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Dua e Wida e Mahe Ramzan | H.I. Syed Roullah Rizvi
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4 Bekeken·
23/04/18
Record date: 06 Apr 2023 AL-Mehdi Educational Society proudly presents new Executive Refresher Course for the year 2023 under the supervision of specialist Ulema and Scholars who will deliver though provoking lectures Every Weekend. These video lectures are presented by aLmehdi educational society, Karachi for our youth. For more details visit: 📡 www.almehdies.com 🖥 www.facebook.com/aLmehdies313 🎥 www.youtube.com/aLmehdies 🎥 www.shiatv.net/user/Al_Mahdi_Edu
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Transcript
[0:12]हो इसे बिलही मिनेश शैतान राजिम बिस्मिल्लाह रहमान रहीम अलहम्दुलिल्लाह रबल आलमीन
[0:45][संगीत] ताहिर अल्लाह मोहम्मद अली मोहम्मद [संगीत] कर सके और इसके दोनों
[1:46]में इसकी रातों में अपने आप को इलाही की मंज़िल तक पहुंच
[1:52]सके और हाले बैट अलेही सलातो वसल्लम की तालिम से अपने आप
[1:55]को अपने घर को अपने मोहल्ले को मुनव्वर कर सकें पैदा किया
[2:08]उसके जो उसके नाम को मानता था जो उनकी विलायत को मानता
[2:12]था उनमें से एक यानी ऐसी शायद लताडज चीजें हैं जो इंसान
[2:35]तक पहुंच रही होती हैं अलेवाइट अलैहिस्सलातो वसल्लम के वेस्ट और यह
[2:39]भी पिलाकर दो तरह की चीज होती हैं बात होती है जो
[2:44]सत्ता पहुंचती है इसके अंदर फर्क नहीं है की मैं हूं आप
[2:48]सिया है सनी है मुसलमान है काफिर है नहीं कोई फर्क नहीं
[2:50]है क्यों क्योंकि अल्लाह ताला ने हाले बैट सलातो अस्सलाम को वास्ता
[2:56]है फैसला कार दिया इसकायनात में तमाम ने मटन के लिए गैर
[3:00]मुस्लिम किसी काफिर तक भी कोईमात पहुंच रही है तो वो इन्हीं
[3:05]के जारी पहुंच रही है लेकिन बढ़ खास हैं जो इनके खास
[3:19]माने वालों तक पहुंची हैं उनमें से एक नेमत दुआओं का मजनू
[3:23]है ऐसा कोई मतलब नहीं है की जिसके पास ना क्वांटिटी एन
[3:31]क्वालिटी किसी भी हैसियत से कमियत और कैफियत दोनों हैसियत से वह
[3:37]सलाम से हम तक पहुंची हैं वो उसके पास मौजूद हो यानी
[3:42]लोगों को मालूम नहीं है की खुदा से मांगना कैसे है बहुत
[3:53]साड़ी दफा हम देखें हम क्या मांग रहे होते हम अपने जो
[3:57]छोटी-छोटी चीज होती हैं वो खुदा से मांग रहा होता है देखो
[4:08]तुम इंसान हो तुम तुम्हें खुदा से मुताल ने इसलिए पैदा किया
[4:13]है की वो इलाही सिफत तुम्हारे वजूद के अंदर ए सके तुम
[4:18]अशरफुल मखलुकत बन सको लिहाजा अपने आप को इन छोटी-छोटी चीजों के
[4:22]अंदर मातुल जो ये भी अल्लाह से लेनी है ये भी हाले
[4:26]वैसी नहीं है लेकिन सिर्फ ये नहीं लेनी तड़पना इनके लिए नहीं
[4:33]है तड़पना किन चीजों आते हैं जो अल्लाह से तालाब कर रहे
[4:41]हैं और उनके बाद ए गई है की हमारा बयान भी होता
[4:46]है की दुआ जब काबुल होती है जब सच्चे दिल के साथ
[4:49]मांगी जाए उसके अंदर यह वाली प्रॉब्लम मौजूद होती है जिसकी वजह
[4:59]से काबुल नहीं हो रही होती है उसके असरार हमें जिंदगी में
[5:04]नजर नहीं ए रहा है मिसल के तोर पर गाड़ी चल रही
[5:14]है मेरे जहां में मिसल के तोर पे घर चल रहा है
[5:17]मेरी जहां में मिसल के तोर पर मेरी झूमता मुश्किलात में छोटी-छोटी
[5:19]ये चल रही है यानी बोल कुछ रहा हूं बोल रहा हूं
[5:22]तुझे मोहब्बत की लज्जत है वो मुझे दूर ना हो लेकिन मैं
[5:27]तो इस लज्जत को जानता ही नहीं हूं मुझे तो अच्छे मोबाइल
[5:31]की लज्जत का मालूम है मुझे गाड़ी की लज्जत का मालूम है
[5:32]मुझे घर की लज्जत का मालूम है लेकिन अल्लाह से मोहब्बत अल्लाह
[5:37]से रब्बी की लज्जत का मालूम नहीं है और मैं कोई मांग
[5:39]भी नहीं रहा हूं अल्लाह से पढ़ रहा हूं सही पर सजा
[5:44]दिया मैंने उठाई दुआ पढ़ रहा हूं रीडिंग कर रहा हूं लेकिन
[5:49]मांग नहीं रहा मां का रहा हूं मांग वही अपनी छोटी छोटी
[5:51]चीज है बयान करते हैं की इंसान सिंक करें सलाम अल्लाह ताला
[6:06]से तालाब कर रहे हैं मैं अपनी इस मरहले के ऊपर वही
[6:13]चीज इस शिद्दत के साथ पढ़ने ग जाऊंगी मुमकिन नहीं है की
[6:27]देखो आहिस्ता-आहिस्ता यानी रीड भी करो यानी क्योंकि भारत दफा हमारे सुबह
[6:32]आता है भाई जब मांगी नहीं र जब दिल में नहीं है
[6:35]तो पढ़ने का क्या फायदा जब अमल में नहीं ए रहा है
[6:36]तो मिसल के तोर पे इसका क्या करें या कुरान के बड़े
[6:39]में भाई जब अमल नहीं करना जब समझना नहीं है तो पढ़े
[6:43]क्यों इस ये बहाने होते हैं ये इमाम अल्लाह रहमान एक मर्तबा
[6:45]एन एक चंद वसीयत उनकी दईयरन बहू को और उसके अंदर कहते
[6:51]हैं की यह जो तुम्हारे जहां से बार-बार आता है तुम्हारे से
[6:54]मारा सबकी बात कर रहे हैं उनके हो सकता है लाजमी नहीं
[6:56]है की उनके जहां में आता हो लेकिन ये जो इंसान के
[6:59]जहां में आता है की मसाला अगर मैंने मार्फत के बगैर कुरान
[7:02]पढ़ा तो कोई फायदा नहीं है खाने की क्या है ये बस
[7:07]बस है शैतानी है तुम ही तो अल्फाज पढ़ रहे हो ना
[7:10]ये भी ना पढ़ो नतीजा क्या निकलेगा उन लफ्जों के अंदर ना
[7:23]समझो तो भी दाशिर है वही चीज उसका पढ़ना शबाब बनेगा की
[7:28]कल तुम समझना ग जाओगे उसकी दासी रहेगी और इसी तरह इमाम
[7:33]का कलाम इमाम का कलाम क्या होता है इमामुल कलाम होता है
[7:34]कलाम ए इमाम इमामुल कलाम होता है इमाम की दुआएं दुआओं की
[7:42]इमाम होती हैं जहां तक इंसान को पहुंचाना चाहिए अभी नहीं पहुंच
[7:46]रहा पढ़े एक मूर करें तर्जुमा पड़े मुमकिन हो सकता है उनसे
[7:53]उन्सियत इख्तियार करें आहिस्ता आहिस्ता कर कर वो चीज मांगने ग जाएगा
[7:56]जो हाले सलातो अस्सलाम खुदा से मांग रहे हैं दुआओं का मजमा
[8:02]ये वाक्य किसी और मतलब के पास नहीं है बल्कि साहिब है
[8:07]सज्जाद दिए की दुआएं छाप क उर्दू में थोड़ी सी तस्दीली कर
[8:11]करके नहीं है मांगने का तरीका रमजान की दुआ यानी तमाम चीजों
[8:34]की दुआएं मौजूद है फिर माहे रमजान से मकसूद दुआएं मौजूद हैं
[8:36]हम मफतिक बोले उसके अंदर माहे रमजान से मसूद दुआएं मौजूद हैं
[8:40]हर दिन की दुआएं आपके अभी तिलावत हुई है अभी नमाज में
[8:42]मुश्तरका दुआएं बहुत साड़ी दुआएं इंसान अपने आप को हम आजाद करवाया
[8:48]है यानी इंसान माहे रमजान के लिए अपने आप को लाजब से
[8:55]आमादा करना शुरू करें शाबान में अपने आप को हम वादा करें
[8:58]या नहीं कितना ज्यादा हाले बेहतर है सलातो अस्सलाम कर रहे हैं
[9:04]देखिए हमारे यहां बड़े इवेंट आते हैं ना घर में कभी शादी
[9:08]वादी होती है कब से एक दो महीने पहले से तैयारी शुरू
[9:10]हो जाति है ठीक है हो सकता है वो तैयारी कोई खास
[9:16]दिन भी हो शक्ति हो लेकिन जब इंसान उसकी अहमियत को समझना
[9:18]होता है कहता नहीं खुदान खस्ता आखिरी दिन नहीं हुआ तो क्या
[9:23]करूंगा फल मुश्किल ए गई तो क्या करूंगा फालना हो गया तो
[9:25]क्या करूंगा कई मीना पहले से वो कम करना शुरू कर देता
[9:28]है अभी तो बहुत टाइम है वो नहीं हो सकता नहीं हो
[9:32]सकता है लेकिन मुमकिन है कोई रुकावट ए जाए कोई मुश्किल ए
[9:33]जाए लिहाजा अपने आप को पहले से आम आधा करता है की
[9:36]कोई मुश्किल ना ए सके हाले बैट अलेही सलातो अस्सलाम ने इस
[9:42]माहे मुबारक के लिए जो एहतेमान किया और चीन की आखिर वक्त
[9:44]तक माहिर रमजान के आखिरी लहरें तक इंसान कोशिश में ग रहे
[9:50]हैं की कोई लम्हा ऐसा ना हो की लाया हो जाए कोई
[9:55]ऐसा लम्हा माहे रमजान का जय हो जाए जिससे वो इस्तीफाजा ना
[9:57]कर सके ज्यादा हमारे पास शाबान में दुआएं जो रमजान के बड़े
[10:03]में रमजान के मोबाइल से आप शुरू करें तो दुआएं ही दुआएं
[10:07]हैं की हम माहे रमजान को विदा करने जा रहे हैं हमारे
[10:14]पास मौजूद है जिम से ये एक 45 में नंबर की दुआ
[10:18]सही है सजा दिया की रात मुमकिन हुआ शर्ट की तो यकीनन
[10:29]ना हैसियत है ना गुंजाइश है लेकिन जी तक हम अल्फाज को
[10:31]इमाम के समझना की कोशिश कर सकें उसको हम लेक इंशाल्लाह आगे
[10:36]बढ़ते हैं एक बार जरूर भेजें [संगीत] सबसे पहले खुदा ने मुताल
[10:46]की बारगाह में इमाम अली सलातो अस्सलाम हम्द करते हैं खुदा ने
[10:51]मुताबिक यानी उसकी सटायेष करते हैं उसकी हम्द करते हैं उसकी बुजुर्ग
[10:54]उसकी सफात को बयान करते हैं और इस जुमले से आगाज होता
[11:00]है इस दुआ का अल्लाह अल्लाह का बदला नहीं चाहता यानी वो
[11:10]देता है लेकिन इस देने के बदले कुछ चाहता नहीं है और
[11:12]इसकी तसल्ली की बात है हमारी बहनों के अंदर होता है की
[11:16]खुदा ने मोब हमसे नमाज चाहते हो रहा है खुदा ने बताया
[11:19]हमसे रोज चाहत हो रहा है हम भूखे रहे कितना मजा आता
[11:20]है खुदा ने मुताल को असलम के अंगूठे रहेंगे मसाला ये ऐसे
[11:24]ताश वो रात है की अगर फुर्सत मिली बयान होगा की हकीकत
[11:29]ये अल्लाह ताला अपने लिए नहीं जा रहा है की इंसान मस्तान
[11:31]रोज रखेगा तो अल्लाह को कोई फायदा हो जाएगा इंसान नमाज पड़ेगा
[11:36]अल्लाह को कोई फायदा हो जाएगा नहीं ये तमाम चीज पलटती है
[11:38]इंसान के फायदे के लिए अल्लाह नहीं चाहता की तुम गुमराह वाला
[11:43]नहीं चाहता की तुम तनजूली का शिकार हो जैसे हम पसंद आया
[11:55]की नहीं लेनी चाहिए अब दे तो दिया उसे वक्त फिजा में
[11:59]मौजूद थे वो हालात हमारे वो कैफियत पर मौजूद थे और जब
[12:03]चले गए पैसे तो अब इंसान को क्या होता है यार कम
[12:08]दे देता थोड़े से थोड़े बाहर दफा ये शैतानी से ए रहे
[12:13]होते हैं इमाम कहते हैं की देखो यानी जब खुदा से मांगने
[12:17]की तमाम ना कहे से खुदा तेरे वजूद के अंदर नहीं है
[12:18]जब तू देता है तो उसका बदला नहीं लेट जब तू दे
[12:22]देता है तो उसके ऊपर पैसे बात नहीं होता भैया मंला उकाफ
[12:26]डी हूं आदत शिवा वो ये नहीं देखा की मैं जितना कम
[12:29]अंजाम डन उतना वो आता करता है नहीं हमारे कितनी रिवायत हैं
[12:34]की तुम एक कम बढ़ाओ खदान ने बताया तुम्हारे यहां से 10
[12:38]कम बढ़ता है जाहिर तोर पे कम बढ़ाना नहीं है या नहीं
[12:40]वो तासीर जो एक अमल के अंदर अब यही मे रमजान के
[12:44]यानी जब उसके बड़े में बयान होगा तो बयान करूंगा की कितना
[12:49]एक अजीब खुदा ने मुताल का एहसान है खुदा ने मुटायर की
[12:54]एक इमारत है क्यों चाहते हैं की हम किसी तरह करने बहाने
[12:58]ढूंढ रहा होगा की ये मेहमानी है ये दफ्तर खान बिचवा खुदा
[13:15]करते हैं की कोशिश करते हैं जबरदस्ती ये भी ले लो यह
[13:27]भी ले लो वह चाहते हैं की ज्यादा से ज्यादा दे सकें
[13:38]ज्यादा से ज्यादा ये दशाखान से इस्तीफाजा कर सके खुदा ने मुताल
[13:44]ने अब दस्तरखान बिछाए अच्छा हमारे पास जो देने को होता है
[13:45]वो तो मेरा खत्म होने वाला होता है हम जो दे रहे
[13:50]होते हम हमारी बहनों में होता है की पलट के मस्तान चाहे
[13:54]मानवी माधवी कोई ना कोई फायदा नहीं रपटे अच्छा हो जाएंगे कल
[13:56]को कोई कम पद सकता है 10 सीधे हमारे जहां के अंदर
[14:00]ए रही होती है हम देते वक्त यदि हमारे पास से कमी
[14:04]हो रही है लेकिन खुदा ने मुताल की बारगाह में तो कोई
[14:06]कमी नहीं है खुदाई की बारगाह के अंदर तो कहानी ऐसा नहीं
[14:10]है की वो हमसे बदला लेना छह रहा है की अगर हम
[14:13]कुछ उससे दस्तरखान से ले लेंगे तो पलट के का अच्छा ये
[14:17]ले लिया चलो अब लो अब ये भी दो यह भी दो
[14:20]यह भी तो नहीं बल्कि इंसान का अपना जो वजूद है वो
[14:24]रश कर रहा होता है की देखो खुदा है बगैर किसी हक
[14:32]है यानी मेरा हक नहीं था उसके बावजूद तुम्हें मुझे ये नेहम
[14:38]तू मुझे माफ कर देता है बगैर किसी तकाजे के बगैर और
[14:40]फजल के साथ यानी मेरी हैसियत नहीं थी की तुम मुझे माफ
[14:44]करें मेरे गुना ऐसे नहीं थे तो मेरे करीब मुझे दूर हो
[14:52]जाते लेकिन बगैर मांगे मेरी गुलाम को बक्श देता है और इसी
[15:01]तरह के तेरा सजा देना मस्तान एडले तेरा फैसला खैर है ये
[15:05]तमाम एक-एक करके इमाम अली सलातो अस्सलाम बयान करते हैं अब उसके
[15:10]बाद फॉर्मेट हैं की देखो ताश को रोमांस शुक्र अतः अलहमता हूं
[15:13]शुक्र के खुदा ने मोटाई जो तेरा शुक्र राजा करते हैं तो
[15:18]उसकी जगह देता है लेकिन ये जो शुक्र अदा कर रहा है
[15:23]यह भी तेरी वजह से कर रहा था हमारे उस्ताद थे वही
[15:27]मिसल देते थे की जैसे वालदैन से बाल साफा पॉकेट मनी मिलती
[15:32]है बच्चों को अब उसे पॉकेट मनी से बच्चा बलिदान के लिए
[15:35]कोई चीज लेकर ए जाता है जवाब दें से मिल रही है
[15:44]उसको लेकिन इस में से पलट के बाद कितने खुशी का एहसास
[15:49]होता है वो बच्चा अपने अंदर कितना एक तमन्ना ही महसूस करता
[15:52]है की देखो मैंने कुछ मिला होता है की उसका यह तो
[16:02]हर चीज उसकी दी हुई थी या खुदा तेरा शुक्र के तूने
[16:05]इंसान किया की शुक्र तेरा अदा करना है तूने इस शुक्र की
[16:10]गुंजाइश हमारे अंदर डाली तूने ये दर्द दिया इसी तरह हम तेरी
[16:12]हम करते हैं तुम इस हम्द के बदले हम यहां करते हैं
[16:16]जबकि जो हम हम्द कर रहे हैं ये भी तेरी आता है
[16:20]ये भी तूने आता है मैं उसके बाद एक-एक करके इमाम अली
[16:22]सलातो अस्सलाम अल्लाह की सिफर बयान कर लेंगे कितना एहसान है इंसान
[16:28]का इंसान पर अल्लाह ताला का ए खुदा तू आ मेरे गुनाहों
[16:30]को चपटा है जबकि तेरे लिए मसाला नहीं था की तू आज
[16:34]कर सके यानी लोगों के सामने आया कर सके उसके बावजूद तू
[16:38]मेरे गुनाहों को छुपा रहा है तू मुझे अतः कर रहा है
[16:41]जबकि तू चाहता है तो मुझे रॉक सकता था लेकिन उसके बावजूद
[16:43]मुझे आता कर रहा है तू ने मेफिरत का दरवाजा मेरे लिए
[16:48]खोल तूने मेरे ऊपर ये एहसान किया और ये एक-एक करके आप
[16:53]अल्लाह ताला की सफात खुदा ने मुताल इमाम अली सलातो अस्सलाम बयान
[16:59]करने और उसके बाद चंद आयत का जिक्र करने अल्लाह के कलाम
[17:01]का जिक्र करने के देखो तूने कहा है की मैं तुझे मांगू
[17:04]तूने लोगों को अपने हुकुम दिया है की वो तेरी बारगाह के
[17:10]अंदर है तू उनको दावत देने वाला है तू कहता है की
[17:11]मसाला अगर तुम शुक्र करोगे तो मैं ज्यादा कर दूंगा मैं उसके
[17:16]अंदर इजाफा कर दूंगा अगर तुम शुक्र राजा करोगे और ये तेरा
[17:18]मुख्तलिफ आयत के इमाम अलैहिस्सलातो वसल्लम एक-एक कर कर बयान करते हैं
[17:23]करते हसन है की मिसल यानी उसे आयत तो बयान करते हैं
[17:27]की ए खुदा अन्य तू कहता है की जो मुझे पढ़ने थे
[17:28]यानी ये तो उसके पास तो कुछ अपना था ही नहीं है
[17:31]तो सब दे राहत लेकिन उसके बावजूद जब ये तुझे लोट आता
[17:35]है जब यह तेरे हुकुम के ऊपर अमल करता है तो क्या
[17:37]कहते हैं की ये मुझे कर दे रहा है और जो मुझे
[17:42]कर दे रहा है मैं उसे सूट के साथ वापस करूंगा देखें
[17:48]तो एक अच्छी खास से करने इस दुआ के अंदर नजर आते
[17:54]हैं की खुदाई जो है वो बक्शीश का दरवाजा उसने अपने बंदों
[18:00]के लिए खोल किया हुआ है कयामत के दिन गुनहगार और मन
[18:01]की हालात के बड़े में हमारे सलातो अस्सलाम यहां पर बात कर
[18:05]रहे हैं और इस तरह मुनाफिक बक्स तिजारत जो अल्लाह ताला का
[18:07]रहा है की भाई तुम एक दो में एक के बदले एक
[18:10]नहीं दूंगा डर हेली के वो जो एक तुम मुझे दे रहे
[18:16]थे वो भी तुम्हारा अपना नहीं था वो मेरा था अब देखिए
[18:21]कितना फायदा एक इंसान अगर उसे जान खुदा ये है की हम
[18:27]बहन भी नहीं चाहते की अल्लाह को दें की अल्लाह ताला हमारी
[18:31]मफलत कर सके हमारे वजूद के अंदर रोज लता कर सके अल्लाह
[18:35]चाहे ढूंढ रहे होते हैं की कोई ऐसा रास्ता मिल जाए की
[18:37]मैं अपने बंदे को तरक्की और कमल आता कर सुकून और हमारी
[18:41]पुरी कोशिश यह होती है की हम रास्तों को एक-एक कर कर
[18:47]बैंड कर दें कितना एक सख्त है और उसके बाद अब आते
[18:52]हैं तो वस्सलामू उसका रहने के ऊपर की अब माहे रमजान का
[18:54]जिक्र करता है की खुदा तूने ये माहिर रमजान हमें आता किया
[19:00]और एक ऐसा दोस्त हमें माहे रमजान की सूरत के अंदर आता
[19:03]किया की हादसा है वो मकाम दिन वी साहब का धक्के दोस्ती
[19:15]ये महीना अदा करता है और उसके बाद फॉर्मेट हैं वो फायदा
[19:28]मुमकिन नहीं है की इंसान अब यह महीने और इस हमारे दरमियां
[19:38]और इस महीने के दरमियां जुदाई आना चाहती है ये हमसे विदा
[19:40]होना चाहता है ये हमसे इसकी मुद्दत तमाम हो रही है इसके
[19:44]दिन खत्म हो रहे हैं और हम विदा अंजाम दे रहे हैं
[19:50]हम अफसोस के साथ गम के साथ अब इस महीने से जुड़ा
[19:55]हो रहे हैं देखिए कौन इस महीने से अफसोस के साथ जुड़ा
[19:56]होगा मैं तो मिसल के तोर पे मेरे जहां में आएगा की
[19:59]यार भूकर रहना पड़ता था पूरे दिन अब ये महीना चले आएगा
[20:00]आराम से खाएंगे रोज रखना पड़ता था 10 चीजों का ख्याल रखना
[20:04]पड़ता था बाज ऐसे हल ने मुताली ने महीने के अंदर हराम
[20:10]कार दे दिए इस महीने के दोनों में हराम कार दे दिए
[20:14]मेरे लिए तो आसानी है मुझे नजर ए रही है कौन करेगा
[20:18]वही है वो लज्जत जो अल्लाह की मोहब्बत जो दर्द कर रहा
[20:20]है अल्लाह की मोहब्बत की जो लज्जतदार कर रहा है वो ये
[20:24]का सकता है अब देखिए मैं नहीं का रहा था इसका मतलब
[20:26]क्या है की मैं ये दुआ नहीं पढ़ूं जो शुरू में बात
[20:28]हुई थी नहीं इंसान अभी भी हमारे पास दिन है अभी वहां
[20:33]रमजान तमाम नहीं हुआ एक-एक लम्हा कीमती है एक-एक लम्हा कीमती है
[20:35]अगर इंसान इन्हीं कर पांच दोनों के अंदर अपने आप को इतना
[20:40]माला कर लिए खुदा ने मेयर के ख़ज़ाने में कमी नहीं है
[20:45]अगर इंसान आगे लास्ट करें वो कम जो माहिर अफजल से हमने
[20:47]करना था हमारे बाद में करना तो और माहिर रमजान में आकर
[20:51]अंजाम देना था और उसका नतीजा लेना था वो खुदा ने मुतरें
[20:56]पांच दोनों में हमें आता कर सकता है शर्ट है की हम
[20:58]खुदा से तालाब करें वाक्य वो चीज तालाब करें जो इमाम अली
[21:02]सलातो अस्सलाम तालाब कर रहे हैं की कोई चीज जैसे जुड़ा हो
[21:08]रही है हमसे हम देखिए जब हम कभी घर वालों के साथ
[21:11]कोई हमारे यहां कोई खुदा ना खस्ता फौजी की हो जाति है
[21:13]कोई ऐसा शख्स हमसे जुड़ा हो रहा होता है जिससे हम बहुत
[21:17]ज्यादा मानुष होते हैं हम उसकी जान से कितना वेस्टर्न ज्यादा हो
[21:19]जाता है रमजान कुरान के बड़े में इसी मेन रमजान की है
[21:25]जो मैंने इबादत आपके सामने इसका जाना इसका पलट जाना हमें हमारी
[21:38]उन्सियत को छन रहे हमें बेचैनी और इस तरह बता कर रहे
[21:42]हैं हम गमगीन होने इसके जान से यही इमामे सज्जाद अली सलातो
[21:47]अस्सलाम से रिवायत है की इमाम फॉर्मेट हैं की अगर पुरी दुनिया
[21:49]मेरा साथ छोड़ दे कोई मेरे साथ ना हो लेकिन कुरान अगर
[21:55]मेरे साथ हो तो मैं इस दुनिया से वैसे सजा नहीं होगी
[21:57]क्यों क्योंकि इमाम का जो कुरान शराब का इमाम का जो माहे
[22:02]रमजान से राब्ता है उसे रास्ते को हम तारक नहीं कर का
[22:06]रहे हम अपनी ही मिसालों के अंदर इसको डर कर सकते हैं
[22:07]की किसी का जवान बेटा उससे दूर हो रहा हो किसी की
[22:10]औलाद उससे दूर हो रही हो किसी का कोई अजीज उसके का
[22:14]जिससे वो उठाना बैठना हर राहत है उसकी याद में गुर्जर रहा
[22:18]था वो अगर उससे दूर हो रहा हो की कितना इंसान तड़पता
[22:20]है उसके लिए की कितना सख्त हो जाते हैं उसके लिए बर्दाश्त
[22:25]करना इस वजह से अब हम ये कहते हैं यानी देखिए हम
[22:34]जी तरह सलाम हम खुदा हाफिज जब कहते हैं अल्लाह हाफिज कहते
[22:38]हैं तो ये भी एक सलामती का पैगाम है और यहां पर
[22:42]हम देखते हैं की उसे कलर के अंदर इस्लामी कलर के अंदर
[22:47]अब कलर के अंदर वापसी पर भी खुदा हाफिज या तो अब
[22:53]इमाम अली सलातो अस्सलाम अब माहे रमजान को विदा करते हो मुकदीप
[22:57]करते खुद ही माहे रमजान को इंसान तू ये मेरे वो एहसास
[23:05]ही नहीं होता की माहिर रमजान मस्तान कोई चीज है माहिर रमजान
[23:08]कोई ऐसी चीज जिससे मैं बातें करूं गुफ्तगू करूं लेकिन ये वो
[23:13]जमाना है जो अल्लाह ताला ने जिसे अपने आप से मंसूब किया
[23:16]इसी खुद पर बनी है की अंदर यहां पर भी वो जो
[23:20]इमाम के अल्फाज हैं वो मौजूद हैं खुद पेशाब आने के अंदर
[23:25]रसूल अल्लाह के कद्र अलैकुम शिरोल ये देखो तुम्हारी तरफ कौन ए
[23:28]रहा है किसने तुम्हारी तरफ लुक की है कौन तुम्हारी तरफ तवज्जो
[23:32]कर रहा है वो अल्लाह का महीना तुम्हारी तरफ तवज्जो कर रहा
[23:37]है अब अल्लाह ताला अगर किसी चीज को अपने आप से मंसूब
[23:40]कर दे तो यह कोई आम दिन नहीं है सारे दिन अल्लाह
[23:43]के साड़ी रातें अल्लाह की है सारे महीने अल्लाह के सारे साल
[23:47]अल्लाह के हैं इसका मतलब जमाने के अंदर इंसान को हिदायत आता
[23:58]करने की कुदरत बहुत ज्यादा है आपके सामने मस्जिद में आगे बढ़ेंगे
[24:10]मुख्तलिफ रिवायत है सत्ता लागत का सवाब मिलेगा हजार रकत का सवाब
[24:12]मिलेगा ठीक है इसी तरह कैफियत मैसेज ने कहा जाता है की
[24:18]मुजरे जो शादी सुदा नहीं है उसकी दौलत दो रकत शादीशुदा की
[24:24]दो रकत 70 रकत क्यों क्योंकि वो जो इंसान के इम्तिहान के
[24:26]ऊपर जो जिम्मेदारी ए रही है इंसान जो अलग से कोशिश कर
[24:30]रहा है उसके नतीजा के अंदर इसके अंदर एक रुष्ट पैदा होता
[24:33]है चाहे वो समाज के अंदर वो कुदरत चाहे वो मकान के
[24:38]अंदर हो अब मस्जिदों के अंदर भी दरवाजा तो यह मस्जिद है
[24:42]एक दफा जमी मस्जिद है चाहे मस्जिद से बढ़कर आप मतलब वो
[24:44]मस्जिद का अहलेबैत की रिवायत में खास जिक्र है कूफा है मस्जिद
[24:50]से सला है सलाम का हराम है मस्जिद नबी है खाना है
[24:54]कब है अब क्या है की इन मकान के अंदर ऐसी कुदरत
[25:01]मौजूद है की जितनी ज्यादा ये कुदरत इंसान को करती है उतना
[25:05]ज्यादा उसे मकान की अहमियत बाढ़ जाति है और इसी तरह इंसान
[25:18]के पास एक ऐसी चीज जी इंसान इख्तियार यानी जुड़ा नहीं हो
[25:23]सकता यानी मैं नहीं का सकता की माहे रमजान मुझमें पर ना
[25:25]आए माहिर अवेलेबल मुझमें पर ना आए नहीं जमाना आता है दिन
[25:30]निकलता सबके लिए निकलता है हां उसकी बरकत तो समय अपने आप
[25:34]को रॉक सकता हूं इन जमानो के अंदर भी बाज अल्लाह अपने
[25:36]आप से इसको मंसूब कर रहे हैं शबाब क्या है शबाब ये
[25:41]है की उसे जमाने के अंदर इतने कुदरत है की आम दोनों
[25:45]में अगर तुम खुदा ने मुताल की जान से सफर करते हुए
[25:49]एक कम शुमाल कर रहे थे और नतीजा भी एक कम के
[25:50]मुताबिक निकाल रहा था लेकिन आज जब माहिर रमजान तुम्हें आता किया
[25:55]जा रहा है तो अब ये एक कम एक कम नहीं है
[25:58]इस एक कम के नतीजा मतलब तुम 100 कम आगे बाढ़ रहे
[26:03]हो यह कुदरत है माहिर रमजान की मैंने बात की के जब
[26:05]मेहमान आते हैं जब वो सफर बिछाया जाता है दस्तरखान बिछाया जाता
[26:09]है किस तरह एहतराम किया जाता है अब देखिए इसी मे रमजान
[26:13]में कितना ज्यादा है तमाम किया गए की हमारा सांस लेने को
[26:17]तस्बीहुमन किया गया मैं इरादा करके कम अंजनी तेरा कुर्बान इलल्लाह चाहूंगा
[26:32]पढ़ूंगा चाहूंगा नहीं पढ़ूंगा लेकिन सांस मेरे चने के ऊपर डिपेंड नहीं
[26:36]करती मगर ये क्या इंसान इतना बदबख्त हो जाए की खुदकुशी कर
[26:41]ले इख्तियार में नहीं है उसके साथ को रॉक सके या सांस
[26:46]मतलब कब लेना है कब नहीं लेना है लेकिन उसके ऊपर भी
[26:48]की जो बात तलत के मुताबिक के 22 हजार मर्तबा इंसान दिन
[26:52]के अंदर सांस लेट है उसे 1 साल के बदले खुदा ने
[26:59]मेयर एक तस्वीर लिख रहा है के बाद जब आयत के मुताबिक
[27:02]एक तस्वीर नतीजा देती है की जन्नत के अंदर इंसान का एक
[27:06]दरक सर सब दर्द अल्लाह उसके लिए कराड अच्छा इस रिवायत के
[27:11]अंदर भी ये नहीं है की एक साथ लोग तो एक तस्वीर
[27:15]नहीं कहा तस्वीर है कितनी है ये नहीं बताया कम से कम
[27:19]भी इंसान बोले अस्सलाम वालेकुम उसके लिए फिर वो राब्ता मुमकिन नहीं
[28:02]है माहिर रमजान के साथ जो इमाम अली सलाम बरकरार कर रहे
[28:07]हैं अस्सलाम वालेकुम ईद है या विलायत का अगर हम माना करें
[28:19]सही तोर पर उसके लोगों ही माना की तरफ जैन तो यह
[28:20]उन अफराद की ईद है जो तेरे कैंप में मौजूद है जो
[28:24]तेरे लाश का रहे हैं जो तेरा गृह है आ अल्लाह कहा
[28:27]गया है हाले कुरान कहा गया है अंजाम देने वालों का यही
[28:37]अल्लाह की जो विलायत है उसको काबुल करने वालों को आ अल्लाह
[28:40]कहा जा रहा है और वही मिसल की मदद छोटी-छोटी चीजें यानी
[28:47]प्यार में भी नहीं है खुदा छह रहे हैं की किसी तरह
[28:50]खान से इस्तीफा इजाजत से ज्यादा जो इस माहे रमजान में बक्सर
[29:15]ना जाए ऐसे दस्तरखान पद जाऊं जहां खाना ही खाने और मेजबान
[29:22]जबरदस्ती मेरी प्लेट के अंदर खाना दाल रहा है उसके बावजूद मैं
[29:27]वहां से भूख वापस ए जाऊंगा इंसान इससे ज्यादा शकील इंसान कौन
[29:38]होगा की जो उसे दस्तरखान से इस हालात के अंदर उठ जाए
[29:42]की जी दस्तरखान पर निर्माता ही रहमत हैं जिसका सारखान का बचाने
[29:47]वाला मेहरबान है और इतना मेहरबान है की जिसकी हम तबक को
[29:52]नहीं कर सकते किसी और से लिहाजा इमाम अली सलातो अस्सलाम माहे
[29:57]रमजान को अल्लाह के आलिया की निस्बत दोस्त कहा और लिहाजा जब
[29:59]ये दोस्त होते हैं हमारे रमजान से मानस होते हैं माहे रमजान
[30:05]नहीं होते उसके अंदर अपने कमल को तालाब कर रहे होते हैं
[30:07]लिहाजा जब माहे रमजान लगता है तो अब इनकी तरफ के अंदर
[30:11]इजाफा हो जाता अस्सलाम वालेकुम हम भी अल्लाह की र में कम
[30:31]बड़ा सकते हैं वह शहर है वो महीने के जिसके अंदर उम्मीदें
[30:34]ज्यादा हो जाति है मनुष्य ज्यादा हो जाते हैं हम अनजान नहीं
[30:40]दे रहे होते लेकिन उनका असर ज्यादा हो जाता है ऐसा नहीं
[30:42]है की हम जानते हैं हम अपनी जिंदगी के अंदर देखिए बरकतें
[30:46]ऐसी है माहिर रमजान की वो कम जो पूरे साल अंजाम नहीं
[30:48]देते वाजिद भी नहीं है मुस्ताहाबुद्दीन माहे रमजान की बरकत से वो
[30:54]कम अंजाम देना शुरू हो जाता है अस्सलाम वालेकुम जब वह है
[31:06]तो उसकी बड़ी कद्र बंडल है लेकिन अब वो जा रहा है
[31:10]तो बड़ा दुख है अब वो इतनी उसकी अदरक मंजुला तो जब
[31:14]वो जा रहा है तो अब इंसान तड़प रहे हैं इंसान दुख
[31:18]का शिकार नवीन का जो इमाम अली सलाम इस दुआ के अंदर
[31:25]बयान करना छह रहे हैं की कहते कुबूल होने का महीना है
[31:32]अब इंसान इन कर पांच जनों के अंदर जो बाकी है इंसान
[31:37]कोशिश करें बयान करने उसको खोल अपने लिए वजह करें की वाकई
[31:46]में से एक दुआ इतने मुतालिब इसके अंदर मौजूद हैं एक एक
[31:50]लव हमें मूतवाजे कराया है देखो इस्माइल रमजान से तुमने खुदा से
[31:53]मुताल की बारगाह में क्या मांगना है ये वो चीज जा रही
[31:56]है और नहीं मालूम की ये दुआ धक्का जवाब हमारा सलातो अस्सलाम
[32:01]ने किस तारीख को तिलावत किया लेकिन कहा गया की आखिरी वक्त
[32:04]मे रमजान के कुछ ना कुछ वक्त बाकी है इस दुआ के
[32:07]बाद अल्फाज से ही अंदाज़ हो रही है की आखिरी सब ये
[32:10]दुआ नहीं कर रहे हैं की मेन रमजान गुर्जर चुका है नहीं
[32:11]भाई रमजान में ये दुआ कर रहे हैं ये महीना जान वाला
[32:15]है ये महीना खत्म होने वाला है खुदा इसके अंदर मेरी हाजत
[32:20]को काबुल का रहे हैं खुदा इसके अंदर माहे रमजान के बड़े
[32:22]में कहते हैं की ये वो उसे हमसे की तरह जो इंसान
[32:26]के साथ बहुत ज्यादा अटैक होता है एक दूसरे के निम होते
[32:31]हैं ये उसका फायदा पहुंचना है वो उसको फायदा पहुंचना है रमजान
[32:37]के अंदर जो इंसान बार-बार का खैरात कर रहा होता है इंसान
[32:42]दूसरों की मदद कर रहा होता है वो पूरे साल वो कैफियत
[32:46]नहीं होती अब इंसान जी हालात के अंदर अभी मैं हूं वो
[32:52]चीज मुझे ना चीन में इस काबिल नहीं हूं लेकिन यह हालात
[32:54]तूने अपने फजल से मुझे आता कर दी है अब कम से
[32:59]कम इसको अंदाज ही कोई जब मैंने आपके सामने रिवायत पड़ी के
[33:04]रसूल अल्लाह ने फरमाया था की एक तस्वीर कटता है ग जाता
[33:08]है एक सहाबी मौजूद है कहते हैं जन्नत के अंदर तो हमारे
[33:17]पूरे बागाट पक्के हो गए कहा बागत हो गए लेकिन अब तुम
[33:21]कोई ऐसा कम ना करो की जिसके नतीजा में यहां से आज
[33:23]तुम अपने दरस के ऊपर फेंका और वो जरा जल जाए यानी
[33:28]अमाल को महसूस करना वो नहीं है मैं तो जो अल्लाह ने
[33:34]दी है उनको महफूज करना ज्यादा है हमें रमजान के अंदर बहुत
[33:37]सारे हमारा अंजाम देते हैं जैसे ईद आई है इससे ही माशा
[33:46]अल्लाह टीवी खोलें और उसके बाद दिन जो है वो खत्म होता
[33:48]नजर आना शुरू हो जाता अब वही चीज है सख्त इंसान के
[33:53]लिए लेकिन मेरा खाने को अंजाम देना अगर इम्तिहान ना हो तो
[34:00]रश नहीं है रोज तरक्की इम्तिहान के अंदर है की रुक के
[34:05]अंदर जो रुकावट है इस्माइल रमजान में दूर हो जाति हैं इंसान
[34:15]अपने आप को इतना आदत कर चुका होता है गुनाहों के अंदर
[34:20]की वो गुना छोड़ नहीं पता इसी तरह स्माइल रमजान के अंदर
[34:26]अल्लाह ताला ने शब कार दी जिनकी जो एचटी वाले कवि जिनकी
[34:28]तवाज के थे वो गुर्जर गए एक शब्द जिसका इस्तेमाल है सभी
[34:32]27 यानी इंसान इनको दर्द करें इंसान उसे कद्र को जान वाक्य
[34:36]उसकी हैसियत को जान है ये महीना चले जाएगा मैं अपने लिए
[34:39]बात कर रहा हूं आपके लिए नहीं का रहा है यकीनन आप
[34:43]लोग बहुत बेहतर है और यकीनन आ उसे माहिर रमजान को शाहिद
[34:44]तोर पर से फायदा किया लेकिन इंसान वकायन महसूस करें उसे चीज
[34:50]को की कोई चीज उससे छेद रही है और ये अब नहीं
[34:54]मालूम इमाम इसमें दुआ करते हैं की अल्लाह हमें दोबारा ये मोहर्रम
[34:56]जाना था नहीं मालूम इंसान का मौत का वक्त नहीं है की
[35:00]इंसान यकीन से का सकता हूं की अगले साल मुझे महल रमजान
[35:04]के अंदर अल्लाह ये तौफीक देगा की मैं रमजान को डर कर
[35:09]सुकून याद के अंदर आया की माहे रमजान के अंदर जो चीज
[35:11]आता होती है वो आता नहीं हो शक्ति वो बक्शीश नहीं बन
[35:14]शक्ति मगर ये के रोजी आरफा नहीं अल्लाह ताला ने बहाने रखें
[35:20]अल्लाह ताला ने मावा के रख के इंसान किसी तरह हिदायत हो
[35:26]को गाव देता है की देखो नाम तो सबके लिए ए रहा
[35:34]है लेकिन इमाम कहते हैं की खुशनसीब है वो लोग जो मे
[35:35]रमजान में रमजान को डर करते हैं तवज्जो होते हैं लेकिन तिलावत
[35:45]की रसूल अल्लाह इधर भी कहा जा रहा है की आलिया की
[35:48]ईद है ये आया है अल्लाह तूने इस महीने को भेजो है
[35:51]जब कहा जा रहे की तुम्हारी तरफ रुख कर रहा है अगर
[35:55]कोई मुझे मसलन रॉक करके मेरी तरफ बात करें और मेरा ध्यान
[35:58]किसी और जान वो तो वो बांदा जो मुझे मेरी तरफ रुख
[36:04]कर कर बात कर रहा है थोड़ी डर बाद मुझे वेश्या ज्यादा
[36:06]हो जाएगा मुझे दूर हो जाएगा कब मैं कहूंगा की मैं उसकी
[36:10]बटन का या उसके जो लोग उसने मेरी तरफ की है मैं
[36:13]उसका रिस्पांस दे रहा हूं उसकी तरफ अच्छे हो रहा हूं की
[36:15]जब मैं भी उसकी तरफ रुख करूंगा जब मैं भी उसकी बटन
[36:19]को सुनूंगा तवज्जो के साथ सुनूंगा बैठ जाते हैं अपने मोबाइल हाथ
[36:29]में ले लेते मेरे साथ आने का मतलब ये क्या आप ये
[36:31]मोबाइल साइट पर करें मेरे साथ खेलेगा मतलब जो मैं कर रहा
[36:36]हूं वो मेरे साथ है की जब कोई और शख्स कोई और
[36:46]साथ तुम्हारी है तो मैं अपनी तरफ बुला रही है तो उसका
[36:48]रिस्पांस तो सही रिस्पांस दो यह एन करोगे बहुत सारे मसाले भैंस
[37:04]के अंदर नहीं मालूम एस्नान कितना इंसान उसको खोल सकता है कितना
[37:12]दर्द कर सकता है लिहाजा ईद को भी जब दिन कहा गया
[37:13]है ईद ऐसी चीज जो पलटती इंसान यानी एक फल इंसान को
[37:17]मिल रहा है एक तरीके का यानी ये रजत से जो उसने
[37:22]एक सिलसिला शुरू किया रज्जब से शाबान शाबान से रमजान और यहां
[37:27]पर आकर आप खुदा ने मोब उसको रिवॉर्ड देना चाहता है लेकिन
[37:30]हमारे ईद के तसव्वर क्या है ईद के तसव्वर बिल्कुल सलाम के
[37:38]पास है हम एक आजादी का नाम है हमारे लिए यानी ये
[37:41]जो एक तरह से हमारी जरूर परेशानी है भाई ये करो ये
[37:45]नहीं करो ये करो ये नहीं करो इससे छुटने का नाम क्या
[37:49]है रमजान है और ये वो ईद है उसके लिए ईद अल
[38:00]फिटर का राहत दी गई है जो इमाम अली सलाम बयान करने
[38:13]के अल्लाह इस महीने में बढ़ता नहीं आता की दूसरों के ऊपर
[38:18]हमें अहमियत बयान की माहे रमजान की माहे रमजान तो सबके लिए
[38:21]ए रहा है देखिए फर्क तो नहीं है एक काफिर है एक
[38:25]ऐसा शब्द माहिर रमजान की अहमियत को नहीं जानता रोजी नहीं रखना
[38:28]नमाज नहीं पड़ता भाई रमजान तो उसके लिए भी ए रहा है
[38:32]भाई रमजान मेरे लिए भी ए रहा है लेकिन इमाम का रहे
[38:35]हैं की ए अल्लाह हमें तूने शर्म बख्श इस माहे रमजान के
[38:36]जरिए यानी क्या यानी हमें ये तवज्जो दे रहा है की देखो
[38:41]ये तुम्हारी तरफ ए रहा है तुम भी इसकी तरफ कम बढ़ाओ
[38:42]और अपने नुस्खवा एहसान से तौफीक दी की हम इसके हक को
[38:48]पहचान सके जबकि बहुत सारे बदनसीब वो लोग हैं जिन्हें मालूम नहीं
[38:53]है जो ये कौन सा महीना चल रहा है अल्लाह के पूरे
[38:56]साल के अंदर मोहन का उन मीना का सर जोर माहे रमजान
[39:05]के ऊपर माहे रमजान के अंदर साड़ी कुदरत हमें नजर आई है
[39:10]कादर के अंदर ताला इंसान को उसे अपनी तरफ खींचना के शबाब
[39:14]मुहैया कर रहा है और ये वो महीना है जो गुजरी है
[39:19]की जिसके अंदर औरैया इलाही अपने साल का आगाज किया [संगीत] करते
[39:42]हैं साल का आगाज करते हैं जो अल्लाह ताला के हासिल किया
[39:56]उसको महसूस करने की कोशिश करते हैं और खुद ये विदाई की
[40:01]दुआ हमें बता रही है की देखो अभी गुर्जर गया अभी चंदन
[40:04]आप की है लेकिन पूरा साल पढ़ा है अगले साल आने के
[40:06]लिए अगर खुदा तुम्हें नसीब करें ये माहे मुबारक तो अपने आप
[40:11]को अभी से इसके लिए हम वादा करो अभी से तैयारी करो
[40:15]अब जब सही कहते थे की जब माहिर राजा बात है तो
[40:16]हमारे घर का जो माहौल था जो फिजा थी वो बादल जाति
[40:19]थी पता होता था की मेरा आखिर कोई ऐसा कोई अलग से
[40:23]चीज होने लगी है घर के अंदर अल्लाह ताला की डेन में
[40:36]इंसान ने करनी है उसको जल्दी ते करें जल्दी अपने आप को
[40:40]सजा के अंदर कार दें हम लोग बाद दफा समझते हैं की
[40:41]ये गहरी चीज कम नहीं आनी नहीं ये गहरी चीज है घर
[40:46]का मिसल के तोर पर माहिर रज्जब आने वाला है अलग से
[40:50]सफाई का खास इस्तेमाल किया जाए माहिर अजब का इस्तकबाल किया जाए
[40:52]मिसल के तोर पे लिबाज को बेहतर किया जाए घर के अंदर
[40:56]ऐसे मिसल के दूर में बहुत साड़ी चीज लगे जा शक्ति हैं
[41:01]की इंसान उसकी नज़्बात खुदाई की जान वो तवज्जो अब ये क्या
[41:04]है ये माहौल फिजा फिल्म करना है हमारे पास ऐसे नहीं आज
[41:09]के दूर में तो आसन ऐसे तस्वीर मौजूद हैं छोटे-छोटे साथ मौजूद
[41:12]हैं आयत ने किमी है रिवायत लिखी हुई है इंसान लेकिन हम
[41:16]तो गुर्जर गए यार मस्तान जो हमसे बुजुर्ग फ्रेड है मिला के
[41:19]नहीं तोड़ गुर्जर चुके हैं लेकिन और शायद आज के बच्चों से
[41:30]नहीं कर सकते इतनी फिजा आलूदा हो चुकी है की आप चाहेंगे
[41:34]पढ़ लेते थे उनके गुलाब लगाएं तो कितना जवानी के अंदर रुझान
[41:40]था पहले गुर्जर गए तो अभी सिर्फ बोलने से ये कम अंजाम
[41:51]नहीं दिया जा सकता क्योंकि वो बुराइयां दुश्मन के वो हमलात जो
[41:56]आज हो रहे हैं वो आपके गवर्नमेंट भी नहीं था एक बच्चे
[41:59]के लिए जो फिजा फिराहा है उसके अंदर नमाज पढ़ना अल्लाह से
[42:04]राब्ता बरकरार करना कितना सख्त है ये आपके लिए एबिन सपोर्ट नहीं
[42:07]है यानी वो अभी अपने बचपन के अंदर इतना आलूदा कर दिया
[42:13]जाता है की अभी वो सोचते समझना की सलाहियत नहीं लगता लेकिन
[42:17]उसकी बावजूद उसके जहां को आलू डा कर दिया जाता है लिहाजा
[42:19]कोशिश करेंगे ना यनक अंदर बेखुद्धे साल अपने घर वालों के लिए
[42:25]अपने बच्चों के लिए फिजा फरहान करें माहौल बना है ये जाहिर
[42:27]चीज नहीं है जिसके कोई फायदा नहीं है नहीं इंसान इन्हीं गवाही
[42:31]से मुतासिर होता है इंसान उतना ज्यादा अल्लाह की तरफ लास्ट कर
[42:38]सकते हो यही तो माहे राजा एहसास करेगी कोई अलग से चीज
[42:46]है जो घर के अंदर ए रही है तो उसकी अहमियत उसको
[42:51]बयान होगी इसका एक-एक लम्हा तमाम रातों से ज्यादा अफजल है इंसान
[43:10]कोशिश करें की अपने आप को फिजा के अंदर कार दे जो
[43:15]इलाही माहौल जो रेंज इलाही अपने घर के ऊपर चढ़ाई अपने मशेयर
[43:20]के ऊपर वो रंग इजाजत करें की इंसान डरो दीवार को देखें
[43:22]अपने मोहल्ले की अपने घर की डरो दीवार को देखें अल्लाह ताला
[43:27]के करीब खुदा ने मुताल से दुआ है की खुदा ने मुताल
[43:28]हम सबको हाले सलातो अस्सलाम की तालीमात को सुनने समझना और उसे
[43:34]पर अमल करने की तौफीक नसीब फरमाए इस माहे मुबारक के अंदर
[43:41]जो चंद्र यहां बच्चे हैं खुदा ने मुताली इस मी मुबारक के
[43:49]अंदर खुदा ने जो किताब बना दे की खुदा ने मोब हम
[43:54]सबको ये तोहफा करें मस्जिद से अपने आप को मुस्तफिज कर सकें
[44:01]इसको पढ़ सकें समझ सको इस पर अमल कर सकें हम सबको
[44:08]इमामे जमाना है की आमद वी संसार में सुमार फरमाए दुनिया में
[44:13]जहां-जहां मोमिनीन इमाम जमाना के रसूल का जमीन फरहान कर रहे हैं
[44:16]खुदा ने मेयर उनकी मदद और नुसरत फरमाए हम सबको उनकी हिमायत
[44:20]की तो हकीक नसीब फरमाए इंकलाब इस्लामी को इमामे जमाना के आलमीन
[44:24]क्लास से मुत्तसिल फरमाए रब बनाता काबिल मिलन का अंत समीउल्लाह अलीम
[44:28]मेरे अहमद वाले मोहम्मद सलामत
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