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Imam Zamana Ki Yad Wa Zikr Ka Ahya | H.I. Sadiq Raza Taqvi
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محاضرات
Record date: 24 Dec 2023 - امام زمانہ کی یاد و ذکر کا احیاء AL-Mehdi Educational Society proudly presents new Executive Refresher Course for the year 2023 under the supervision of specialist Ulema and Scholars who will deliver though provoking lectures Every Weekend. These video lectures are presented by aLmehdi educational society, Karachi for our youth. For more details visit: 📡 www.almehdies.com 🖥 www.facebook.com/aLmehdies313 🎥 www.youtube.com/aLmehdies 🎥 www.shiatv.net/user/Al_Mahdi_Edu
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Transcript
[0:12]वाला अले ब तयबी रीनल मासन यमा बकला लालाला अजमा मिनल इला
[0:31]कया यन अ बादला सुभान ताला किताब मुबीन हु बमला रहमान रहीम
[0:38]उ फी बद अफ बद उ फी बदक अजर मोहतरम सूर बकरा
[0:46]में इशाद रब्बुल इजत है कि अल्लाह तबारक [संगीत] ताला इंसानों से
[0:54]मुखातिब है और यह कह रहा है कि तुम मेरे अहद को
[1:00]पूरा करो तो मैं तुम्हारे अहद को पूरा करूंगा जो हमारा मौजू
[1:06]है वह इमाम जमाना की याद और उनका जिक्र है और यह
[1:15]जिक्र और यह याद कि जो नशत हासिल करती है एक ऐसी
[1:22]बुनियाद पर कि जिसका हुसूल हम सबके लिए जरूरी है और वह
[1:29]है इमाम जमाना अजल अल्लाह ताला फरज शरीफ की मफत अगर यह
[1:36]मारफ ना हो अगर इस मफत का हुसूल इंसान के लिए मुमकिन
[1:42]ना हो तो इंसान गुमराह हो जाता है लिहाज जैसे कि रिवायत
[1:53]अभी आपके सामने अर्ज करूंगा कि जिसमें इमाम जमाना अजल अल्लाह ताला
[1:58]फरज शरीफ की मफत को बहुत अहम करार दिया गया है यानी
[2:06]दीगर इबादत की बुनियाद बल्कि इंसान के राहे रास पर रहने और
[2:16]कायम और उसकी बका का दारो मदार उसकी मफत इमाम पर है
[2:20]यही वजह है कि हम जो इमाम जमाना से दुआ अहद पढ़ते
[2:27]हैं अल्लाहु इनी उजल स यह नहीं कहा कि मैं आज के
[2:36]दिन इमाम से बैत करता हूं बल्कि मैं तज दीद करता हूं
[2:40]तज दीद का लज वहां पर आता है कि जहां पर कोई
[2:44]चीज पहले से मौजूद हो और उसमें कोई इजाफा किया जाए उसके
[2:52]बारे में कोई गुफ्तगू की जाए इसलिए अरबी में एक लफ इस्तेमाल
[2:56]किया जाता है तज दीद बेना तजी बेना यानी इमारत को असर
[3:03]नो या जो मौजूदा हालत है उसके साथ साथ उसमें इजाफा करना
[3:11]तज दीद जदा यज तज दीद यानी दर हकीकत उसमें इजाफा करना
[3:13]है अल्लाहु इनी फ सबीहा अल्लाह मैं आज के दिन आज की
[3:26]सुबह अपने इमाम जमाना से तज दीद बत कर रहा हूं तज
[3:27]दीद अहद कर रहा हूं यह अहद कहां पर हमने किया था
[3:36]यह आलम दरह कीक आलम अरवाह में अल्लाह ने हमसे अहद लिया
[3:39]था कि तुमने अपने अपने जमाने के इमाम के लिए दर हकीकत
[3:47]बायत करनी है लिहाज उस अहद को सामने रखते हुए हम रोजाना
[3:54]एक मोमिन एक मुंतज एक हकी शिया एक मुवा हद और खुदा
[3:56]पास इंसान रोजाना इमाम जमान से तजी बत करता है और अगर
[4:04]यह मफत ना हो अगर यह जिक्र ना हो इमाम जमाना का
[4:09]तो जिस तरह कहा है के वला तला उन लोगों की मानिंद
[4:17]ना हो जाओ कि जो खुदा को भुला बैठे तो अल्लाह ताला
[4:23]ने उनको ऐसा कर दि कि वह अपने आप को भूल गए
[4:25]पस जिस तरह खुदा फरामोशी खुद फरामोशी का सबब बनती है उसी
[4:36]तरीके से इमाम फरामोशी भी खुद फरामोशी और दीन से बे बहरा
[4:44]होना और गुमराही का सबब बनती है ख वाज बात है जो
[4:46]खुदा को भूल जाए खुदा कहता है ठीक है मैं तुम्हें तुम्हारे
[4:50]हाथ पर छोड़ दिया फिर वह दुनिया की जिंदगी में गरक हो
[4:55]जाता उसी तरीके से एक इंसान कि जो इमाम की मफत हासिल
[4:58]ना करे अजने गरा वह अपने आप को और अपने दीन सबको
[5:06]छोड़ देता है इसकी दलील क्या है आप दलील दीजिए दलील व
[5:08]मशहूर मारूफ दुआ है अल्लाहु अन खुदा अपनी मफत करा अगर तूने
[5:19]अपनी मारफ ना कराई तो मैं तेरे रसूल को नहीं पहचानू और
[5:21]खुदा अपने रसूल की मफत करा कि अगर तूने अपने रसूल की
[5:26]मारफ ना कराई तो तो मैं हुज्जत वक्त को जो तेरी तरफ
[5:32]हुत है उसको नहीं पहचानू फिर क्या कहते अल्ला हुत का अपनी
[5:35]हुज्जत इमाम व की मफत करा फ कालम कानी यह नहीं कहा
[5:46]के मैं थोड़ा सा आगे पीछे हो जाऊंगा अगर हुत वक्त की
[5:53]मफत ना कराई खुदा ने व असबाब मोया ना किए और असबाब
[5:55]मुहैया किए और मैंने इमाम जमाना की मफत हासिल ना की तो
[6:01]लल तो अनी मैं गुमरा हो जाऊंगा अपने दन से बे बहरा
[6:05]हो जाऊंगा सिरात मुस्तकीम से दूर हो जाऊंगा यानी इमाम की मफत
[6:09]इमाम की याद इमाम का जिक्र इमाम का तस्करा दर हकीकत मुझे
[6:15]दीन से करीब तर करने के लिए दरूद भेज मोहम्मद ले [संगीत]
[6:24]मोहम्मद मेरे अहद को पूरा करो खुदा काद क्या है अल्ला क्या
[6:31]हम उसके अलावा किसी और की इबादत ना करें उसके साथ किसी
[6:35]को शरी करार ना दे और उसके जो रसूल किताब लेकर आया
[6:41]उससे मा कबल जो अंबिया किताब लेकर आए शरीयत लेकर उन पर
[6:44]ईमान और फिर रसूल जो कुछ भी हमें दे उस पर ईमान
[6:50]और फिर यहीं से विलायत अली ने अबी तालिब तारी सलाम की
[6:59]तरफ मुतजेंस यह कौन सा आयत है कि जिसके लिए हम रोजाना
[7:02]कहते अल्लाहु इनी उदा अल्लाह मैं रोजाना नमाज फजर के बाद तज
[7:10]दीद बत करता हूं तजी अहद करता हूं कौन सा अहद है
[7:15]यह जो जियारत सरदा इमाम जमाना में हम पढ़ते हैं जब आप
[7:22]इंशाल्लाह तशरीफ ले जाएंगे या तशरीफ ले गए होंगे तो वहां जो
[7:24]सरदा में तहखाने की जियारत है जो इमाम जमाना का घर था
[7:31]वालिद का वहां पर क्या पढ़ते हैं वहु इल का खुदा यह
[7:39]मेरा अहद है तेरी तरफ व मसा लद का और यह मेरा
[7:45]मिसाक है एक अहद पैमान है एक एग्रीमेंट है तेरी बारगाह में
[7:47]अबलो नफसी क्या वह अहद है क्या वह पैमान है क्या वह
[7:54]एग्रीमेंट है जो अल्लाह ने हमसे आलम अरवा में लिया था आलम
[7:56]जर में लिया था वहु यह मेरा अहद है और मेरा मिसाक
[8:01]है और मैं इस पर पाबंद हूं व क्या है अब नफसी
[8:06]के मैं अपनी जान को फिदा करूं व माली और अपने माल
[8:12]को फिदा करू वल्दी अपनी औलाद को फिदा करू व जमी मलने
[8:15]रबबी बन यद कि जो कुछ भी अल्लाह ताला ने मुझे अता
[8:25]किया है मैं इमाम इमाम वक्त के लिए उसको निसार करूं इमाम
[8:28]वक्त के लिए उसको पेश करूं बस यह वो अहद है कि
[8:35]जिसमें हर मुंतज अपना अपनी जान अपना माल अपनी औलाद अपनी इज्जत
[8:40]अपनी आबरू जो कुछ भी उसके पास है उसे इमाम वक्त के
[8:45]लिए फिदा करें और यह वह मौजू है जिसकी तरफ हमें तवज्जो
[8:51]देने की जरूरत है यानी हमारे पास जो कुछ भी है जाहिरी
[8:55]व बातिन जो कुछ भी सलाहियत है हमारे पास वो दर हकीकत
[8:59]क्या है है वो हमें अपने इमाम वक्त के लिए फिदा करनी
[9:04]है अगर मैंने अपनी उम्र का सरमाया जाहिरी और बानी नेमतें यह
[9:08]आंख यह कान यह जबान यह हाथ पैर यह स्किल यह सलाहियत
[9:13]ये काबिलियत यह सोच ये फिक्र ये अकल यह कल्ब यह सरमाया
[9:19]यह पैसा यह घर यह बार जो कुछ भी मेरे पास मौजूद
[9:24]है अगर मैंने अपने इमाम वक्त के लिए उसे खर्च ना किया
[9:26]तो यह इंतहा घाटे का सौदा होगा यानी मेरी जिंदगी गुजर जाए
[9:31]और अपने इमाम के लिए खर्च ना करो मिल के दरूद भेजिए
[9:35]मोहम्मद ले मोहम्मद पर इसलिए कि दो विलायत हैं इस कायनात में
[9:41]यह अल्लाह की विलायत है और अल्लाह की विलायत हट जाएंगे तो
[9:46]शैतान की विलायत है अल्लाह लीमन अल्लाह वली है ईमान लाने वालों
[9:55]का सरपरस्त है जो उनको मुसलसल निकालता है तारी कियों से नूर
[9:58]की तरफ दूसरी ला कौन सी है लिया व ता गूत की
[10:07]सरकश अफराद की तुन गर की विलायत है य मनन व बरक्स
[10:12]काम करते हैं वह नूर से निकालकर तारी की तरफ ले जाते
[10:19]हैं पस एक मोमिन विलायत इलाही के तहत और विलायत इमाम के
[10:23]तहत जिंदगी गुजारता है यानी अगर वह इमाम तक पहुंच जाए ऑटोमेटिक
[10:26]खुदा तक पहुंच जाता है माना में इमाम की मफत खुदा की
[10:33]मारफ इंशाल्लाह फिर जब जिक्र आएगा तो अर्ज करूंगा लिहाजा हमें इमाम
[10:40]की याद को जिंदा रखना चाहिए और आपकी खिदमत में अर्ज करूं
[10:45]क्यों ताकि हमारी ये सलाहियत है रुद हासिल करें जिस तरह हम
[10:49]कहते हैं जनाब हमें पैसा रखवा चाहिए ताकि यह रुद करे ये
[10:55]तरक्की करे इसमें इंक्रीमेंट हो इसमें मुनाफा हो इसमें फायदा हो उसी
[10:59]तरीके से जब तक हम अपना सब कुछ जाहिरी व बानी नेमत
[11:05]इमाम को अता नहीं करेंगे उसमें तरक्की नहीं आ सकती यानी वह
[11:08]नेमत वह जिंदगी जो इमाम के लिए खर्च ना हो वह हलाक
[11:15]बर्बादी है व हलाक तो बर्बादी है क्यों क्योंकि व अ नसी
[11:23]व माली व जमी र जो कुछ भी अल्लाह ने मुझे दिया
[11:29]है जान माल इज्जत आबरू टाइटल जो कुछ भी अल्लाह ताला ने
[11:32]दिया है मुझे खर्च करना है इमाम जमाना के लिए और अगर
[11:36]ना करूं तो यह घाटे का सौदा है खुदा आलम कुराने करीम
[11:42]में इशाद फर न [संगीत] सत रसूल आप इनसे सदका लीजिए य
[11:51]जो कुछ खर्च कर रहे हैं जो कुछ अपने खुदा की बारगाह
[11:53]में रसूल की बारगाह में इमाम की बारगाह में दे रहे हैं
[11:59]आप इनसे ले लीजिए तोरो इनको पाक कीजिए व तोहा और इस
[12:05]सदके के जरिए से इनकी इनके सरमाए को ज्यादा कीजिए रु दीजिए
[12:09]कहते हैं के एक शख्स उसने इमाम रज सलाम को त लिखा
[12:14]इमाम र रासन में मौजूद थे और वहां पर उसने लिखा कि
[12:18]म मैं खुम्स देना नहीं चाहता इमाम आप मुझे इजाजत दीजिए कि
[12:24]मैं खुम्स ना दू व इमाम रज सलाम ने को तीन चार
[12:28]पांच सत्रों की एक हदीस देखिए जुमला लिखा है जिससे कुछ जुमला
[12:31]आपकी खिदमत में अर्ज कर रहा हूं इमाम को हमारे खम की
[12:38]जरूरत नहीं है इमाम का हाथ दरह खुदा के हाथ का मिस्क
[12:41]है लिल्ला खदा समावा ल खुदा के लिए है यानी दर हकीकत
[12:48]वो इमाम से मुत्त सिल है इमाम के इख्तियार में खज जमीन
[12:55]और आसमान और यह वजह है कि मुख्तलिफ आइमा के यूं कहूं
[12:57]के वाकत हमें करामात हमें मिलती है कि जिसमें उन्होंने बताया कि
[13:05]दुनिया और जो कुछ भी हमारे खर में है हत्ता कि इमाम
[13:07]जाफर साद [संगीत] सलाम ने एक खत खीचा जमीन पर तो जमीन
[13:22]श काफ्ता हो गई आयतुल अंसारिया ने यह वाकया अपनी किताब में
[13:25]लिखा है तो उसमें से सोने की ईंट जो है वह ऊपर
[13:31]आई जमीन से एक फीट डेढ़ फीट दो फीट ऊपर आई तो
[13:32]रावी ने उसको उठाया इमाम ने कहा नीचे देखो जब उसने नीचे
[13:40]देखा तो मजीद इसी जैसे अनगिनत जिसे शमार नहीं किया जा सकता
[13:47]ईट सोने की मौजूद इमाम नेय जाहिरी चीज हैं जब इमाम तशरीफ
[13:51]लाएंगे जो कहते समीन सोना उगले गी उसकी हकीकत भी यही है
[13:59]कि जमीन अपने खजनों के दरवाजे खोल देगी ला समा अल्लाह के
[14:02]लिए जमीन आसमान ाने और वह उस वक्त के वली और इमाम
[14:07]के हाथ में होते हैं इमाम को हमारे माल की जरूरत नहीं
[14:14]है अब इमाम रज का जुमला सुनिए फरमाया के वला अना इससे
[14:17]रोको नहीं को देने से ला और अपनी दुआओ से हमारी दुआओ
[14:25]से खुद को महरूम ना करो जब तुम हमारे लिए कोई चीज
[14:27]देते हो हमारा कोई अदा करते हो हमारे लिए कोई काम अंजाम
[14:31]देते हो हम तुम्ह दुआए देते हैं फला हमारी दुआ से को
[14:38]महरूम ना करो फराज का देना मिता तुम्हारे रि में बरकत सबब
[14:47]है वत और तुम्हें तुम्हारे गुना से पाक करना है ल मुस्लिम
[14:54]मनय फला मा मुस्लिम वह है तस्लीम होने वाला वह है कि
[14:58]जो कुछ अल्लाह से उसने अहद किया है उसे पूरा करने वाला
[15:06]है वले मुस्लिम मन अजा बन बिल क ऐसा नहीं कि मुसलमान
[15:09]व है जो जबान से तो क हा मैं शिया हूं मैं
[15:13]इमाम को मानता हूं लेकिन दिल से रूह से तस्लीम ना करे
[15:17]अल मुक जिल्द नंबर एक और सफा नंबर 283 में यह रिवायत
[15:25]मौजूद है तो इमाम जमाना के लिए हाता के है कि अगर
[15:27]आपके कारोबार बरकत ना हो शख्स था वो एक आलिम दन के
[15:32]पास गया एक वली उल्लाह के पास गया आरिफ के पास गया
[15:37]कि कारोबार बरकत नहीं उन्होंने कहा देखो अपने कारोबार का एक हिस्सा
[15:40]5 फीसद 10 फीसद जो कुछ भी है वह अपने इमाम के
[15:45]साथ शराकपुर के फतवा के मुताबिक अपनी बिजनेस ट्रेड को अंजाम देता
[16:02]है और जब उसका वो मुनाफा उसके हाथ में मिलता है तो
[16:08]उसने जितना अहद किया था इमाम से उसको इमाम की राह में
[16:13]खर्च करता है चुना चा कहा कि कुछ अर्से बाद उसके माल
[16:18]में बहुत बरकत होने लगी क्यों क्योंकि इमाम को शरी करार दिया
[16:20]है फिर अपनी नियत पर कायम र मिल के दरूद भेज मोहम्मद
[16:25]वा आले मोहम्मद अला सल्ले अला महम्मद [संगीत] लिहाजा ये वो चीज
[16:33]है कि जिसकी तरफ हमें मुत वज्ज रहना चाहिए कि इमाम की
[16:37]मफत कई मक पर मैंने यह जुमला पेश किया था मोमिन की
[16:44]खिदमत में शायद बहुत से लोगों को हदम नहीं हो सका यह
[16:45]बात क्या कह रहे हैं कि जितनी नमाज हम पर वाजिब है
[16:50]जितना रोजा हम पर वाजिब है जितना खुम्स जकात हम पर वाजिब
[16:56]है अपने अपने शराय के साथ उससे ज्यादा मुझ पर मेरे इमाम
[17:03]जमाना की मारफ वाजिब है यह बात क्या कह रहे नमाज से
[17:11]ज्यादा वाजिब नमाज तो आप पढ़ते ही है रोज तो आप रखते
[17:12]ही है अगर हज के असबाब है तो आप हज करेंगे खस
[17:17]जकात देंगे जो वाज बात दीनी है फर दन में व अंजाम
[17:23]देंगे उससे ज्यादा आपने जो तग दौ करनी है व मारफ इमाम
[17:27]के लिए करनी है पस अगर मारफ इमाम ना हो तो वो
[17:33]रिवायत मैंने अर्ज की ल तो अनी ये नहीं हो बे नमाज
[17:34]हो जाऊंगा ये नहीं होगा मैं बेरोजा हो जाऊंगा यह नहीं होगा
[17:39]कि मैं नमाज और रोज को अहमियत नहीं दूंगा बसा औकात बहुत
[17:41]सारे लोग हैं जो नमाज और रोजा को अहमियत दे रहे होते
[17:45]हैं शियो में लेकिन इमाम की मफत से बे बहरा होते हैं
[17:49]इमाम की मफत को हासिल नहीं कर पा रहे होते पस इस
[17:54]बना पर लाल तो यानी दन मेरे हाथ से निकल जाएगा असल
[17:56]दन इमाम की मफत से [प्रशंसा] मरबूपल्ली जि दारी थी कि वह
[18:31]अपने इमाम को कैद से आजाद कराए वह इमाम के हाथ बायत
[18:34]करें व इमाम के लिए अपनी जान माल इज्जत आबरू सबको निसार
[18:39]करें इमाम की खिदमत मौला ये जान माल इज्जत आबरू स्टेटस जब
[18:47]जो कुछ भी है सब आपके लिए लेकिन हम में और 11
[18:51]ममा के जमाने के श फर्क यह है कि हमें इमाम के
[18:55]जुहूर के लिए राह हवार करनी है यानी शरन हम पर लाजिम
[19:02]और जरूरी है कि हम इमाम जमाना के जुहूर के लिए राह
[19:09]अवार करें अगर हम यह काम ना करें तो हम खुदा की
[19:09]बारगाह में मसूल होंगे जवाब दे होंगे गुनाहगार होंगे कि तुम्हारा इमाम
[19:19]पर्दे गैब में था जिस तरह इमाम सज्जाद के जमाने के शिया
[19:22]अगर थे तो उनकी जिम्मेदारी थी कि इमाम को कैद बंद से
[19:28]आजाद कराए इमाम मूसा कादिम के शियों की जिम्मेदारी थी कि इमाम
[19:31]को कैद बंद से आजाद कराए क्यों ताकि इमाम अपनी इमामत को
[19:37]आद तौर पर अंजाम दे सके जिस तरह मौला कायनात की शयो
[19:43]की जिम्मेदारी थी कि मौला कायनात के हाथ ब बायत करें और
[19:46]उस पर कायम रहे जैसे कि 111 असब मौजूद रहे और कायम
[19:51]रहे इसी तरह इमाम हसन इमाम हुसैन तमाम आइमा के लिए लेकिन
[19:53]मुझ में और दूसरे आइमा के जमाने के शियो में फर्क ये
[19:59]है कि मुझे वो असबाब फराह करने हैं कि जो इमाम की
[20:04]गैब को खत्म कर सके यह वह चीज है कि जिसकी तरफ
[20:09]हमारी तवज्जो नहीं है और यही वजह है कि चूंकि हमारी गाड़ी
[20:11]चल रही है इमाम के तवस्सूल से इमाम की दुआओं से हमारी
[20:16]जिंदगी हमारी जॉब लिहाज हमें बहुत ज्यादा कोई फिक्र नहीं होती है
[20:18]इमाम अगर 2000 साल भी ना आए तो हम कहते हैं जनाब
[20:23]हमारी गाड़ी हमारी रोजी रिजक चल रहा है लिहाजा खुशियां है गम
[20:28]है आसान है परेशानी है जॉब है इंक्रीमेंट सब कुछ है हमें
[20:31]कोई फिक्र नहीं है हालांकि यह नुक्ता बहुत अहमियत का आमिल है
[20:38]कि हमें इमाम जमाना की मारफ के साथ उनके जुहूर के लिए
[20:40]राहे हवाल करनी है मिल के दरूद भेजिए मोहम्मद वा आले मोहम्मद
[20:48]अब यहां प मैं कुछ अहा दीस आपकी खिदमत में पेश करना
[20:52]चाहता हूं एक दफा मिल के दरूद भेजिए मोहम्मद वा आल मोहम्मद
[20:54]अल्लाहुम्मा सल्ले अला महम्मद [संगीत] इमाम बाक सलाम कहते कि इनमाला मला
[21:08]अबू हमजा कहते हैं कि इमाम ने मुझसे कहा के अल्लाह की
[21:14]इबादत सिर्फ वही करेगा जो अल्लाह की मारफ पहचान रखता हो मलाला
[21:21]माया दलाल अल्लाह की मारफ हासिल के बगैर इबादत करेगा बंदगी करेगा
[21:29]वो सिर्फ गुमराही में इजाफा करेगा कुछ नहीं करेगा अंधेरे में तीर
[21:32]चलाएगा कुल तो मैंने कहा जोतो फिदा का मौला मैं आप पर
[21:38]कुर्बान हो जाऊं यह बताइए कि फ मारला अल्लाह की मारफ क्या
[21:43]है कैसे पहचाने अल्लाह की मारफ को काला इमाम ने फरमाया इमाम
[21:46]बाकर ने तल्लाह अज वजल अल्लाह की वहदा नियत की तस्दीक उसकी
[21:52]बारगाह से आने वाली किताबों रसूलों की तस्दीक वीक रसूल ही आखरी
[21:58]नबी की तस्दीक व मुवाला और मौला अली की विलायत की तस्दीक
[22:04]तमाम बही और उस पर कायम रहना उसका दरह ख्याल रखना ल
[22:13]हुदा और आ खुदा की विलायत का एहतमाम करना और उस पर
[22:19]कायम दम रहना अमलन ना न ल बरा तो इलाज म और
[22:29]अहले बैत मोहम्मद आले मोहम्मद के दुश्मनों से बरात अमली तौर पर
[22:35]यह वह चीज है कि जिसकी वजह से अल्लाह की मारफ हासिल
[22:37]होती है इमाम हुसैन से पूछा गया कि अल्लाह की मफत क्या
[22:42]है इमाम ने कहा इमाम वक्त की मारफ तवज्जो किया आपने इमाम
[22:47]वक्त की मफत को कहा अल्लाह की मफत और यही वजह है
[22:54]कि इस इस मफत में छूट नहीं है कोई रुख नहीं है
[23:00]कोई वेकेशन नहीं है जैसे कि अब सर्दी की छुट्टिया आ गई
[23:06]है अब मसलन बच्चे आजाद हैं यह जो गबतला नहीं हुआ है
[23:13]फ्री टाइम नहीं मिला है तीन क्लासों के बाद आपको जो चाहे
[23:18]बच्चे उछल कुछ जिस तरह स्कूल में कर रहे होते हैं शयों
[23:19]को आजाद कर दिया जाओ भाई 11वी माम की शहादत से लेकर
[23:23]जहूर तक तुम्हारे इंटरवेल है जो चाहे करो नहीं वेकेशन नहीं है
[23:26]छुट्टी नहीं है ताती नहीं है बल्कि कारखाने कुदरत चल रहा है
[23:34]हजरत इमाम मोहम्मद बाक सलाम इरशाद फरमाते हैं इलाम इस्लाम की बुनियाद
[23:43]पांच है काम सलात ता जका व हजल बैत व श रमजान
[23:50]ल विलायत बत नमाज कायम करना जकात अदा करना तवाफ काबा यानी
[23:53]हज अंजाम देना और माहे रमजान के रोजे और हम अहले बैत
[23:58]की विलायत त रखिएगा पाच चीज फला फ चार जो है उसम
[24:07]रुखसत मौजूद है मस नमाज अगर आप खड़े होकर नहीं पढ़ सकते
[24:11]बैठ के पढ़े बैठ के नहीं पढ़ सकते लेट के पढ़े लेट
[24:12]के नहीं पढ़ सकते नमाज माफ नहीं है नमाज में रुखसत आसानी
[24:18]दी गई है कंसेशन किया गया आपको कि अगर इस तरह नहीं
[24:23]इस तर अदा कीजिए इस तरह नहीं इस तर छूट नहीं है
[24:24]यानी बिल्कुल आप नमाज माफ हो गई नहीं पहली चीज हो गई
[24:28]मलम य वलयाल फल विलाया रतन और विलायत अले बैत में मफत
[24:36]अले बैत में उनकी विलायत से जुड़ने के मरहले में खुदा ने
[24:43]कोई उर गुंजाइश नहीं रखी हर हालत में वाजिब है लम माल
[24:48]लमका जिसके पास माल नहीं है मवेशी नहीं है चौपाई नहीं है
[24:53]ऊंट बकरी और भेड़ नहीं है उस पर जकात भी नहीं है
[24:57]सोना चांदी अपने अपने निसाब के मुता नहीं उस पर जकात भी
[24:59]नहीं है जिसके पास माल नहीं है फ उसके लिए हज भी
[25:05]नहीं है मन काना मरीन सला कान रमन अगर कोई मरीज है
[25:11]तो उस पर अल्लाह ने रोज माफ कर दिए और इसी तर
[25:16]जो मुसाफिर है उसको और मरीज को कहा कि तुम रोजा छोड़
[25:22]सकते हो इ शराय की बना पर जो मुत अपनी में लिखी
[25:27]है वल विलायत सहीन काना मरीन ला माल फला मत वाबा लेकिन
[25:34]विलायत वह है जो सेहतमंद पर भी वाजिब है मरीज पर भी
[25:41]वाजिब है मुसाफिर वतन में हो या वतन से बाहर हो उस
[25:43]पर भी वाजिब हो जो गरीब हो उस पर भी वाजिब है
[25:46]जो मालदार हो उस पर भी वाजिब है इमाम कहते इसमें कोई
[25:54]छूट नहीं है इमाम की मारफ इमाम की पहचान कि हम व
[25:58]असबाब मुहैया करने हैं कि जो इमाम जमाना के जहूर को करीब
[26:04]कर सके मिल दरूद मोहम्मद ले मोहम्मद पर फजल बिन य सार
[26:13]कहते हैं के इमाम जाफर साद से इस आयत की तशरीफ नामा
[26:20]सर बनी राल नंबर 71 कि हम हर शख्स को उसके इमाम
[26:26]के साथ बुलाएंगे इम ने फरमाया या फजैल रफ इमामा का अपने
[26:34]जमाने के इमाम वक्त को जो हुज्जत खुदा है उसे पहचानो फमा
[26:44]अगर तुमने अपने जमाने केम को पहचान लिया तुमहे जिस आलम में
[26:50]मत है कोई मसला नहीं है इमाम का जहूर हो ना हो
[26:55]तुमने अगर इमाम को पहचान लिया तुम कोई मसला नहीं होगा मन
[27:01]इमाम मा क एक श इमाम की मफत हासिल करे कबल इसके
[27:06]इमाम जमाना जुहूर फरमाए कायम कयाम करें काना मज मन काना ऐसा
[27:14]ही है जैसे व इमाम के लश्कर में मौजूद था इमाम की
[27:19]मफत के साथ मैं मर गया अभी तो कोई ऐसा ही जैसे
[27:24]मैं मेरा गुफ्तगू करना मेरा गुफ्तगू दर्स देना आप अगर मफत रखते
[27:26]आपका यहां बैठना ऐसे ही है जैसे मसल 500 साल बाद 200
[27:32]साल बाद 10 साल बाद 20 साल जब भी इमाम का जहूर
[27:36]होगा आप और मैं उन मुजाहिद के बराबर होंगे जो इमाम के
[27:38]साथ तलवार चला रहे हैं कितना सखत मरहला है कितनी नजाकत हसास
[27:44]यत है कि मैं उस मुजाहिद के बराबर हूं क्योंकि मैंने अपने
[27:48]इमाम को पहचान जब इमाम को पहचान लि मैं खामोश नहीं बैठूंगा
[27:52]मैं हाथ पर हाथ रख के नहीं बैठूंगा बल्कि मैं इमाम के
[27:57]लिए इमाम के जुहूर के लिए उनके मदमा साजी करूंगा जमीन हवार
[28:00]करूंगा इसको मैं पहले बता चुका हूं कि हमारी जिम्मेदारी दूसरे जमाने
[28:06]की श से बहुत बढ़कर है कि मुझे मुकदमा फराम करना इमाम
[28:09]के लिए हाथ हार नहीं बैठल फ मौला आ जाइए मौला आ
[28:13][संगीत] जाइए अजल फरज अगर नस हो जल्दी कीजिए अजल फरज हुम
[28:20]यानी दर हकीकत क्या करें मौला के जहर में ताखी कर दे
[28:26]खुदा फासला डाल दे कहते हैं एक अरब जो है एक जगह
[28:31]ऐसी आया जहां पर लोग का तलफ सही नहीं था व जो
[28:33]लोग थे उनकी अरबी सही नहीं थ कहते ल फर अजल हमजा
[28:38]से अजल अजल जिसको कहते हैं वक्त मख सूस जिसको कहा जाता
[28:43]है अजल मौत को कहा जाता है तो नाराज हुआ बड़ा गुस्सा
[28:48]हुआ किय कैसे शिया है इमाम को पुकार भी र कह रहे
[28:49]खुदा इनके जर में तार कर उसका भाई य इतनी अरबी नहीं
[28:54]जानते हैं अजल का मतलब य हैल फरज तो मुझे मु कमात
[28:59]फराम करने हैं इमाम ने फरमाया कि अगर तुमने इमाम को पहचान
[29:02]लिया और तुम मर गए या हर वो शख्स जिसने इमाम की
[29:07]मारत हासिल कर ली कि मेरी क्या जिम्मेदारी है और वो मर
[29:12]गया इमाम जमाना के कयाम से पहले गोया ऐसे ही है जैसे
[29:14]जिस तरह इमाम के सहाबी और मुजाहिद इमाम के लश्कर और अस्कर
[29:20]में तलवार चला रहे हैं तुम्हें भी वह सवाब मिलेगा बल्कि इमाम
[29:24]ने कहा ला बल नहीं इतना सवाब नहीं मिलेगा उससे ज्यादा सवाब
[29:32]मिलेगा बल मन तावा जैसे वह इमाम के परचम के नीचे इमाम
[29:40]के करीब तरीन अफराद में शामिल हो खुसूसी तरीन अफराद में शामिल
[29:47]हो अब पता चला के मफत इमाम कितनी वाजिब मिल के दरूद
[29:52]भेज मोहम्मद ले मोहम्मद [संगीत] परह अगर इसका मैं आपको हवाला दे
[30:04]सक उसूल काफी जिल्द नंबर दो किताब हुज्जा बाब अ मन इमाम
[30:08]और दूसरी रिवायत है यह भी छठ इमाम से उस काफ जि
[30:12]नंबर एक बाबल हुजा बाब मफत इमाम व इमाम की मारफ का
[30:19]हुसूल उस बाब में इमाम ने फरमाया इनकम तलात तुम कभी नेक
[30:28]बन नहीं सकते कभी नेक नहीं बन सकते मगर उस वक्त तक
[30:35]कि जब तक तुम्हें इमाम की मफत ना हो मफत होगी तो
[30:36]नेक होग मफत होगी तो छोटा अमल भी कबूल हो जाएगा वला
[30:43]ताता और उस वक्त तक तुम्हें मफत नहीं आएगी जब तक तुम
[30:50]तस्दीक ना करो कल्बन लिसानन व अमलन और फरमाया ला तो स
[30:57]तो सल्लिम तुम उस वक्त तक तस्दीक नहीं कर सकते कि जब
[31:08]तक तुम हकीकी माना में तस्लीम ना हो जाओ कबूल ना कर
[31:11]लो दिल जान से खुदा की वहदा नियत उसके उसूलों को रसूल
[31:17]के रिसालत को और अहले बैत के फरामीर उनकी विलायत को मुकम्मल
[31:25]तौर पर तस्लीम होना है जिसमें चुआ चरा और क्यों और किस
[31:29]लिए और कितना और कब और कैसे इसकी गुंजाइश नहीं मिल दद
[31:33]मोहम्मद ल मोहम्मद रिवायत बहुत सारी है सिर्फ कहने का अर्ज करने
[31:45]का मकसद यह है के यह वह चीज है कि जो हमें
[31:51]मुत करती कि हमारी जिंदगी आदी जिंदगी ना हो हमारी जिंदगी रूटीन
[31:55]लाइफ वाली जिंदगी ना हो बल्कि में इमाम असर को याद किया
[32:00]जाए इमाम जमाना को याद किया जाए और आपकी खिदमत में अर्ज
[32:10]करूं के सिर्फ याद करना नहीं है सिर्फ सलाम देना नहीं है
[32:14]इमाम को सलाम अले सला शरीरा बल्कि दिल से इमाम को याद
[32:17]किया जाए यानी नमाज के बाद दर हकीकत इमाम वक्त को सलाम
[32:24]देना नमाज की मफत में इजाफा करता पस मुझे दूसरे जमाने की
[32:35]शियों से ज्यादा इमाम के लिए काम करने की जरूरत है उनकी
[32:38]जिम्मेदारी थ कि इमाम के हाथ बायत करें तस्दीक करें सा अगर
[32:44]इमाम कैद में है तो उसकी रहाई का इंतजाम करें ताकि इमाम
[32:50]अपने अम इमामत विलायत को जारी सारी कर सके क्योंकि अगर लोग
[32:52]साथ नहीं दे रहे तो इमाम भी जबरदस्ती त नहीं करता जो
[33:00]द इमाने हता तो उसके यानी लोग उनको कबूल कर सके जबरदस्ती
[33:11]खुद अपनी हुज्जत को मुसल्लत नहीं करना जाता लोग मुसल्लत खुदा मुसल्लत
[33:16]नहीं करना चाहता त तुमा यानी दिल जान से इमाम को चाहे
[33:23]आहिस्ता आहिस्ता अजने गिरामी व मफत के असबाब पैदा होते चले जा
[33:33]रहे हैं दुनिया किसी ना किसी नुक्ते पर आगा और बेदार होती
[33:36]चली जा रही है यह जालिम को जालिम मजलूम मजलूम कहने जो
[33:41]आज हमें तूफान अकसा के बाद नजर आ रहा है यह दर
[33:46]हकीकत इमाम जमाना के मुकद्दमा से जुहूर और फरज को फराह करने
[33:54]के असबाब में से एक सबब है कि लोग पहचान हासिल करें
[33:59]मफत हासिल करें यानी यही अमेरिका यही ब्रितानिया और यही यूरोप क्या
[34:04]आज से 10 साल और 15 साल कब्लर कर सकते थे कि
[34:11]कोई इनके मुमा में खड़े होकर अमरकी अ हुकूमत के खिलाफ या
[34:15]सहय और इसराइली हुकूमत के खिलाफ नारे लगाएगा असा तसव्वुर नहीं कर
[34:19]सकते थे तसव्वुर में नहीं था कि कोई जो है लेकिन आज
[34:23]हो रहा है क्यों हो रहा है इसलिए हो रहा है कि
[34:29]वो लोग मुत वज्जे है कि यह जुल्म है जब जुल्म है
[34:30]तो फिर लोग उसके खिलाफ उठ खड़े हुए चाहे वो किसी भी
[34:34]सता का हो चाहे वो सिर्फ बच्चों के लिए क्यों ना हो
[34:38]चाहे वो सिर्फ इंसानों के लिए क्यों ना हो चुना इस चीज
[34:39]को मद्देनजर रखें के आहिस्ता आहिस्ता असबाब पैदा हो रहे हैं अब
[34:45]यह बेदारी और जिम्मेदारी जितनी बढ़ती चली जाएगी उतने ही इमाम का
[34:53]जहूर करीब तर होता चला जाएगा और आखिर में सिर्फ एक बात
[34:58]कह उधर जाऊ बस हमारी जिम्मेदारी यह है कि हम इमाम जमाना
[35:02]की याद को कि जिस जैसे कि वोह फरीजा हम पर आयद
[35:08]होता है हम याद करें जिंदा करें माश में फैलाए इमाम की
[35:11]याद और जिक्र के साथ जिंदा करें या आमन माने अल्लाह उसके
[35:22]रसूल की दावत पर लब्बैक हो ताकि तुम्ह हयात दे बस अल्लाह
[35:25]उसके रसूल और की दावत पर लब्बैक कहना उनका तस्करा करना उनकी
[35:31]याद मनाना उनके लिए फर्श अदा बेना उनकी अजादारी करना उनके अमर
[35:38]का अया करना यानी हिदायत का इंतजाम करना अम अमा क्या हिदायत
[35:42]है इंसानियत का इंतजाम करना खुद समेत वो क्या है वो अम
[35:48]आइमा है यह वो चीज है जिसकी तरफ हमें मुतजेंस जाऊ लेकिन
[35:58]अगर मेरी नमाज मेरा रोजा मेरा हज मेरा जकात मुझे इमाम से
[36:02]मुत्त सिल ना करे इमाम की निस्बत जो मेरी जिम्मेदारियां आयद होती
[36:09]हैं उसकी अदायगी की तरफ मुझे मुझ में संजीदगी लेकर ना आए
[36:12]इसका मतलब है कि मेरी नमाज नमाज नहीं है मेरी मेरा रोजा
[36:17]रोजा नहीं है हत्ता कि मेरी अजादारी अजादारी नहीं है क्योंकि अजादारी
[36:21]इमाम हुसैन अल सलाम को लिया जाए तो इमाम हुसैन अल सलाम
[36:28]को आपकी अजादारी में इमाम जमान को शरीक किया गया है ऐ
[36:34]खुदा मुझे उसके साथ मुजाहिद बना जो खून हुसैन का इंतकाम लेगा
[36:37]हत्ता कि आशूर के दिन उलमा कहते हैं सलाम ना करें आप
[36:42]अगर कोई सलाम कर ले तो कोई मसला नहीं लेकिन ताजि अत
[36:46]पेश करें ताजि अत पेश करें कि ऐ खुदा मुझे उस वली
[36:51]के साथ जिहाद और कयाम करने की तौफीक अता फरमा जो खून
[36:57]हुसैन का बदला लेगा यानी इमाम जमान के इंकलाब को इमाम हुसैन
[36:59]से और इमाम हुसैन की जियारत में इमाम जमाना को शामिल किया
[37:07]गया है कि लिहाजा मेरी अजादारी मुझे इमाम जमाना से मुत सिल
[37:10]करे लेकिन अगर मेरी अजादारी मुझे इमाम जमान मुत सल नहीं करती
[37:16]मेरी सीना जनी मेरी हायत मेरी यूं कहूं के मेरी अंजुमन मेरे
[37:19]मजय मेरी मजाल मेरे अशरे आपकी अजादारी आपकी शिरकत आपके जुलूस में
[37:26]जाना अगर आपको इमाम जमाना के लिए आमादा और तैयार नहीं करता
[37:29]तो सोचना होगा कि हमारी अजादारी अजादारी है हमारी नमाज नमाज है
[37:34]हमारा रोजा रोजा है इमाम ने कहा कि नमाज रोजे में छूट
[37:39]मिल सकती है लेकिन विलायत और मारफ इमाम में कोई छूट नहीं
[37:46]है कोई छूट नहीं है ख गरीब हो या अमीर हो मरीद
[37:50]हो या सेहतमंद हो तुम पर लाजिम है मारफ इमाम यानी नमाज
[37:54]उससे ज्यादा रोजा उससे ज्यादा तवज्जो रखिए क्योंकि रिवायत कनी अगर तूने
[38:05]मफत इमाम न दी मुझे तो मैं अपने दीन को गुमराह कर
[38:12]दूंगा यानी मैं दन छोड़ दूंगा दन मेरे हाथ से निकल जाएगा
[38:14]बस गरा यही वजह है कि जो दुआ पढ़ते हैं उसम जुमला
[38:20]है और आखरी जुमला आपकी खद अ करू और आपकी जहमत तमाम
[38:23]करूं के अगर तूने मौत इमाम जमाना के इंकलाब से पहले मुझे
[38:34]दे दी फ जलनी मुझे कब से ऐसे निकाल फ मन कबरी
[38:42]मरन कफनी अपने कफन को लपेटे हु शाहिर सफी अपनी तलवार को
[38:48]लहरा रहा हूं मुजर दन कनाती अपने नेजे की नोक को बहना
[38:57]किया हुआ उस पर लाफ नहीं मुल बयान दावत फिलहा इमाम जमाना
[39:03]की सदा पर लबैक कता गांव में हू देहात में ह शहर
[39:11]जहां कहीं य दो जो है शाहिर सफी व मुजर दन कनाती
[39:16]के नेजा उसकी नोक बरना हो तलवार हवा में लहरा हो आया
[39:23]इससे मुराद कोई तलवार रखी जाती है कबर में अला कब मेरे
[39:29]कबर से निकालना तो आप में से कोई वसीयत करके जाता कि
[39:31]तलवार और नेजा मेरी इमाम के हमराही के लिए रख देना यह
[39:37]कहां से आ जाएगी तलवार कहां से आ जाएगी नेजा कहां से
[39:44]आ जाएगा आया इमाम नेजम से जंग करेंगे या जमाने की टेक्नोलॉजी
[39:49]से जंग करेंगे इमाम फूको से जंग नहीं करेंगे इमाम करमात से
[39:53]जंग नहीं करेंगे हां खुदा की करामात खुदा के मोज उनके साथ
[39:58]होंगे लेकिन इमाम अगर खुदा ही को सब कुछ करना होता तो
[39:59]अब तक जुहूर हो चुका होता इमाम का इतना कत गारत हुआ
[40:03]है और इतना जुल्म सतम हुआ तारीख में अब तक हो जाता
[40:08]तो अगर खुदा ही ने करना था तो खुदा कर देता नहीं
[40:14]लिहाजा यह जो कहा कि कब्र में मेरा तलवार रख देना जब
[40:20]मैं तल कब्र से उठूं तो मेरी तलवार मेरे साथ हो मेरा
[40:24]नेज मेरे साथ हो क्या मतलब है इसका यह नेज और तलवार
[40:28]से म वो नेजा और तलवार है क्या इमाम नेज तलवार से
[40:30]जंग करेंगे हरगिज नहीं इमाम अपने वक्त के असले के साथ जंग
[40:34]करेंगे तो यहां पर तलवार से क्या मुराद है या नेजे से
[40:35]क्या मुराद है तलवार मसलन 3 फीट की दो फीट की होती
[40:39]है सही है छोटी बड़ी हो सकती है यानी जो तलवार की
[40:43]रेंज में आए अब मिसाल के तौर पर अगर एक शख्स 10
[40:47]फीट 5 फीट के फासले से खड़ा है मैं तलवार से तो
[40:50]उस पर हमला नहीं करूंगा ना जो करीब आएगा वही तलवार की
[40:51]जद में आएगा जो तलवार के रेंज में आएगा वही उसका सर
[40:55]उड़ेगा लेकिन एक और होता जो नेजा कहलाता है नेजा क्या होता
[41:02]है मसलन 3 मीटर 4 मीटर का लंबा नेजा होता है इंसान
[41:04]के कस से बड़ा होता है यानी जो तलवार की रेंज में
[41:08]नबी आ रहा हो मैं नेजे के जरिए से क्या कर रहा
[41:12]हूं उसको हलाक करू कि जो दर हकीकत मुझे या मेरे इमाम
[41:18]को नुकसान पहुंचाने आ रहा है लिज तलवार और नेजा दो संबल
[41:20]है यानी एक छोटा असला और एक बड़ा असला असला क्या है
[41:28]कि जो आपको आपके इमाम के लिए मुफीद कामद बनाता है लिहाजा
[41:33]छोटे असले तलवार से मुराद शॉर्ट टर्म प्लानिंग है और नेजा बड़े
[41:41]असले से मुराद लॉन्ग टर्म प्लानिंग है तवील मुद्दत की मंसूबा बंदी
[41:45]है शॉर्ट टर्म यानी कसीर मुद्दत की छोटी मुद्दत की प्लानिंग है
[41:49]यानी मैं अपने इमाम जमान अल सलाम के लिए दो किस्म की
[41:55]प्लानिंग करार दूं एक शॉर्ट ट कि जो रोजाना की बुनियाद पर
[42:01]हो और एक लॉन्ग टर्म यानी मैं एक तवील मुद्दत के लिए
[42:03]क्या आइंदा 10 साल 20 साल 25 साल 30 सा जब तक
[42:07]खुदा ने मुझे हयात दी मैं जमाने के लिए काम करूंगा मैं
[42:11]अफराद को तैयार करूंगा मैं लोगों को तैयार करूंगा मैं इमाम की
[42:14]मारफ का पैगाम पहुंचा आंगा यह वह चीजें हैं जो मेरे साथ
[42:20]मेरी रूह के साथ जाएंगी और यही व चीजें हैं जो इमाम
[42:26]वक्त की नुसरत के लिए उस वक्त मेरे हाथ में एक असलहे
[42:27]की सूरत में मुझे दे दी जाएंगी कि अगर इंसान मर भी
[42:32]जाए तो उसे उठाया जाएगा कि क्योंकि तुम अपने जमाने में शॉर्ट
[42:37]टर्म और लॉन्ग टर्म के साथ इमाम की खिदमत करते थे जुहूर
[42:39]के लिए लड़ते थे और काम करते थे मेहनत करते थे अब
[42:42]तुमहे इमाम के लिए उठाया जा रहा वहां कोई तलवार और नेजा
[42:46]नहीं होगा कि उससे दिया जाएगा यह तलवार और नेजा संबल है
[42:49]अजने गिरामी याद रखिएगा एक अलामत है पस इमाम जमाना की याद
[42:54]नमाज और रोजा जो जकात से ज्यादा है कि यह मेरी नमाज
[42:59]को नमाज बनाती है एक और रिवायत में है इमाम से पूछा
[43:03]अल अहा अफजल इनमें अफजल तरीन कौन है इमाम ने कहा अल
[43:09]विलाया विलायत अफजल है कहा क्यों क कि विलायत है जो नमाज
[43:14]को नमाज बनाती है वाली है इमाम है जो तुम्हारी नमाज को
[43:17]कबूल करने का रोज को कबूल करने का हज जकात को कबूल
[43:21]करने का सबब बनता है यानी वो मेथड है वो मीडियम है
[43:25]जिसके जरिए से तुम्हारी इबादत अल्लाह की बारगाह में कबूल की जाती
[43:29]हैं अल्लाह ताला से दुआ है कि व हम सबको मफत इमाम
[43:33]नसीब फरमाए और हमें इस मारफ के साय में इमाम के जुहूर
[43:39]के लिए काम करने की तौफीक अता फरमाए वस्सलाम वालेकुम रहमतुल्लाह व
[43:50]बरका
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