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34- شراکت اور مضاربه کا قانون - حجة الاسلام غلام قاسم تسنیمی
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24/10/06
تجارت میں شراکت اور مضاربه کا قانون : اسلام نے سود کے نظام کو ختم کرنے کیلئے شراکت اور مضاربه کا بهترین قانون پیش کیا هے. دین مبین اسلام میں شراکت اور مضاربه کےلئے الگ الگ احکام بیان هوئے هیں . شراکت اور مضاربه میں چند شرائط هیں جن کا خیال رکھنالازمی هے. ورنه ممکن هے که معامله بجائے مضاربه کے سود هوجائے. حجة الاسلام غلام قاسم تسنیمی
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Transcript
[0:08][संगीत] कु या रबी नीनी बिल्ला मताम बमला रहमा रहीम हुर व
[0:45]सल्लल्लाह अला मोहम्मद वाले मोहम्मद नाजरीन किराम इस्लाम की फिक तालीमाबाद कर
[1:02]है शिरकत की दो किस्में हैं शिरकत कभी करार दद की बुनियाद
[1:11]पर होती है अकदर पर होती है जिसे शिरकत अकदर जाता है
[1:18]और कभी बगैर अकदर दद कोई मामला अंजाम नहीं पाया खुद बखुदा
[1:30]बगैर अकदर किस तरह हो सकता है यह ऐसे हो सकता है
[1:36]कि दो भाई हैं दो वारिस हैं अगर वह वालिद का इंतकाल
[1:48]हो जाए तो उसका माल उन दोनों में तकसीम होगा वह दोनों
[1:52]शरीक हैं उस माल में जो मीरास में उन्हें मिल रहा है
[2:00]लेकिन उनका यह शरीक हो किसी करार दद की बुनियाद पर नहीं
[2:03]है उन्होंने कोई अकदर एक दूसरे के साथ कि हम शरीक होंगे
[2:08]बल्कि एक शरी हुकम की बुनियाद पर किसी खारिज चीज की वजह
[2:17]से वह दोनों शरीक हो गए हैं किसी चीज में अकदर इस
[2:21]हवाले से गुफ्तगू नहीं होगी क्योंकि इसमें कोई अद वगैरह नहीं हो
[2:28]रहा कि इस कोई मख सूस अकाम हो बस जिस वजह से
[2:29]वह रीक हो रहे हैं उस चीज को देखा जाएगा अगर मीरास
[2:34]है तो मीरास में देखा जाएगा कि किसका कितना हिस्सा है उसके
[2:38]मुताबिक उसे दे दिया जाएगा लेकिन असल बहस शिरकत की वहां पर
[2:44]है जहां पर करार दद की जाए अगर दो या दो से
[2:50]ज्यादा अफराद मिलकर बैठे करार दद कबूल कर ले मान ले यह
[2:59]करार दद कर ले कि हम अपना मुश्तरका माल इन तीनों में
[3:10]से हर एक एक मख सूस रकम दे पैसे दे अब हम
[3:14]तीनों मिलके इस पैसों में से कोई ना कोई कारोबार कर लेंगे
[3:20]मुश्तरका पैसों से कोई मामला अंजाम देंगे मुश्तरका पैसों से किसी मामले
[3:32]को अंजाम देने को शिरकत कहा जाता है यह एक दूसरे के
[3:36]शरीक हैं यह याद रखना चाहिए कि शिरकत हमेशा माल में होती
[3:43]है यानी यह दो या चंद अफराद एक दूसरे के साथ यह
[3:49]करार दद करें मैं भी पैसे दे रहा हूं वह भी पैसे
[3:55]दे रहा है इन मुश्तरका पैसों से कोई मामला अंजाम देंगे पै
[3:59]के अलावा किसी दूसरी चीज में शिरकत नहीं होती मिसाल के तौर
[4:07]पर दो अफराद है वह कोई अमल अंजाम दे रहे हैं म
[4:12]दोन मजदूर हैं कोई मजदूरी कर रहे हैं दर्जी हैं कपड़े सी
[4:18]रहे हैं य कोई भी अमल अंजाम दे रहे हैं वह आप
[4:23]इसमें यह तय करें कि इस अमल की जो उजरत होगी वह
[4:27]हम मिलकर बांट लेंगे आप इस में इसे शिरकत नहीं कहते शिरकत
[4:33]की बुनियाद पर यह दुरुस्त नहीं है शिरकत सिर्फ और सिर्फ पैसों
[4:41]में हो सकती है अमल में नहीं हो सकती अलबत्ता यह चाहे
[4:44]तो मुसा हत कर सकते हैं अकदर की बुनियाद पर सुलह सफाई
[4:53]की बुनियाद पर जो चाहे एक दूसरे के साथ जिस चीज पर
[4:55]सुलह कर ले वह उनकी अपनी मर्जी है वह सुलह के आकाम
[5:01]है जो इंशाल्लाह आगे चलकर आएंगे लेकिन शिरकत की बुनियाद पर यह
[5:06]मामला दुरुस्त नहीं है अकदर मामला करते वक्त जो शराय तय पाए
[5:15]अगर उन दोनों ने यह करार दद पास की है कि इन
[5:20]मुश्तरका पैसों से दोनों मिलके मामला अंजाम देंगे तो वो दोनों मामला
[5:31]अंजाम देंगे उन दोनों को हक है कि उस मुश्तरका माल से
[5:34]कोई मामला अंजाम दें लेकिन अगर यह शर्त की गई हो कि
[5:41]उन दोनों में से एक मामला अंजाम देगा मयन किया गया है
[5:48]कि सिर्फ मैं या सिर्फ तुम जब मयन किया जाए तो सिर्फ
[5:53]और सिर्फ उसी को मामले का हक है जिसे मयन किया गया
[5:58]है दूस दूसरे को हक नहीं पहुंचता कि उस मुश्तरका माल में
[6:04]किसी भी किस्म का तसरफती पर अमल करना लाजिम होगा उन दोनों
[6:18]के लिए अगर ऐसा हो कि वह दोनों अद करते वक्त मयन
[6:25]ना करें कि इस मुश्तरका पैसों से मामला कौन अंजाम देगा तो
[6:32]इस सूरत में उनमें से किसी को भी यह हक नहीं है
[6:36]कि दूसरे की इजाजत के बगैर उस माल से कोई मामला अंजाम
[6:42]दे क्योंकि यह माल उन दोनों का माल है सिर्फ एक का
[6:47]भी नहीं है सिर्फ दूसरे का भी नहीं है दोनों का एक
[6:49]साथ है तो उसमें उस वक्त ही तसर किया जा सकता है
[6:54]जब दोनों राजी हो जाए दोनों मुफत कर ले लिहाजा जब तक
[7:00]मयन नहीं नहीं किया जाता उस वक्त तक उनमें से कोई भी
[7:07]उस माल से मामला अंजाम नहीं दे सकता शिरकत में हर शरी
[7:09]को यह हक हासिल है कि वह जब भी चाहे अपना माल
[7:15]अलग कर सकता है अगरचे मुद्दत मयन हो मतलब यह कि करार
[7:26]दद करते वक्त यह तय पाया कि एक साल तक हम शरीक
[7:28]रहेंगे उससे कारोबार शुरू किया गया मामला अंजाम पाया एक साल से
[7:37]पहले ही कोई चाहता है कि इस शिरकत को खत्म करें भाई
[7:43]अब मैं तुम्हारा शरीक नहीं बनना चाहता नहीं रहना चाहता इस रूत
[7:46]में उसे हक है वह अपना माल अलग कर सकता है लेकिन
[7:53]अगर उसके माल अलग करने से जुदा करने से किसी को न
[8:00]हो मामले में नुकसान हो रहा है जाहिर है कि जहां पर
[8:07]पैसा लगाया गया है वहां पर शराय हो सकती हैं मवाद मुख्तलिफ
[8:15]हैं मामलात मुख्तलिफ किस्म के हैं हो सकता है किसी मामले में
[8:18]जब पैसा लगाया गया है तो उसमें एक मुद्दत तक वह पैसा
[8:23]वहीं रहे अगर उससे पहले उस पैसे को निकाल दिया जाए तो
[8:25]नुकसान होता है दूसरों का नुकसान होता है इस सूरत में जब
[8:31]दूसरे शरीक को नुकसान हो रहा हो तो इसे पैसे वापस लेने
[8:38]का हक नहीं है लेकिन अगर नुकसान ना हो तो अगरचे मुद्दत
[8:41]मयन की गई है कि हम एक साल तक शरीक रहेंगे लेकिन
[8:45]कोई भी जब भी चाहे इस शिरकत को खत्म करके अलग हो
[8:51]सकता है उसे उसका माल अलग करके दे दिया जाएगा अगर शिरकत
[9:03]के मामले के बाद खुदा नखता किसी शरी का इंतकाल हो जाए
[9:10]या कोई बेहोश हो जाए या कोई पागल बन जाए किसी हादसे
[9:21]की वजह से या उसके आमाल की वजह से कामों की वजह
[9:23]से हाकिम शरा ने उसे अपने माल में तसरफती से रोक दिया
[9:31]यानी हाकिम शरी ने कहा कि तुम अपने माल में तसरफती इन
[9:38]तमाम सरतो में दूसरे शरी को हक नहीं बनता कि वह जाके
[9:43]माल में तसरफती में उसकी रिजत शामिल नहीं है तो जब तक
[9:53]जाक वह राजी बने या उसकी तरफ से कोई दूसरा जो हक
[9:57]रखता है वह इजाजत ना दे उस वकत तक दूसरा शरीक भी
[10:01]उस पैसे में कोई तसरफती हो गई उसके बाद एक शरीक दूसरे
[10:17]की इजाजत के बगैर कोई चीज खरीदता है अपने लिए खरीद रहा
[10:19]है तो उस खरीदी हुई चीज का नफा और नुकसान उसके लिए
[10:25]है कक दूसरा शरीक आगाह नहीं है इस मामले से और उसने
[10:29]इजाजत नहीं दी तो इसने अपने लिए खरीदा है गोया कि अपने
[10:33]माल से खरीदी है अब यह जाने और वह चीज खसा होता
[10:37]है फायदा होता है उसके लिए है लेकिन अगर मुश्तरका माल से
[10:42]ले और दूसरे की इजाजत भी शामिल हो तो इस सूरत में
[10:44]दोनों शरीक हैं अगर फायदा होता है तो दोनों को फायदा होगा
[10:49]अगर नुकसान होता है तो दोनों का नुकसान होगा शिरकत के अपने
[10:56]फवायटी बहुत नात भी हैं जाहिर है कि जब दो आदमी मिलकर
[11:03]कोई काम अंजाम देंगे उनके पास हर एक का सरमाया मुख्तसर है
[11:09]थोड़ा सा है लेकिन जब यह दो अफराद मिल जाते हैं इनके
[11:10]पास थोड़ा सरमाया ज्यादा हो जाता है और दोनों मिलकर काम करेंगे
[11:18]तो उसका नतीजा भी अच्छा निकलेगा इस सूरत में शिरकत और शरीक
[11:22]बनकर दो अफराद मिलकर कोई काम अंजाम दें इसे उकला दुरुस्त मानते
[11:29]हैं तो शरीयत ने भी इसकी इजाजत दी है और बाज रिवायत
[11:34]में यह ताकीद भी की गई है कि अगर ऐसा शख्स देखो
[11:36]जिसके रिजक में अल्लाह ने वस दी है जिसको यह रिजक में
[11:41]अल्लाह ने बरकत दी है तो उसके साथ शरीक बनो ताकि उसकी
[11:47]बरकत का फायदा तुम्हें भी पहुंचे इस बुनियाद पर शरीक होना किसी
[11:52]के साथ कोई कुब नहीं रखता एक माकूल और शरई मामला है
[11:59]जिस की शरीयत मुकद्दसा ने इजाजत दी है अलबत्ता जब इन तमाम
[12:07]शराय को मद्देनजर रखा जाए यह मुख्तसर तौर पर थे शिरकत के
[12:10]अकाम उसके बाद मामले की एक और किस्म है जिसे मुजारी है
[12:19]कि एक शख्स के पास पैसा है एक शख्स के पास पैसा
[12:31]है दूसरे के पास पैसा तो नहीं है लेकिन उसे कारोबार का
[12:37]या तिजारत का तजुर्बा है वह तिजारत कर सकता है दूसरे लफ्जों
[12:41]में एक के पास शरमाया है वह तिजारत करना नहीं चाहता खुद
[12:45]काम अंजाम नहीं देना चाहता दूसरे शख्स के पास तजुर्बा है इल्म
[12:52]है वोह तिजारत करना चाहता है वह फायदा हासिल कर सकता है
[12:59]मगर उसकी मजबूरी यह है कि उसके पास सरमाया नहीं है उसके
[13:04]पास पैसे नहीं है कि जिसकी बुनियाद पर वह तिजारत करें अब
[13:07]ये दोनों अफराद एक दूसरे के मोहताज है वो चाहता है कि
[13:14]मुझे कोई ऐसा मिले कि मेरा जो पैसा बेकार पड़ा हुआ है
[13:16]मेरा जो पैसा ऐसे ही पड़ा हुआ है उसमें कोई फायदा वगैरह
[13:21]नहीं हो रहा इससे अच्छा है कि मैं क भी कहीं इसे
[13:25]इस्तेमाल करूं किसी जगह पर इसे इन्वेस्ट करूं ताकि यह पैसा भी
[13:29]इस्तेमाल होता रहे और मुझे फायदा भी मिले दूसरा यह चाहता है
[13:34]कि मेरे पास तजुर्बा है मैं मेहनत कर सकता हूं मैं फायदा
[13:37]हासिल कर सकता हूं अगर मुझे कहीं से पैसे मिल जाएं तो
[13:42]मैं खुद भी फायदा उठा सकता हूं जिसका पैसा हो उसे भी
[13:47]फायदा दे सकता हूं इस सूरत में यह दोनों आके एक दूसरे
[13:52]से मिल जाते हैं और करार दद करते हैं मामला अंजाम देते
[13:58]हैं कि भाई पैसा मैं दे देता हूं मेहनत तुम्हारी होगी काम
[14:04]तुम अंजाम दो जाओ कोई मामला करो तिजारत करो अलबत्ता उससे जो
[14:08]फायदा हासिल हो वह हम दोनों में तकसीम होगा इस किस्म के
[14:16]मामले को मुजारी लगाने वाला हो दूसरी तरफ से काम करने वाला
[14:24]हो जो काम करने वाला है उसे आमिल कहा जाता है काम
[14:29]करने वाला और दूसरा जिसने पैसा लगाया है वह साहिबे माल है
[14:35]तो एक तरफ से साहिबे माल है दूसरी तरफ से आमिल है
[14:40]यह मिलके इस किस्म का मामला अंजाम देते हैं यह भी एक
[14:45]माकूल और मंत की किस्म का मामला है तिजारत करना एक अच्छी
[14:51]चीज है पैसे की गर्दिश पैसे को मुशे में मुंत किल करना
[14:56]और उसे इस्तेमाल करना एक अच्छी चीज है और तिजारत के जरिए
[14:58]से जो माशे की खिदमत हो रही है लोगों की जरूरियत पूरी
[15:03]हो रही हैं उनको जिंदगी के वसाय मयस्सर हो रहे हैं यह
[15:08]भी एक माकूल चीज है जिस पर फायदा हासिल किया जा सकता
[15:14]है और वह फायदा इन दोनों में तकसीम होगा इस मामले की
[15:21]कुछ शराय हैं मुजरब जो अद अंजाम पा रहा है इसकी शराय
[15:28]है अलबत्ता शराय में से कुछ ऐसी शराय हैं जो साहिबे माल
[15:31]के लिए हैं और कुछ ऐसी शराय हैं जो आमिल के लिए
[15:35]हैं कुछ ऐसी शयत हैं जो माल के लिए हैं और कुछ
[15:41]शयत हासिल होने वाले फायदे के लिए हैं साहिबे माल के हवाले
[15:51]से लाजमी है कि साहिबे माल जो अपना पैसा खर्च कर रहा
[15:58]है पैसा लगा रहा है यह आकिल हो बालिग हो इख्तियार और
[16:06]इरादा रखता हो शरीयत की तरफ से हाकिम शरा ने उसे अपने
[16:10]माल में तसरफती नहीं है अगर अपने इख्तियार इरादे और मर्जी से
[16:24]यह मामला अंजाम नहीं देता उसे मजबूर किया जाता है तो मजबूरी
[16:29]की बुनियाद पर मामला दुरुस्त नहीं है और अगर उसे हाकिम शर
[16:32]ने अपने माल में तसरफती तो वह उस मामल में कोई मामला
[16:43]अंजाम नहीं दे सकता अगर दे तो वह मामला दुरुस्त नहीं है
[16:45]लिहाजा साहिबे माल के हवाले से यह शराय है आमिल के ऐतबार
[16:52]से देखें जो काम करेगा जिसके पास तजुर्बा है जो इस पैसे
[16:58]को इस्तेमाल करके इससे फायदा निकालेगा उस मिल के लिए भी कुछ
[17:04]शराय है उसे अकलमंद होना चाहिए आकल होना चाहिए उसे बालिग होना
[17:09]चाहिए साहिबे इख्तियार होना चाहिए और तिजारत का तजुर्बा और महारत होनी
[17:20]चाहिए वह तिजारत कर सकता हो सलाहियत रखता हो इस चीज की
[17:22]जो मामला अंजाम दे रहा है जिसकी वजह से साहिबे माल अपना
[17:27]माल उसके हवाले कर रहा है तो उसे यह सोचना चाहिए कि
[17:33]यह दूसरों का माल है मैं जिस मकसद के लिए ले रहा
[17:39]हूं वह मकसद हासिल कर सकता हूं या नहीं तो उसे साहिबे
[17:42]तजुर्बा होना चाहिए और उसके पास यह सलाहियत हो कि उस माल
[17:47]से तिजारत कर सके यह आमिल के हवाले से इन दोनों के
[17:54]दरमियान जो माल है साहिबे माल अपना माल दे रहा है आमिल
[17:59]उस परे मेहनत करेगा उस माल को भी मोयन और मुश होना
[18:06]चाहिए कितना माल दिया जा रहा है उसकी सिफत क्या है मु
[18:12]शख्स और मयन होना चाहिए दूसरा यह कि वो माल ऐन हो
[18:22]अभी मौजूद हो नकद हो ऐसा नहीं कि किसी चीज की मनफात
[18:24]हो ऐसा नहीं है कि किसी पर कर्ज हो जिम्मे पर हो
[18:30]दैन हो दन पर मुजारी चीज की मनफात पर क्योंकि मनफात तो
[18:42]मौजूद नहीं है अभी किसी चीज की मनफात पर मजार बा नहीं
[18:49]हो सकता तो जिस माल पर मामला अंजाम दिया जा रहा है
[18:54]अद मुजारी जा रहा है उस माल को ऐन होना चाहिए और
[18:58]दूसरा यह कि भी ऐसी हो कि दीनार दिरहम की सूरत में
[19:04]हो यानी ऐसी चीज हो जिसे मामला किया जा सकता है जो
[19:10]कीमत वाक हो सकती हो दीनार हो दिरहम हो या आमतौर पर
[19:16]आजकल जो सिक्के रायज हैं करेंसी है पैसों की सूरत में हो
[19:22]रियाल की सूरत में यूरो या डॉलर वगैरह की सूरत में इनसे
[19:24]मामला तय पाता है कीमत यह चीजें बन सकती हैं लिहाजा किसी
[19:32]चीज को किसी को देकर और यह तलब करना कि जाओ इस
[19:34]पर तिजारत करो यह मुज नहीं है मुज सरमाए पर होता है
[19:41]पैसों वगैरह पर होता है यह उसे दिए जाए तो उस पर
[19:45]मामला अंजाम दिया जाए तो यह मुजर है जो सूद हासिल होगा
[19:51]उसमें लाजमी है कि सूद को तकसीम किया जाए ऐसा नहीं कि
[19:57]सिर्फ एक का ही सूद बने सूद को तकसीम होना चाहिए और
[19:59]तकसीम भी साहिबे माल और आमिल पर किसी अजनबी शख्स पर किसी
[20:09]गैर मुतालिक शख्स पर यह फायदा तकसीम नहीं हो सकता उसे नहीं
[20:12]दिया जा सकता मगर यह कि उसने भी किसी ना किसी तरीके
[20:16]से इस तिजारत में इस मामले में कोई किरदार अदा किया हो
[20:21]फिर उसे भी दिया जा सकता है वह भी फिर सहीम बन
[20:25]जाता है शरीक बन जाता है वह भी इस मामले का एक
[20:26]जुज बन जाता है सूद के लिए लाजमी है कि उसे मयन
[20:35]किया जाए मशस किया जाए कि कितना सूद किसे मिलेगा लेकिन मयन
[20:39]मुशा अन किया जाए यानी फीसद बताना चाहिए कीमत नहीं बतानी चाहिए
[20:47]कि कितने ऐसा नहीं को भाई मैं तुम्हें इस मामले में 5
[20:51]हज दूंगा बकिया सब मेरे हैं इस तरह नहीं क्योंकि हो सकता
[20:58]है फायदा ज्यादा हो हो सकता है नुकसान हो कम हो तो
[21:00]इस सूरत में दूसरे के लिए यह मामला नुकसान दे होगा और
[21:05]मयन और मुश भी नहीं है तो लिहाजा लाजमी है कि मनफात
[21:11]को और हासिल होने वाले फायदे को मयन किया जाए कि उसे
[21:18]किस तरह तकसीम किया जाएगा फीसद को मयन करना चाहिए कि 40
[21:25]फीसद मेरे 60 फीसद तुम्हारा इस तरह मयन करना ताकि जितना भी
[21:28]फायदा हो उसके मुताबिक उनको अपना अपना हिस्सा मिल जाए मयन कीमत
[21:33]के तौर पर नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें खतरे का और
[21:41]जरर वगैरह का अंदेशा रहता है यह माल के हवाले से और
[21:45]फायदे के हवाले से शराय थी मुजारी करे मामला अंजाम दे वह
[22:00]अपने माल में हर किस्म के तसरफती ने मना किया है तो
[22:11]वह अंजाम नहीं दे सकता वगरना हर कोई अपने माल पर कुदरत
[22:13]तसरफती है लिहाजा जो भी चाहता है अपना पैसा अकदर बे के
[22:20]तौर पर दूसरों के हवाले करे दूसरा उस पर काम करे और
[22:26]उससे फायदा हासिल हो एक माकूल और मंत की मामला है ऐसा
[22:29]हो सकता है कि दो अफराद दो साहिबे माल अपने माल को
[22:35]एक ही शख्स के हवाले कर दे दो फर्द हैं जैद और
[22:41]बक्र यह दोनों चाहते हैं कि किसी तीसरे शख्स को अपना माल
[22:43]दे एक ही शख्स को दोनों उसे जानते हैं कि बड़ा मेहनती
[22:47]है बड़ा तजुर्बे का है बड़ा तजुर्बा रखता है इसके हाथ में
[22:53]बड़ी बरकत है यह मामला अंजाम देगा मुझे फायदा होगा यह भी
[22:55]अपने पैसे उसके हवाले करता है वह भी अपने यह हर एक
[22:59]अलग-अलग मामला है उसके साथ उसके पैसों का मामला है दूसरे के
[23:04]साथ उसके पैसों का मामला है हर एक के पैसों से हासिल
[23:06]होने वाले फायदे को भी मयन तौर पर तकसीम करना है जिस
[23:11]तरह करार दद में तय पाया है इसी तरह जैसे दो अफराद
[23:21]एक शख्स को अपना सरमाया दे सकते हैं यह भी हो सकता
[23:27]है कि एक फर्द अपने माल को दो अफराद के हवाले करें
[23:34]यानी साहिबे माल एक है लेकिन उस पर मामला अंजाम देने वाले
[23:37]उसे तिजारत वगैरह करने वाले दो हो साहिबे माल को यह भी
[23:47]हक है कि जो फायदा वह उन दोनों को दे चाहे तो
[23:49]बराबर फायदा दे चाहे तो कम और ज्यादा दे उसका माल है
[23:53]करार दद तय पा रही है जिस पर दोनों का इत्तेफाक हो
[23:56]जाए उसे यह पहुंचता है कि उन दोनों में से कहे कि
[24:01]भाई यह जो तिजारत होगी मसलन तुम दो इस पर तिजारत अंजाम
[24:05]दो मामला करो पैसे मेरे हैं 30 फीसद मैं ले लेता हूं
[24:12]30 फीसद तुम ले लो एक आमिल को कहे दूसरे के लिए
[24:18]40 फीसद रख दे दूसरे को ज्यादा फायदा दे दे सकता है
[24:20]उसका माल है अगर वह दोनों इस बात पर तफा कर लेते
[24:25]हैं तो इसमें कोई मुजका नहीं है अब जो उन दोनों में
[24:31]फर्क दिया जा रहा है एक को जो है 30 फीसद दूसरे
[24:32]को 40 फीसद इसमें फर्क नहीं करता कि दोनों का अमल एक
[24:37]जितना हो जितनी वह मेहनत कर रहा है उतनी वह भी मेहनत
[24:42]कर रहा है फिर भी उन दोनों को फायदा मुख्तलिफ दिया जा
[24:47]रहा है यह भी दुरुस्त है या यह इलाफ इस वजह से
[24:51]हो कि उन दोनों में से एक का काम ज्यादा है एक
[24:52]को ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है ज्यादा टाइम देना पड़ रहा
[24:57]है ज्यादा दर दूप करनी पड़ रही है तो इस बुनियाद पर
[25:02]उसे ज्यादा दिया जा सकता है बहरहाल यह एक मामला है जिसमें
[25:04]हर एक को इख्तियार है अगर दो तरफ किसी बात पर राजी
[25:09]हो जाते हैं तो इसमें कोई मुजका वगैरह नहीं है अलबत्ता वह
[25:12]उमू शराय जो है मोत है उनका लिहाज करना लाजमी है जो
[25:18]हमने पहले बयान की है अगर यह आमिल व सरमाए से कोई
[25:26]काम करता है और उसमें कोई मेहनत और काम इस तरह का
[25:29]हो कि आमतौर पर दूसरों को दिया जाता है मसलन कोई नाप
[25:36]और तोल की बात है आमतौर पर नाप और तोल दूसरों के
[25:41]हवाले किए जाते हैं कोई मजदूर आके इस तरह के काम अंजाम
[25:42]देता है उसकी उजरत वह सरमाए से ले सकता है असले माल
[25:47]से ले सकता है क्योंकि यह एक मुता चीज है माकूल चीज
[25:52]है कि यह नाप और तोल दूसरे अंजाम देते हैं आदमी खुद
[25:56]जाक तो घंटों खड़े होकर नाप और तोल नहीं अंजाम देता तो
[25:59]इस तरीके से उस पर जो खर्चा किया जाए तो व असल
[26:03]माल से लिया जा सकता है लेकिन अगर कोई ऐसा काम हो
[26:08]जो आमतौर पर नहीं किया जाता इस तरह के काम के लिए
[26:14]वह असल माल में से कोई पैसा नहीं ले सकता इसी तरह
[26:18]आमिल को यह हक नहीं पहुंचता कि अपना खर्चा या दूसरे अफराद
[26:24]का खर्चा असल सरमाए से ले नहीं हक नहीं पहुंचता सिर्फ एक
[26:30]सूरत में कि मालिक ने साहिबे माल ने उसे इजाजत दे दी
[26:34]हो यह कह दिया हो कि तुम चाहो तो अपना खर्च इसमें
[26:38]से ले लो इस सूरत में वह ले सकता है वगरना बगैर
[26:43]इजाजत के क्योंकि वह मामले की बात हुई है तो वह मामला
[26:44]उसने अंजाम देना है उससे जो सूद हासिल होगा उसे तकसीम होना
[26:50]है लेकिन खर्चे वाली बात वह करार दद से बाहर है जब
[26:55]बाहर है तो खर्चा अपना या दूसरों का उससे नहीं ले सकता
[26:58]इसी तरह वह इस असल सरमाए में से कोई तोहफा वगैरह भी
[27:02]खरीद नहीं सकता किसी के लिए कोई हदियाना सकता कोई जाती खर्च
[27:08]नहीं कर सकता उसमें से अलबत्ता जहां पर खुद तिजारत की मस्लत
[27:14]यह हो कि कोई हदियाना के लिए या इस तरह के काम
[27:21]आमतौर पर करने पड़ते हैं वहां खर्च किया जाए तो इसमें कोई
[27:23]मुजका नहीं है और इस तरह का खर्चा वह असले माल में
[27:27]से ले सकता है अगर करार दद को मुतलुलुक सान होता उसमें
[28:01]दोनों शरीक होंगे और उसे यह हक नहीं पहुंचता कि वह जाकर
[28:05]उधार वाला मामला अंजाम दे किसी ऐसी चीज पर पैसा खर्च करें
[28:12]जिसमें अभी नकद कुछ नहीं मिल रहा उधार यह सही नहीं है
[28:18]मगर यह कि आमतौर पर मुशे में मरस यही हो कि भाई
[28:22]इस तरह के कारोबार में इस तरह के मामले में आमतौर पर
[28:24]उधार दी जाती है जब मर्सम यही हो यज यही हो तो
[28:30]क्योंकि मामला करने वाले भी वहीं के रहने वाले हैं वहां के
[28:35]आदाब रसू मात वगैरह को बेहतर जानते हैं तो मामले से मुराद
[28:38]उनकी वही है जो वहां पर होता है और उस मामले में
[28:42]आमतौर पर उधार दी जाती है तो वहां पर उधार देने में
[28:48]कोई हर्ज नहीं है यह है जब मामला मुतलू नहीं करनी है
[28:58]फला चीज की कर है इस चीज की करनी है तो वह
[29:03]मुश और मयन होगी इस तरह करनी है तो वशस और मन
[29:08]होगी और उस शर्त पर अमल करना लाजमी होगा अगर आमिल ने
[29:14]उस शर्त पर अमल नहीं किया और फिर जाकर नुकसान हो गया
[29:17]जो फायदा मिलना था उतना नहीं मिला बल्कि फायदा ही नहीं हुआ
[29:24]या यह कि असल सरमाए में भी नुकसान हो गया तो इस
[29:28]सूरत में वह जामिन है उसे यह नुकसान पूरा करना पड़ेगा क्योंकि
[29:31]शर्त रखी गई थी अगर इसने उस शर्त की खिलाफ वर्जी की
[29:36]है तो यह जामिन है अब मसला यह रहता है कि अगर
[29:42]कोई चीज आमिल के हाथ में हो असल सरमाया है उसमें नुकसान
[29:47]हो जाए या फायदा हासिल ना हो या जितना होना चाहिए जितने
[29:56]की तवको हो वह ना हो तो क्या आमिल जामिन है या
[30:05]नहीं है अगर असल सरमाए में कोई खसा हो जाता है या
[30:11]फायदा वगैरह हासिल नहीं होता तो क्या वह जामिन है या नहीं
[30:13]है यहां पर यह देखा जाएगा कि क्या उसने कोताही की है
[30:18]क्या उसकी गलती से यह हुआ है अगर उसकी कोताही हो उसकी
[30:24]गलती हो तो वो जामिन है चाहे असल माल में खसा रा
[30:29]हो या फायदे में लेकिन अगर उसने कोई कोताही नहीं की कोई
[30:32]गलती नहीं की अब बाजार है बाजार में तो ऊंच नीच होती
[30:38]रहती है फायदा नफा नुकसान दोनों होते रहते हैं तो इस सूरत
[30:43]में वो जामिन नहीं है मगर यह कि पहले से शर्त लगाई
[30:44]जाए साहिबे माल ने शुरू में ही शर्त कर दी थी कि
[30:50]खसा हुआ तो तुम्हारी गर्दन पर है या अगर खसा हुआ तो
[30:56]इतने फीसद तुमने देना है इस सूरत में आमिल भी जामिन होगा
[30:59]यह मुख्तसर तौर पर मुजारी के अकाम है हमें चाहिए कि हम
[31:06]इन अकाम पर दिक्कत करें और शरीयत मुकद्दसा के बताए हुए अकाम
[31:12]की पाबंदी करें वस्सलाम वालेकुम रहमतुल्लाह व [संगीत] बरकात h [संगीत]
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