने में तुम्हारी सांस तस्बीह का
[12:05]सवाब रखती है किस महीने में माहे रमजान में सांस तस्बी का
[12:13]सवाब गैर इख्तियार अमल कोई है कि जो सांस अपने इख्तियार से
[12:18]लेता है गैर इख्तियार अमल पर तस्बीह का सवाब तस्बी यानी सुभान
[12:22]अल्लाह जब इंसान सुभान अल्लाह कहता है तो सवाब मिलता है यानी
[12:27]यह जो आप सांस एक मर्तबा ले रहे हैं और एक दफा
[12:31]वापस जा रही है यह दो मर्तबा सुभान अल्लाह का सवाब इंसान
[12:38]गैर तयारी फेल पर ले रहा है अजब है कि नहीं है
[12:40]यह मुकर्रम है नहीं एक इंसान गैर तयारी अमल पर उसको सवाब
[12:46]मिल रहा है नौ मुक बादा दूसरे महीनों में सोते हो सो
[12:52]मसला नहीं है इस महीने में सोगे तो तुम्हारा सोना इबादत है
[12:56]अमलक मकबूल इसमें तुम्हारा हर अमल मकबूल है व मुस्तजाब इसमें तुम्हारी
[13:05]दुआएं मुस्तजाब है किसकी दुआए मुस्तजाब है मुझे ये बताए सांस तस्बीह
[13:11]का सवाब रखती है किसकी माहे रमजान तो सबके लिए आया है
[13:18]आया काफिर की सांस भी तस्बी का सवाब रखती है हर इंसान
[13:20]की सांस तस्बी का सवाब रखती है कहा नहीं जो माहे रमजान
[13:25]में वारिद होगा उसकी सांस तस्बीह का सवाब रखती है मैं तवज्जो
[13:29]में फिर पीछे जाऊंगा मेरे अजों माहे रजब को परवरदिगार ने हराम
[13:35]करार दिया है इसलिए कि यह वो सफर है जो सफर मानवी
[13:40]है सफर बातन है हज में सफर इंसान सफर जाहिरी कर रहा
[13:42]था अपने घर को छोड़ रहा था काबे की तरफ जा रहा
[13:46]था लेकिन माहे रजब में अपने आप को छोड़ना है और अल्लाह
[13:52]की तरफ सफर करना है और यह भी मुसलसल सफर है माहे
[13:55]रजब के बाद माहे शाबान और माहे शाबान के बाद माहे रमजान
[14:01]माहे रमजान में कौन दाखिल होगा जो माहे शाबान को दर्क कर
[14:07]चुका हो माहे शाबान में कौन दाखिल होगा जो माहे रजब को
[14:13]दरक कर चुका हो तवज्जो चाहता हूं मेरे अजीजो मौला कायनात लिब
[14:15]कुले लिब अली इने अबी तालिब अ सलातो सलाम इरशाद फरमाते हैं
[14:28]कि रजब शहरी रजब मेरा महीना है मौजू से हटा नहीं हूं
[14:35]शबे कद्र और इमाम अली तवज्जो चाहता हूं रजब उन शहरी रजब
[14:38]मेरा महीना है व शाबान शहर रसूलल्लाह और माहे शाबान अल्लाह के
[14:50]रसूल का महीना है शहर रमजान शहर उल्ला ही अज्ज वजल और
[14:57]माहे रमजान अल्लाह का महीना है देख रहे हैं आप रजब मेरा
[15:04]महीना है शाबान रसूल खुदा का महीना है और माहे रमजान खुदा
[15:09]का महीना है यानी कहना क्या चाह रहे हैं कि रजब मेरा
[15:14]महीना है यानी अगर मैं लफ्जों को बदलूं तो यूं कहूं तो
[15:19]गलत नहीं होगा माहे रमजान तौहीद का महीना है माहे शाबान रिसालत
[15:26]का महीना है नबूवत का महीना है और माहे रजब इमामत और
[15:34]विलायत का महीना है यानी तौहीद में कदम कौन रखेगा कि जो
[15:38]रिसालत को समझ चुका हो अल्लाह के नबी का मुनकर रसूल खुदा
[15:45]का मुनकर तौहीद का ढोंग नहीं रचा सकता तो माहे रमजान में
[15:49]कौन दाखिल होगा जो माहे शाबान में दाखिल हो यानी माहे शाबान
[15:52]में दाखिल होने का मतलब यह है कि माहे रमजान में दाखिल
[15:58]होने के लिए रिसालत को समझने के जरूरत है और माहे शाबान
[16:04]में कौन दाखिल होगा क्या जो माहे रजब में दाखिल हो चुका
[16:06]हो क माहे रजब किसका महीना है क इमामत और विलायत का
[16:12]महीना है अली का मुनकर नबी या नबी अल्लाह के नारे लगाता
[16:19]रहे नबूवत को समझ नहीं सकता बगैर विलायत अली एक सवात पढ़े
[16:23]मोहम्मद वा आले मोहम्मद सहद दोनों तरीके से है रजब शहरी व
[16:35]शाबान शहर रसूलल्लाह व शहर रमजान शहर उल्ला अज वजल एक इस
[16:44]तरतीब से भी है और दूसरी जगह पर शहर रमजान शहला अजल
[16:47]व शाबान शहर रसूलल्लाह रजब शहरी यानी एक मर्तबा अपने से शुरू
[16:58]किया खुदा तक पहुंचाया और एक मर्तबा खुदा से शुरू किया अपने
[17:01]तक पहुंचाया यानी अगर तुम मुझसे शुरू करोगे तो खुदा से मिलोगे
[17:08]और अगर खुदा से चलोगे तो मुझ तक पहुंचो ग एक सवात
[17:09]पढ़े मोहम्मद और आले मोहम्मद पर तो अब समझ में आया कि
[17:20]किसकी सांस तस्बीह का सवाब रखती है और यह मैं अपने पास
[17:22]से नहीं कह रहा हूं दुआए मौजूद है कि इंसान माहे शाबान
[17:26]में दाखिल ही नहीं हो सकता जब तक माहे रजब में दाखिल
[17:30]ना हो हो माहे रजब का आना और है माहे शाबान का
[17:35]आना और है इनमें दाखिल होना और है उसकी कुछ शराय है
[17:37]उन शराय पर इंसान को जिंदगी गुजारनी होगी तब जाकर के माहे
[17:42]रजब और शाबान और रमजान को दर्क कर सकता है और माहे
[17:44]रमजान में वही दाखिल होगा कि जिसने माहे शाबान को दर्क किया
[17:48]हो दुआ है मैं अपने पास से नहीं कह रहा हूं मासूम
[17:52]दुआ करते हैं कि अल्लाहुम्मा बारिक लना फी रजब वा शाबान परवरदिगार
[17:56]हमारे लिए रजब और शाबान को बा बरकत करार दे ला रमजान
[18:02]और हमें माहे रमजान तक पहुंचा दे इसके माना क्या है माहे
[18:10]रमजान तो आ रहा है पहुंचा दे क्या मतलब यानी इसका मतलब
[18:15]यह है कि माहे रमजान का आना और है माहे रमजान तक
[18:23]पहुंचना और है तौहीद का मुनकर रसूल का मुनकर तौहीद तक नहीं
[18:26]पहुंच सकता इमामत विलायत का मुनकर नहीं पहुच सकता रिसालत नबूवत का
[18:34]मुनकर तौहीद तक नहीं पहुंच सकता अपनी मनमानी तौहीद मानना और है
[18:38]रसूल की बताई हुई तौहीद को मानना और है तो जब इस
[18:45]सिलसिले से इंसान माहे रमजान में दाखिल होगा तो उसकी सांस तस्बी
[18:52]का सवाब रखती है और फिर समझ में आएगा कुलेम पहले रजब
[18:59]में दाखिल हो तो ताकि शाबान में दाखिल हो सको पहले शाबान
[19:06]में दाखिल हो तो ताकि माहे रमजान में दाखिल हो सको और
[19:08]जब माहे रमजान में दाखिल हो सको तो इस काबिल बन सको
[19:12]कि मुत कीन की फेरिस में शामिल हो सको और जब मुत
[19:17]कीन की फैरिस में आओगे तो फिर पैगंबर आवाज देंगे अनस तस्बी
[19:20]तुम्हारी सांस तस्बी का सवाब रखती है नबादा ल है मकबूल मुस्तजाब
[19:29]यह सारी चीजें इन तमाम मराल के बाद है ऐसा नहीं है
[19:35]वरना बिल क्लिंटन की साथ तस्बी का सवाब रखेगी मुमकिन ही नहीं
[19:38]है यह तो मैं बहुत मसलत के साथ नाम ले रहा हूं
[19:42]वरना बहुत मुश्किल है लफ्ज इस्लाम के अंदर भी एक सलवाद पढ़े
[19:48]मोहम्मद और आले मोहम्मद पर और ये शबे कद्र की बात नहीं
[19:58]है ये पूरे माहे रमजान की बात है लेकिन इस माहे रमजान
[20:02]की आमागी के लिए हमें सफर कब से करना था अपने आप
[20:07]को कब आमादा करना था माहे रजब में अब तो गुजर गई
[20:12]लेकिन आने वाले साल में इ इंशाल्लाह इंसान इस तरफ मुतजेंस इब्तिदा
[20:21]क्लासे ना पढ़ी हो जाकर के इंटर में जाकर बैठ जाए यूनिवर्सिटी
[20:27]में जाकर बैठ जाए हो सकता है यहां समझ में नहीं आती
[20:29]यहां समझ में आती है तो बिला वज तो कुरान नहीं कह
[20:35]रहा ललल कद रल कदर ऐसी तो नहीं कह रहा यानी कोई
[20:40]राज है कि जो इसके अंदर पोशीदा है वो राज क्या है
[20:42]क पहले मरहला ब मरहला अपनी मनाजिल को तय करो अपने आप
[20:47]को इस काबिल बनाओ कि तुम माहे रमजान में दाखिल हो सको
[20:52]और जब इस काबिल बन जाना कि माहे रमजान में वारिद हो
[20:54]तो तुम अब इस काबिल हो कि शबे कद्र में दाखिल हो
[20:57]सको और शबे कद्र के जो हजार महीनों से बेहतर है शबे
[21:04]कद्र हजार महीनों से बेहतर अच्छा क्या मतलब है इसका हजार महीने
[21:09]आप मुझसे बेहतर जानते हैं हदे अकल हजार महीने वना हजार महीनों
[21:15]से बेहतर है कितनी बेहतर है ला महदूद बेहतरी का तस्करा है
[21:24]यह नहीं बताया जा रहा कि कितनी बेहतर इतना बताया जा रहा
[21:30]है कि शब हजार महीनों से बेहतर है यानी क्या मतलब इससे
[21:34]आप क्या समझे कि आज जो रात आने वाली है शबे कद्र
[21:37]की इसमें और कल जो रात गुजरी है उसमें क्या फर्क है
[21:42]जाहिरी तौर पर तो कोई फर्क नहीं है जैसी रात कल गुजरी
[21:48]है वैसी रात आज गुजर जाएगी मसल जैसे कल की रात 12
[21:52]घंटे की थी तो आज की रात तो ऐसा नहीं है कि
[21:56]मलन हजारों घंटे लग जाएंगे तमाम नहीं होगी नहीं 12 घंटे में
[21:59]तमाम हो जाएगी और फिर शबे कद्र में बार-बार कहने वाला कहता
[22:01]भी है कि वक्त कम है तो फिर क्या मतलब है जाहिरी
[22:07]तबार से नहीं है मुजनाई तबार से फर्क है मानवी तबार से
[22:12]फर्क है यानी क्या कि शबे कद्र हजार महीनों से बेहतर है
[22:17]यानी इस रात एक मर्तबा सलवाद पढ़ो एक तरफ और पूरी जिंदगी
[22:22]सलवाद पढ़ते रहो वो एक तरफ यानी पूरी जिंदगी तुम या अली
[22:28]या अली कहते रहो वो एक तरफ और इस रात में एक
[22:30]मर्तबा या अली कह दो वो एक तरफ एक सवात पढ़े मोहम्मद
[22:35]ले मोहम्मद अब जब यह बात आई है तो मैं जल्दी से
[22:43]एक वाक आरिफ का वाकया है जल्दी से अ कर दू ताकि
[22:46]बच्चे महसूस करें और होता भी इंसान के साथ आम इंसान के
[22:52]साथ जब इंसान इबादत में अपने आप मुतजेंस होता है हर मोमिन
[23:01]इंसान हर आबिद इंसान इस चीज को महसूस करता है उस पर
[23:06]य कभी-कभी कैफियत तारी होती है लगता है ना कि यह मौका
[23:09]ऐसा है कि परवरदिगार हमारी सुन लेगा तो आरिफ पर एक कैफियत
[23:15]तारी हुई कब जब नमाज शब पढ़ रहे हैं कब ऐसा लगता
[23:19]है कि मेरा माबूद मेरी बात सुनेगा तो आवाज दी परवरदिगार कब
[23:27]से मैं तेरी इबादत कर रहा हूं कुछ तो दिखा दे तो
[23:31]आवाज गैबी आई देखोगे अच्छा हम और आप होते जब यह आवाज
[23:38]कान से टकराती तो फौरन कमरे से बाहर जाते शायद कोई भूत
[23:43]आ गया है यह तो हमारा यकीन है लेकिन वह आर थे
[23:45]कहा दिखा कुछ लमहे बाद तो ना छत दिख रही है ना
[23:50]दीवार दिख रही है पूरी कायनात नजरों के सामने आ गई और
[23:55]पूरी कायनात का एक ही नगमा था बे अलीन बे अली अली
[24:00]एक सवात पढ़े मोहम्मद ले मोहम्मद आज जब आप कुरान सर पर
[24:11]रखकर बेली बेली कहेंगे तो याद आएगा और ल आएगा फकत हम
[24:14]और आप बे अली बेली नहीं कह रहे हैं बल्कि पूरी कायनात
[24:20]बे अली बे अली कह रही है तो गरज के ललल कदर
[24:24]शब कद्र हजार महीनों से बेहतर है हज मही बेहतर है यानी
[24:31]क्या तुम इसमें एक अमल अंजाम दो व पूरी जिंदगी से बेहतर
[24:35]है कितना बेहतर है यह नहीं बता रहा खुदा अच्छा आपने कोई
[24:39]मुफस्सिर देखा बस आखरी बात कह रहा हूं और अमीर मोमिनीन से
[24:41]मबू कर दूंगा आपने कोई ऐसा मुफस्सिर ऐसा मुह कि जिसने इस
[24:49]आयत पर तराज किया हो ये कैसे मुमकिन है कि शबे कद्र
[24:58]हजार महीनों से बेहतर हो ही नहीं सकता कि इस रात में
[25:01]उस रात में क्या फर्क है एक ही जैसी तो रात है
[25:04]हम नहीं मानते किसी ने लिखा हो या किसी ने अपनी तकरीर
[25:07]में इस तरह से तराज किया हो कुरान की आयत पर कर
[25:11]ही नहीं सकता अगर कर देगा तो खारिज हो जाएगा इस्लाम से
[25:15]यानी यह आयत बता रही है कि परवरदिगार वह परवरदिगार है कि
[25:21]अगर चाहे तो एक रात को हजार महीनों से बेहतर बना सकता
[25:25]है अरे वो खुदा के जो एक रात को हजार महीनों से
[25:31]बेहतर बना सकता है उसी खुदा ने अली की एक जर्बत को
[25:36]सकलैन की इबादत से बेहतर बनाया है देख रहे कितना रबत पाया
[25:42]जाता है शबे कद्र हजार महीनों से बेहतर है और अली की
[25:44]एक जर्बत सकलेन की इबादत से बेहतर है और यह मैं नहीं
[25:50]कह रहा हूं हदीस है जरब अली खंदक अ और यहां से
[25:56]एक बात तो वाज हो जाती है मेरे अजीजो इबादत का मफू
[26:01]जो हम समझते हैं व और है इबादत का मफू जो पैगंबर
[26:06]समझा रहे हैं वो और है यानी फकत इबादत मुसल्ला नहीं है
[26:08]बल्कि अगर तुम चाहो तो मैदान जंग को भी इबादत का मैदान
[26:13]बना सकते हो जैसे कि अली ने बनाया जरबक अद सकन अली
[26:20]की एक जर्बत सकलेन की इबादत से अफजल है क्या एक जर्बत
[26:30]यानी 5 सेकंड 10 सेकंड 15 सेकंड इससे ज्यादा आप नहीं लेकर
[26:38]जा सकते यानी पूरी कायनात मिलकर रुकू बजा लाए सकलेन यानी जिन्नो
[26:43]इंस जिन्नो इंस मिलकर रुकू पर रुकू करें सजदे पर सजदे करें
[26:47]लेकिन अली की एक जर्बत का मुकाबला नहीं कर सकते जिसकी पूरी
[26:53]कायनात एक जर्बत का मुकाबला नहीं कर सकती उसकी 63 बरस की
[26:57]जिंदगी का ना कौन करेगा कर ही नहीं सकता जरब तो अली
[27:05]अलो मनबाद सकलेन अली की एक जर्बत सकलेन की इबादत से अफजल
[27:14]है यहां पर भी नहीं बता रहे कितनी अफजल है जैसे लैलतुल
[27:17]कदर खर मन शहर शबे कद्र हजार महीनों से बेहतर है कितनी
[27:23]बेहतर है ला महदूद बेहतरी का तस्करा अली की एक जरत सकन
[27:29]की इबादत से बेहतर है कितनी बेहतर है ला महदूद बेहतरी का
[27:32]तस्करा अजीब है वाक और जो अली ने एक सरबत लगाई क्या
[27:43]किया है कि जो सकलेन की इबादत से अफजल हो रही है
[27:44]मेरे अजीज य यहां की बात नहीं थी लेकिन मैं बच्चों के
[27:48]लिए जल्दी से अर्ज कर रहा हूं मेरे अजीजो आप यह मुझे
[27:54]बताएं कौन सी ऐसी चीज है कि जो आपके अमल को इबादत
[27:59]बनाती है नमाज अमल है लेकिन नमाज को इबादत कौन सी चीज
[28:07]बनाती है नियत यानी इसका मतलब यह है कि खुद जात नमाज
[28:13]इबादत नहीं है माफ कीजिएगा मैं यह नहीं कह रहा हूं कि
[28:19]नमाज ना पढ़े नहीं नमाज अच्छी नियत के साथ पढ़े यह कहना
[28:22]चाह रहा हूं रोजे को इबादत किसने बनाया भूखे रहने ने प्यासे
[28:36]रहने ने नमाज को इबादत रुकू ने बनाया है सजदे ने कयाम
[28:39]ने कुद ने तहद ने सलाम ने किसने बनाया किसी ने नहीं
[28:47]इसलिए कि एक इंसान जो नमाज पढ़ रहा है के लोगों को
[28:55]दिखाने के लिए लोग मुझे कहे आबिद हूं लोग मुझे नमाजी कहे
[28:58]य इबादत है अच्छा जो लोगों को दिखाने के लिए नमाज पढ़
[29:02]रहा है तो क्या रुकू गलत कर रहा है सजदा गलत कर
[29:07]रहा है कहा नहीं रुकू भी सही कर रहा है सजदा भी
[29:11]सही कर रहा है हाजी साहब हज पे जा रहे हैं लोग
[29:15]कहे कि हाजी हैं यह जो दिल में नियत आई है कि
[29:19]लोग कहे हाजी हैं तो क्या उनका तवाफ उल्टा था सफा और
[29:22]मरवा की जो सही वो उल्टी लगा रहे थे क नहीं सीधी
[29:25]लगा रहे थे सारे मनाज सही अंजाम दे रहे थे लेकिन उसके
[29:31]बावजूद इबादत नहीं है नमाज के अरकान सही बजा ला रहा है
[29:33]लेकिन इबादत नहीं है तो इसके माना यह है कि रुकू को
[29:37]नमाज को रुकू ने इबादत नहीं बनाया है नमाज को सजदे ने
[29:42]इबादत नहीं बनाया है बल्कि तुम्हारी नियत जो है कुर्बत इल्ला ने
[29:47]इबादत बनाया है यानी यह वो नुस्खा है कि अगर तुम चाहो
[29:50]तो अपनी पूरी जिंदगी को इबादत बना सकते हो अगर कुरबत इल्ला
[29:56]को उसके साथ ले आओ एक सवात पढ़े मोहम्मद ना हैदरी या
[30:05]अली बस मेरे अजज बस मेरे अजों मैंने बात को तमाम कर
[30:16]दिया अली की एक जर्बत सकलेन की इबादत से अफजल है ये
[30:20]ये उस लूज के साथ जर्बत लगा रहा है अली अपने नर्स
[30:26]की बुनियाद पर किसी को कत्ल नहीं करता बल्कि खुदा के लिए
[30:31]किसी को कत्ल करता है और खुदा ही के लिए किसी को
[30:32]बख्ता है वह जानता है किसके साथ कै कैसा मामला करना है
[30:37]तो जबी पैगंबर कह रहे हैं कि अली की एक जरत सकलेन
[30:42]की इबादत से अफजल है जिसका वार इतना भारी हो उसके सजदे
[30:44]का आलम क्या होगा और वह 19वी का सजदा कि जिसके लिए
[30:54]पूरी कायनात जेरो जबर हो गई कि जिस सजदे पर मलायका में
[31:03]कोहराम मज गया ऐसा सजदा और वह आखरी जिंदगी का सेहत और
[31:15]सालिम सजदा अमीरुल मोमिनीन का किस मकाम पर होगा हम और आप
[31:18]तसव्वुर नहीं कर सकते मेरे अजीजो कि किस मकाम पर जाकर के
[31:24]अमीरुल मोमिनीन अपने खालिक को सजदा कर रहे हैं कि जिसकी जर्बत
[31:27]लोगों के समझ में नहीं आ उसका सजदा कहां समझ में आएगा
[31:34]हां अजीजो वह अली के जो खुद आवाज देता है सबर तो
[31:47]फल हल सजा ने कज मैंने ऐसे सब्र किया कि जैसे किसी
[31:49]के हल्क में हड्डी फसी हो या किसी की आंख में कांटा
[31:56]लगा हुआ कितनी अजियत होती है इस तरीके से अमीरुल मोमिनीन ने
[32:00]25 साल गुजारे हैं पैगंबर के बाद ऐसी मुसीबतें अमीरुल मोमिनीन के
[32:05]पास आई हैं के कब्र सैयदा पर पैगंबर का रुख करके कब्र
[32:11]पैगंबर का रुख करके कहते हैं या रसूल अल्लाह अम्मा हु जनी
[32:16]फ सरमद अम्मा लैली फ मुसा हद या रसूल अल्लाह अब मेरे
[32:23]गम तुलानी हो चुके हैं मेरे गम दामी हो चुके हैं और
[32:25]अब मेरी रातें जाग के गुजर हां अजीजो जिसकी रातें जाग के
[32:32]गुजर रही थी अब उसकी रातें सुकून से गुजरे तारीख कहती है
[32:42]19वीं की शब क्योंकि यह दस्तूर ता अमीरुल मोमिनीन का माहे रमजान
[32:46]में और खुसूस उस 40 के माहे रमजान में कभी किसी के
[32:50]घर मेहमान है कभी हसन के घर हैं कभी हुसैन के घर
[32:54]है कभी अब्दुल्लाह इब्ने जाफर यानी जैनब कुबरा के घर है तारीख
[32:58]कहती है 19वी की शब अपनी चाही द बेटी उम्मे कुलसूम के
[33:03]घर मेहमान है आप बताइए ऐसा अली के जो दूसरों के लिए
[33:13]पाप हो वह अपनी बेटी के लिए कितना बाप होगा और उस
[33:17]बेटी के घर अली जैसा बाबा आ रहा है इफ्तार के लिए
[33:23]तो उसकी कैफियत क्या होगी दस्तरखान लगा सफरे पर नमक रखा है
[33:27]जौकी रोटी रखी है और एक कासा शीर का रखा है गौर
[33:33]से देखा मेरी लाल क्या कभी तुमने बाबा को देखा है एक
[33:38]सुफ्र पर दो गजा नावल करे इससे पहले के अली कुछ और
[33:44]कहते बेटी ने चाहा के नमक उठा ले हाथों को रोका के
[33:49]नहीं मेरी लाल शीर उठा ले इसलिए के कह चुके हैं लल
[33:54]ललतान कुछ रातें बाकी है मैं भूखा जाना चाहता हूं अफता से
[34:03]उठे और आज की रात अजब इस्तरा कीया कैफियत है कभी हुजरे
[34:09]में आते हैं इबादत इलाही अंजाम देते हैं कभी सैने खाना में
[34:13]आकर आसमान का रुख करके कहते हैं इन्ना लिल्लाह व इन्ना इल
[34:20]राजन बेटी ने पूछा बाबा क्या किसी बड़ी फौज से मुकाबला है
[34:26]क नहीं मेरी लाल मैंने ने बड़ों बड़ों को जेर कर दिया
[34:32]मैंने बड़े-बड़े पहलवानों को फिनर कर दिया कल मुझे किसी फौज का
[34:35]सामना नहीं है कल मुझे उसके सामने पश पेश होना है जो
[34:40]कायनात का शहनशाह है सफद सहर नमूद हुआ मौला घर से मस्जिद
[34:51]की तरफ जाना चाहते हैं आपने सुना हुआ है मुर्गा बियों ने
[34:57]घेर लिया यानी जबाने बे जबानी में कह रही मौला आज ना
[34:59]जाइए मौला आज मस्जिद ना जाइए लोगों ने हटाना चाहा कहा नहीं
[35:06]छोड़ दो ये हम पर नोहा कर रही है ये हम पर
[35:10]गिरिया कर रही है और फिर इनके बारे में वसीयत हैं कि
[35:14]देखो अगर तुम इनके दाना पानी का ख्याल रख सकते हो तो
[35:16]इन्हें रखना और अगर इनका ख्याल ना रख सकते हो तो इन्हें
[35:21]आजाद कर देना मैं कहूंगा मौला जानवरों के दाना पानी की इतनी
[35:24]फिक्र है काश आप शाम गरीब में होते तारीख कहती है कि
[35:36]खैबर शिकन अली से दरवाजा खोलना मुश्किल हो गया था जो चौबे
[35:40]खोरमा से बना हुआ था मौला ने उसे उखाड़ उखाड़ करके अलग
[35:46]रख दिया और कहते हैं कि अली अपनी कमर को कस लो
[35:51]मौत तुमसे मुलाकात करने वाली है और यह कहकर अली घर से
[35:57]बाहर निकले अब अली सालिम वापस ना आएंगे रास्ते में आहट महसूस
[36:01]की पूछा कौन कहा बाबा मैं हूं हसन कहा हसन अभी वक्त
[36:06]में ताखी है तुम थोड़ी देर बाद आना बाप का हुक्म था
[36:09]बेटा वापस हो गया अली मुसल्ला इबादत पर आए हसबे दस्तूर दो
[36:15]रकत नमाज पढ़ी और जो मस्जिदए कूफा गया है वो जानता है
[36:18]मस्जिदए कूफा में दो मेहराब हैं एक मेहराब असली मेहराब है और
[36:24]एक मेहराब नफिल की मेहराब है जो मौला पर की सर पर
[36:29]जरब लगी है वो नफिल की मेहराब में लगी है मौला मजने
[36:31]पर आए तकबीर कही अल्लाह हू अकबर तारीख कहती है कि अली
[36:39]की यह अजान कफे के घर-घर तक पहुंची मैं कहूंगा कफे वालों
[36:43]अली की आवाज सुन लो इसके बाद अली फिर आवाज ना देंगे
[36:50]अजान तमाम हुई मुसल्ला नफिल पर आए दो रकत नमाज के लिए
[36:58]नियत बांधी अल्लाह अला अकबर उधर इने मुलजिम ने अपने आप को
[37:05]आमादा किया मुस्ताहब नमाज का पहला सजदा था सजदे से सर उठा
[37:10]उधर से तलवार चली अली का सर दोबारा हो गया आवाज देते
[37:16]हैं बिस्मिल्लाह वाला मिलते रसूलल्लाह [संगीत] काबा रब्बे काबा की कसम अली
[37:27]कामयाब हो गया जिब्राईल जमीन और आसमान के दरमियान आए आवाज द
[37:32]तह मत वल्ला अरकान हुदा अरकाने हिदायत मुन हदम हो गए कुतला
[37:41]अलीनल मुर्तजा अली मुर्तजा कत्ल हो गए कुतला अमिल मुस्तफा अरे मुस्तफा
[37:46]का चाचा जाद भाई मारा गया कतल तो अकल अकिया शकी तरीन
[37:53]शख्स ने अली को कत्ल कर दिया यह आवाज कफे के घर
[37:57]तक पहुंची जैनब ने सु उमे कुलसूम ने [संगीत] सुनी हसनैन ने
[38:04]सुनी पूरे कफे वालों ने सुनी जैसे ही आवाज कानों से टकराई
[38:11]लोग मस्जिद कूफा की तरफ दौड़े हसनन भी मस्जिद की तरफ आए
[38:14]क्या देखा बाप खाक और खून में लौट रहा है और आवाज
[38:19]दे रहे हैं खाक सर पर रख के कहते जाते हैं मलना
[38:27]कहा बाबा यह कैफियत क्या है कहा मेरे लाल मस्जिद नमाजियों से
[38:33]छलक रही है पहले नमाज सुब अंजाम दे दो नमाज सुब तमाम
[38:40]हुई बस मैंने तमाम कर दिया मेरे अजीजो आप मसाइल सुनते रहते
[38:46]हैं कि जिसने वार लगाया था इब्ने मुलजिम लोग उसको असीर करके
[38:49]घसीट के लेकर आ रहे हैं हाथों पर कसके रस्सियां बांधी गई
[38:55]हैं अली ने देखा कि रस्सियां कितनी कसके बंधी हुई है है
[38:59]अरे इसकी रस्सियों को ढीला करो मैं कहूंगा मौला दुश्मन के हाथ
[39:07]बंदना भी गवारा ना हुए अरे काश आप कर्बला और कूफा में
[39:11]देखते आपकी बेटियां कर्बला से कूफा कफे से शाम बसे गर्दन हाथ
[39:20]बंधे हुए थे मना दी निदा देता हुआ हा सेही सब आया
[39:22]में बनाते रसूल सलमन जलम अया मुन कलब न कलेब इन्ना लिल्लाह
[39:46]व इन्ना इल राजन अल्लाहु मकना ईमान साद का लिसानन जा केरा
[39:51]व कल बन खाश बदन साबरा ना बत नसूहा रहमत कया अरहम
[40:11]रान
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