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24- زکات کے مصارف اور زکات فطرہ - حجة الاسلام غلام قاسم تسنیمی
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زکات کو کهاں خرچ کرنا چاهیے؟ وه موارد جهاں پر زکات کو دیا جاسکتاهے. 1- فقیر, 2- مسکین, 3- زکات کو جمع اور سنبھالنے والا, 4- کافروں کو اگر زکات دینے سے وه لوگ مسلمان هوسکتےهیں, یا جنگوں میں مسلمانوں کی مدد کرسکتے هیں, 5- غلام کو آزاد کرنے کیلئے, 6- مقروض جس میں قرض چکانے کی سکت نه هو, 7- هر اس کام کیلئے که جو فی سبیل الله هے, 8- نادارمسافرکیلئے. مزید احکام زکات اور فطره کیلئے ملاحظه فرمائیے... حجة الاسلام غلام قاسم تسنیمی
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Transcript
[0:36]बिस्मिल्लाह रहमान है और इसके पीछे बहुत साड़ी हुकूमत है उनमें से
[1:07]एक हिकमत यही है की तबकाती निजाम ना होने चले जाए यह
[1:20]गरीब है उनका कोई परेशानी हाल ना हो उनका कोई पूछने वाला
[1:26]ना हो यह जकात हुकूमत इस्लामी को मदद करती है की वो
[1:28]गुरबत पर काबू का सके और लोगों के मिसाइल को बेहतरीन तरीके
[1:33]से हाल कर सके बयान हो चुका जरा आदमी से कर चीज
[1:44]हैं जिनके जकात वाजिद है और सोना हुई है मैं उसका क्या
[2:17]करूं इस हवाले से जो मावरे बताए गए हैं जहां पर रकत
[2:21]को खर्च किया जाए जो मसरख है जकात का वह आठ जगह
[2:30]पर जकात को खर्च किया जा सकता है जिसके पास साल भर
[2:48]के एक रजत एन हो एक साल गुजरते के एक रजत एन
[2:56]हो और ना ही उनके लिए उसके पास कोई कम हो कोई
[3:04]शुभ और पेशाब इन्हें एक रजत भी नहीं और वसीला एक रजत
[3:09]भी नहीं एक मर्तबा हो सकता है एक शख्स है जिसके पास
[3:12]साल भर के एक राजा तो नहीं लेकिन जो उसकी हर मा
[3:17]की धार्मिक है एक महीने की जो कमाई है उसके लिए पुरी
[3:21]होती है इसी तरह एक महीने की कमाई 1 महीने तक चली
[3:26]फिर दूसरा कमाया उसने ये उसकी जब है कोई सर्विस है कोई
[3:28]कोई भी पेस है हल उसके जारी से उसका खर्च पूरा हो
[3:35]जाता है अगर इस साल भर का पूरा खर्चा एक साथ उसके
[3:36]पास नहीं है लेकिन जो दरार होती जाएगी उसके लिए किफायत करती
[3:43]है उसे फिर कोई जरूर बाकी नहीं रहती जरूरी आते जिंदगी में
[3:49]से इस तरह है तो यह फकीर नहीं है जिसके पास साल
[3:54]भर का खर्चा भी ना हो एक रजत भी ना हो और
[3:59]वसीला भी ना हो अगर वसीला है भी तो किफायत नहीं करता
[4:04]यानी उसकी तनख्वाह इतनी नहीं है की उसके साल भर का खर्चा
[4:06]यह हर महीने जो तनख्वाह मिलती है उसे पूरा महीना उसका चल
[4:10]सके माल से कुछ ले सकता है दूसरे जकात का पैसा उसे
[4:16]दे सकते हैं जिसके पास साल भर का खर्चा ना हो वसीला
[4:34]अपना हो या वसीला हो तो किफायत ना करता हो लेकिन फकीर
[4:39]से ज्यादा बड़ा हाल है इसका भी कम तमाम रखना है उसकी
[4:52]ड्रामेट उससे भी कमतर है या तो बिल्कुल नहीं है अगर है
[4:57]भी तो फकीर से भी कम था उसे भी जकात दी जा
[5:04]शक्ति है और स्क्रीन के फॉर को इस तरह बयान किया है
[5:06]की फकीर उसे कहते हैं जिसके पास ना हो लेकिन वह शख्स
[5:15]है और सवाल नहीं करता लोगों से हाथ नहीं फैलता किसी के
[5:19]आगे और बहुत अच्छी सिफत है नहीं इसलिए उसने इस्लाम ने उम्र
[5:46]को किया है पाबंद बनाया है की वह इस तरह के लोगों
[5:48]को ख्याल करें और अगर उनकी मदद करना भी चाहे तो इस
[5:53]तरीके एहसान जाते जाए उसकी शख्सियत को खराब किया जाए उसकी इज्जत
[6:02]ने नॉब्स को अमल किया जाए उसके साथ को मजबूर किया जाए
[6:07]इस्लाम ऐसी मदद नहीं चाहता मोहतरमा है शख्सियत अपनी जगह पे महफूज
[6:16]रहे तो यह फकीर भी ऐसा है की अगर उसके पास जरूरी
[6:18]है तो जिंदगी के मुकम्मल एक रजत नहीं है ऐसा कोई वसीला
[6:23]भी ना हो जिससे उसकी जरूर पूरा हो सके लेकिन सवाल नहीं
[6:25]करता है तीसरा मौर्य जहां पर जकात खर्च की जा शक्ति है
[7:00]वह है आमीन आलेह यानी जो जकात को जमा करने में जो
[7:05]जकात को इकट्ठा करके इमाम तक पहचाने में अपनी तवनाइयां करते हैं
[7:18]जिनको एक कम दिया जाता है अब इसके पास कोई दूसरा कम
[7:23]तो नहीं है की उसे उसकी दरामद हो रही हो उसकी जरूर
[7:27]पुरी हो रही हो आप क्योंकि यह जकात के लिए कम कर
[7:30]रहा है उसका कम है उसकी जिम्मेदारी है वह कहां से पुरी
[7:45]होगी चौथ मौर्य है मुसलमान की हिफाजत की खातिर दुश्मनों को माल
[8:26]देकर पैसा देकर उनके दिलों को नरम किया जाए उनको इस्लाम की
[8:34]तरफ जज किया जाए लेकिन यह भी पता है की अगर हम
[8:42]इन्हें कुछ पैसे दे दे काफिर दुनिया के बेटे हैं दुनियाभरस्त है
[8:51]तो सिर्फ इसलिए जाए तो उनके दिल में इस्लाम के लिए नमी
[9:04]पैदा हो शक्ति है इस्लाम का फायदा हो इस्लाम का फायदा है
[9:34]की उसके दुश्मन दुश्मनी से हाथ उठा ले इस्लाम मजबूत बन जाए
[9:38]इस्लाम को भी खतरा ना रहे यह इस्लाम का ही फायदा है
[9:42]इसलिए जकात इस मोरीजा में खर्च की जाए जहां इस्लाम का फायदा
[9:47]है ये है की जो काफिर है लेकिन कुछ लोग ऐसे जो
[9:51]मुसलमान भी है लेकिन मुनासिब है कलम पढ़ने हुए इस्लाम के खिलाफ
[9:59]कम कर रहे हैं इस्लाम के खिलाफ साजिश ही कर रहे हैं
[10:00]अब इनको भी अगर पैसे दिए जैन तो हो सकता है यह
[10:03]चुप हो जाए यहां भी खर्च किया जा सकता है अगर उनको
[10:11]भी पैसे देकर उनके दिलों को किया जा सकता है तो क्योंकि
[10:16]यह इस्लाम का ही फायदा है यहां पर पांचवा मर्द है जो
[10:42]मकरुजीन है टूटी कोई ऐसी बीमारियां पड़ी के उसके इलाज के लिए
[10:54]उनके पास होसिले नहीं थे उन्होंने कर्ज लिया अब उनकी पोजीशन ऐसी
[10:59]नहीं है की वह अपने कर्ज को उतार सके उनका कौन करेगा
[11:04]नहीं कर सकते वहां भी जकात को खर्च किया जा सकता है
[11:24]जो मेरा खुदा है जो मेरा राशि के उसने ही मुझे दिया
[11:27]है तो खुदा के हुकुम से मैं इसकी भी मदद करूं जो
[11:31]की अल्लाह का बांदा है उन्होंने खर्च नहीं किया जा सकता है
[11:57]उसके पास उतारने के लिए उसने कर्ज को गुना में भी खर्च
[12:03]नहीं किया है अब इस्लाम कहता है की उसे जकात दो ताकि
[12:06]वो अपनी परेशानियां को हाल करें अपनी इज्जतें नफ्स को बहस रखें
[12:12]और बाय इज्जत जिंदगी गुर्जर रही फिर दिन की अहमियत को भी
[12:16]समझेगा वो खुदाई इबादत भी करेगा और दूसरों के हम का भी
[12:18]ख्याल करना लगेगा आजकल तो यह इतना सिस्टम नहीं है लेकिन गुजरिष्ठा
[12:30]जमाने में जो लोगों की इंसानों की खरीद अफरोक्त हुआ करती थी
[12:36]इंसान को गुलाम बना कर भेज दिया जाता था गुलाम होते थे
[12:40]लोग उनके अपने पास कोई हक नहीं था कोई आजादी नहीं थी
[13:02]पैसों से उन्हें खरीद कर आजाद कर दिया जाए आजाद की जिंदगी
[13:25]दिन की हैकनीयत के लिए सनत और दलील बन जाए तो गुलाम
[13:33]को आजाद करने के लिए जो शक्ति में जिंदगी गुर्जर रहे हैं
[13:38]मुश्किल हाथ में खासतौर पर आप अगर सदर इस्लाम को देखें तो
[13:41]जो मुसलमान काफिरों के पास थे खुद तो मुसलमान है लेकिन उसका
[13:47]जो आका है वो काफिर है अब क्या करें उसे पता है
[13:52]ये मुसलमान है उसको रोज रोज ज्यादा तकलीफ दे रहा है तो
[13:54]ऐसे लोगों को जकात के पैसों से खरीद कर आजाद कर दिया
[13:59]जाए ये भी इस्लाम की ताकत है यह इस्लाम की सर बुलंदी
[14:04]और इज्जत है तो जो गुलाम है उनको भी जकात के पैसों
[14:10]से खरीद कर आजाद किया जा सकता है जिसे अल्लाह राजी होता
[14:24]है किसी जगह पर अस्पताल नहीं है अस्पताल बनाना स्कूल बनवाना रास्ते
[14:39]बनवाना तबलिगीमार राकेश कायम करना ताकि की और रिसर्च सेंटर बनाना लाइब्रेरियन
[14:58]प्रोग्राम जो मुसलमान के दरमियां इस्लामी है जो खुदा बंदे के कर्ब
[15:09]का शबाब बंटी है यानी इंसान इन चीजों के जारी अल्लाह के
[15:14]रिजयाद हासिल कर लेट है तो उसे रात को इस बोन में
[15:19]भी खर्च किया सकता है हर वो कम जिसमें अल्लाह के रिजाइयत
[15:21]हो जिसे अल्लाह राजी होता हो इस्लाम और मुसलमान को फायदा पहुंचता
[15:31]हो जकात के पैसों से अंजाम दिया जा सकता है है रास्ते
[16:01]में वैसे गरीब नहीं है उसे वक्त उसके पास कुछ भी नहीं
[16:10]है तो उसे मुसाफिर को जो सफर में बेचारा बन जाए उसके
[16:14]पास कुछ ना रहे उसकी जकात के पैसों से मदद किया शक्ति
[16:21]है उसे इब्नुषबिल कहा जाता है क्योंकि ये रास्ते में विचार र
[16:26]गया है सफर की वजह से परेशान हुआ उसके पास थे अब
[16:37]उसके पास नहीं रहे अभी अपने सफर को कैसे पूरा करके वतन
[16:41]तक पहुंच सके यह मुबारक है जहां पर जकात दी जा शक्ति
[16:49]है जकात खर्च की जा शक्ति है की वह किसी भी मोरर
[16:53]में खर्च करें और आखिरी मसाला सवाल जैसे यह है की अगर
[17:34]एक तरफ फकीर और मिस्किन हो दूसरी तरफ वाले कम हो तो
[17:42]क्या करें यहां पर बेहतर यही है की जकात को फुकरा और
[17:47]मुश्किलों पर खर्च किया जाए उनके मसल को उनके मुश्किल को मद्देनजर
[17:56]रखते हुए उनकी मदद की जाए ताकि उनकी परेशानियां हाल हो जिसे
[18:02]भी पता चला है की अल जकात का यही है की गुरबत
[18:06]के खाता में इनको खत्म किया कुर्बत का खत्म किया जाए जो
[18:11]की बहुत साड़ी इज्जत में आई बीमारियों की और मिसाइल की जड़
[18:13]है गुरु में तो दूसरे तमाम मिसाइल जितने भी मिसाइल को पेस
[18:22]आते हैं उनका करती है तो जकात से इसका खत्म किया जाए
[18:42]फितरा या तो फितरत से है और फितरत यानी खेलकूद तक बदन
[18:52]जो खाली कायनात ने हमारा बनाया है उसके शुक्रण के तोर पर
[19:08]जग दी जाए ये जगह तो फिट रहा है या ये एक
[19:13]फितरत से मुराद दिन इस्लाम है क्योंकि दिन इस्लाम भी फितरी दिन
[19:20]है और क्योंकि हल्के कायनात ने दिन इस्लाम में इस जगह कहा
[19:24]जाता है रमजान पूरा होता है और फिर सवाल की पहले होती
[20:00]है आज अगर ईद का दिन है और खुशी का दिन है
[20:11]तो दूसरों को भी खुशी में शामिल किया जाए मिस्किनों को खुश
[20:15]करने के लिए दी जाति है की यह बदन की हिफाजत के
[20:29]लिए होती है साल भर के लिए अपनी इंश्योरेंस कर रहा है
[20:35]खुदा की बारगाह से यह पैसे दे रहा हूं कितनी मामू लड़का
[20:41]में 3 किलो कोई भी चीज दी जाए खाने की जगह तीन
[20:44]किलो एक आदमी के लिए अभी उसके साल भर के लिए हिफाजत
[20:51]होती है उसे बुरी मोर से बचती है अचानक मौत से बचती
[21:06]है उसके बहुत सारे थे और एक बहुत बड़ा फायदा है वह
[21:11]यह की यह जकात है फितरत और हकीकत और रोजों को कामिल
[21:17]बनती है रोज को कुबूलियत की मंजिलात पर पहुंचती है इसे रोज
[21:22]काबुल होता है की जी तरह दुरूद नमाज को मुकम्मल करता है
[21:33]की अगर नमाज में दुरूद ना हो तो नमाज नहीं है दूध
[21:36]की वजह से नमाज मुकम्मल होती है कमल को पहुंचती है इसी
[21:41]तरह फितरत के जारी से रोज मुकम्मल होता है अल्लाह की इबादत
[21:59]है हुकुम दिया है की दूसरों को भी याद रखा जाए और
[22:22]उनको भी अपनी खुशियों में शरीर किया जाए सीखने फितरत इसका एक
[22:28]मौर्य है दीवाना ना हो पागल ना हो बचाना हो आजाद हो
[22:49]गुलाम ना हो फकीर ना हो जिनकी यह हालात करता है आजाद
[23:23]है गनी है शादीशुदा है उसकी बीबी है अब बीबी की की
[23:30]हालात वही कर रहा है उसे पर होगा उसके बच्चे हैं बच्चों
[23:35]की खिसलत वही कर रहा है बच्चों का फिटना भी उसे पर
[23:36]होगा बूढ़े मां आप है उनके पास अपने वेसल नहीं है उनकी
[23:41]यह किस हालात कर रहा है मां-बाप का जो है फितरत भी
[23:45]इस पर होगा किसी यतीम बच्चे की हालात कर रहा है उसे
[23:47]पाल रहा है वो उसकी जगह की हालात सुमार होता है इसने
[23:53]सरपरस्त उसकी काबुल की है एक राजद उसके दे रहा है तो
[23:58]इसका फिटना भी उसे पर होगा की हम अपना भी है और
[24:14]वह उसे पर है किफलत की जब बात आई की उसके हां
[24:42]खाता है पिता है तो फिर यह सवाल पैदा होता है की
[24:43]क्या मेहमान काफी तरह मेहमान के लिए दो-तीन सूरत से पहले आता
[25:01]है ईद के दिन भी हमारे यहां खाना खाता है और यह
[25:06]नन्हार हिसाब हो मैंने उसने चंद दोनों के रहने की नित की
[25:13]है अभी हमारे यहां र रहा है हमारे यहां का पी रहा
[25:16]है और वहां रहे और यह उसका खान पर खाने लगे उसका
[25:31]देना है और इतना रहने की नित नहीं है उसने याद किया
[25:50]जाए उसे पर भी राजीव क्या साल में अगर 3 किलो अल्लाह
[26:08]के नाम पर दे दे किसी को कुछ खाल नहीं है लेकिन
[26:17]जो मेहमान ईद के बाद आता है चंद्र के बाद आता है
[26:22]रात को डर से या ईद के दिन जा रहे हैं की
[26:26]उसका फिटहरा नहीं है इसी तरह जो बच्चा ईद की रात से
[26:29]बाद में पैदा होता है चंद दिखाई दे दिया ईदगाह उसके बाद
[26:31]तो भी नहीं है उसे पर चंद के बाद मुसलमान हुआ उसे
[26:39]पर भी नहीं है उसे चाहिए अपना फितरत दे दी हमें नहीं
[27:12]मिल रहा अब क्या किया जाए उतने पैसे पैसे चाहे तो पैसे
[27:22]जींस चाहे तो जींस इन दोनों में से जो चाहे उसे अलग
[27:29]करके रखें जो हमारे घर में इस्तेमाल कर रहे हैं आता रोटी
[27:50]सब खाता हैं चावल है सब खाता हैं हुजूर दाल यह वह
[27:57]चीज जो खाई जाति है सब्जियां हैं यह चीज इस्तेमाल करते हैं
[28:10]चावल का हिसाब करना चाहता हूं तो चाहे तो आम तोर पर
[28:21]खाने वाली चीजों में से 3 किलो एक-एक आदमी के लिए दे
[28:25]चाहे तो उनकी कीमत दे ये भी सहुलत है या तो आप
[28:31]उसकी कीमत कौन सी कीमत जो आम तोर पर बाजार की है
[28:35]यानी फकीर को यहां तो जींस दी जाए या इतने पैसे दिए
[28:40]जाएंगे अगर खरीदना चाहे तो उसे 3 किलो मिल जाए इस तरह
[28:50]से पहले इसे दे देना चाहिए नहीं दे सकता नहीं अलग करके
[29:03]रखें अलग करके रख दिया फिर उसे चेंज नहीं कर सकते यह
[29:30]उठाकर फिर जब भी कोई मुस्तक मिल जाए उसे दे दे जा
[29:37]रही है वह सही और सलीम हनी चाहिए मयूब ना हो अगर
[29:45]अवतार जींस हो तो उसे फिटने के तोर पर नहीं दिया जा
[29:51]सकता है जिंदगी गुर्जर रहा हूं जी शहर में मैं र रहा
[29:59]हूं इस शहर के गरीबों को डन नहीं चाहे तो दूसरी जगह
[30:04]भेज दे आप भेज सकते हैं लेकिन जब दूसरी जगह भेज रहे
[30:12]हैं तो यह सही साल है तक पहुंचनी चाहिए अगर आपने अलग
[30:15]करके राखी है और भेज रहे हैं और रास्ते में वह खराब
[30:22]हो जाए या जय हो जाए या मयूब बन जाए कोई भी
[30:29]उसमें आए पैदा हो जाए के हाथ नहीं पहुंचे सही है तो
[30:48]सैयद का ही ले सकता है चंद देखने से ईद नवाज से
[31:05]पहले तक इस दौरान को देनी है अगर किसी ने किसी गरीब
[31:16]शरण को फकीर को कर्ज दिया हुआ था कर्ज के पैसे उसे
[31:21]दिए हुए थे कर रमजान से पहले देता हूं नहीं बल्कि अगर
[31:59]वह इज्जत और आबरू वाला शख्स है तो आप उसे कहेंगे यह
[32:02]हडिया है यह तोहफा है ताकि उसकी इज्जत है उसके साथ-साथ और
[32:09]जज्बात भी मजु ना हो तो यह है किसी को आपने सुमार
[32:17]कर सकते हैं इस्लाम की एक हम इबादत है जब इबादत है
[32:30]तो इसको कश्ती कुर्बत कुर्बान ने लाला अंजाम दिया जाए कोई भी
[32:34]इबादत बगैर नहीं है तेरे कुर्बत के दोस्त नहीं है की जी
[32:39]तरह उसने अपने आप को सजदा करने को इबादत कर दिया है
[32:45]इसी तरह बांधो की मदद करना उनकी मुश्किल रात को हाल करना
[32:48]उनके कम आना और यह सब चीजों को हकीम की माना में
[33:02]और सही माना में मनाने की तो फिर आता फरमाए हम
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